फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Fight for Dalit votes in Uttar Pradesh.

ये है मायावती का वोटबैंक हथियाने का भाजपाई मास्टर प्लान

Sat, 23 Jan 2016 11:06 PM IST
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 23 Jan 2016 11:06 PM IST
विज्ञापन
Fight for Dalit votes in Uttar Pradesh.

औपचारिक-अनौपचारिक चर्चा के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लखनऊ यात्रा के दो पड़ावों का दलित केंद्रबिंदु होना अनायास नहीं था। प्रधानमंत्री ने अपनी लखनऊ यात्रा के पहले पड़ाव बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में अंबेडकर के संघर्ष की खास तौर पर चर्चा की।

विज्ञापन


इस यात्रा का आखिरी पड़ाव था अंबेडकर महासभा, जहां प्रधानमंत्री की मौजूदगी तो बेहद संक्षिप्त रही, पर इसके मायने बड़े हैं। प्रधानमंत्री ने महासभा की इल्तिजा पर तो मौन ही रखा, लेकिन दलितों के राम बनने की पेशकश की आवाजें आने वाले चुनाव तक तेज होती जाएंगी।
विज्ञापन


यह महज इत्तेफाक नहीं कि केंद्र में सरकार बनने के बाद खुद मोदी और उनकी पार्टी ने अंबेडकर को लेकर विशेष उत्साह दिखाया है। प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों की वजह से लंदन प्रवास के दौरान अंबेडकर जहां रहते थे, अब वह स्मारक के रूप में भारतीय संपत्ति में तब्दील हो चुका है। मुंबई में भी अंबेडकर से जुड़े एक भव्य स्मारक की नींव रखी जा चुकी है।
विज्ञापन
विज्ञापन


इन सबके जरिये मोदी सरकार ने बाबा साहेब से जुड़ी स्मृतियों को संजोने की इच्छाशक्ति दिखाई है। प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा की इस कोशिश को नई सियासी मुहिम के तौर पर इसलिए भी देखा जा रहा है क्योंकि यह सब उनके और जनसंघ के सियासी सोच और स्वभाव से मेल नहीं खाता है।

हिंदुत्व को त्यागकर बुद्घत्व अपनाने की ओर भाजपा

Fight for Dalit votes in Uttar Pradesh.

हिंदुत्व की बात करने वाली भाजपा उसे त्यागकर बुद्धत्व को अपनाने वाले अंबेडकर की ओर क्यों बढ़ रही है, इसका सियासी आकलन स्वाभाविक ही है और अब चूंकि उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के कठिन चुनाव होने वाले हैं तो भाजपा की यह कोशिश भी सियासी लिहाज से बहुत स्वाभाविक है।

चुनावी जमीन पर जाति का ही जोर
उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए बेहद अहम है। यह भी एक अनोखा संयोग ही है कि उत्तर प्रदेश से ताकत बटोरकर केंद्र में मजबूत सरकार बना चुकी भाजपा 2017 में मजबूती के साथ प्रदेश में वापसी चाहती है। वरना अब तक सियासी जुमला यही रहा है कि दिल्ली के सियासी तख्त का रास्ता यूपी से होकर गुजरता है।

2017 के विधानसभा चुनाव में अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए भाजपा को जिस आधार की जरूरत है, उसकी उसके पास जबर्दस्त कमी है। मोदी और उनकी पार्टी विकास की चाहे जितनी बातें कर लें, उन्हें भी यह पता है चुनावी जमीन पर जाति का जोर ही उनके काम आएगा।

खास तौर से तब जब 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के साथ ही मोदी के चमत्कारी चेहरे की कहानी पुरानी हो गई है। यही वजह है कि भाजपा ने दलित वोट बैंक की ओर रुख किया है। उसे मालूम है कि अगर वह इस बर्फ को पिघलाने में कामयाब रही तो उनकी राह आसान हो जाएगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी में मोदी के करिश्मे का तेज बढ़ाने में दलित वोटों का भी साथ मिला था।

दलितों ने जब दिया मोदी का साथ तो यूपी में बदला इतिहास

Fight for Dalit votes in Uttar Pradesh.

मायावती के साथ माने जा रहे दलित वोटरों के एक हिस्से ने मोदी के नाम पर मुहर लगाई तो भाजपा ने यूपी के चुनावी इतिहास को बदल डाला। यूपी में दलित वोटों का वजन एकमुश्त मुस्लिम वोटरों से कहीं अधिक है। करीब 21 फीसदी दलित वोटरों पर फिलहाल बसपा का मजबूत प्रभाव माना जाता है।

इनमें भी करीब 12 फीसदी जाटव तो मायावती के कट्टर समर्थक माने जाते हैं, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में मायावती इन वोटरों पर अपना एकाधिकार नहीं रख पाईं।

न केवल दलित बल्कि मायावती के कट्टर समर्थक जाटवों ने भी केंद्र में मोदी सरकार के लिए वोट किया। बसपा को 19.8 फीसदी वोट जरूर मिले, पर उनके आधारभूत वोटों के बंटवारे की वजह से ही उसे एक भी सीट नहीं मिल पाई।

सपा का यादव-मुस्लिम कॉम्बिनेशन मजबूत

Fight for Dalit votes in Uttar Pradesh.

वहीं समाजवादी पार्टी ने 22.3 फीसदी वोटों के साथ अपने मुखिया मुलायम सिंह समेत उनके परिवार के पांच लोगों को लोकसभा में पहुंचा दिया। सपा ने जहां यादव-मुस्लिम कॉम्बिनेशन के साथ प्रदेश में अपना मजबूत आधार बना रखा है, वहीं बसपा दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण वोटों के योग के साथ अपने विरोधियों पर भारी पड़ती हैं।

उत्तर प्रदेश की दो मजबूत पार्टियों के उलट भाजपा का जातीय आधार फिलहाल कमजोर ही माना जाता है। यही वजह है कि यूपी के मजबूत दलित वोट बैंक पर भाजपा ने नजरें गड़ा दी हैं। दलित वोटों पर विजय पाने की यह लड़ाई आसान तो नहीं, पर मुश्किल भी नहीं। सियासत में आखिर कौन किसका स्थायी साथी रहता है।

बसपा ने भी तो दलित वोटरों पर अपना हक जताने की लंबी लड़ाई लड़ी है। अब 2017 के दंगल में तय होगा कि तमाम विरोधाभासों के बावजूद कितने प्रतिशत दलित भाजपा की ओर रुख करते हैं या फिर मायावती के साथ ही बने रहकर उसे कड़ा संदेश देते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed