फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   felix padel speaks in lucknow university seminar

लखनऊ आए वैज्ञानिक डार्विन के प्रपौत्र और बता गए कुछ काम की बातें

Wed, 14 Oct 2015 02:09 PM IST
Updated Wed, 14 Oct 2015 02:09 PM IST
विज्ञापन
felix padel speaks in lucknow university seminar

आज हम विकास के नाम पर पर्यावरण को चौपट कर रहे हैं। भविष्य में इसके घातक परिणाम भुगतने पड़ेंगे। नदियां, वायु, सभी धीरे-धीरे प्रदूषित होते जा रहे हैं। यह सब हो रहा है आर्थिक लाभ के लिए। यह बातें मशहूर जीव वैज्ञानिक व थ्योरी ऑफ इवॉल्यूशन देने वाले चार्ल्स डार्विन के प्रपौत्र व जेएनयू, दिल्ली के विजिटिंग प्रोफेसर फेलिक्स पैडल ने कहीं।

विज्ञापन


वह मंगलवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोल रहे थे। विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग की ओर से ‘सामाजिक परिस्थितिकी एवं भारतीय पर्यावरण आंदोलन’ विषय पर आधारित इस संगोष्ठी में उन्होंने कहा कि लालच के चलते हम जंगल काट कर शहर बसा रहे हैं, नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं। विकास का मतलब ये तो नहीं।
विज्ञापन


संगोष्ठी का उद्घाटन एलयू के कार्यवाहक कुलपति प्रो. यूएन द्विवेदी व अतिथियों ने किया। तकनीकी सत्र के दौरान बोलते हुए इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के अध्यक्ष डॉ. जॉर्ज मैथ्यू ने केरल का उदाहरण दिया जहां महिलाएं पंचायती राज से जुड़कर पर्यावरण संरक्षण में लगी हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


इस अवसर पर बीएचयू के प्रो. एके पांडेय ने कहा कि प्रकृति का उपयोग किया जाना चाहिए, दोहन नहीं। इनके अलावा प्रो. राजेश मिश्रा और संगोष्ठी के समन्वयक प्रो. डीआर साहू भी उपस्थित रहे। शाम को मालवीय सभागार में सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया।

वायलिन पर छेड़ी मां भगवती की धुन

felix padel speaks in lucknow university seminar

वायलिन की धुन पर मां भगवती के भजनों की प्रस्तुति शुरू होते ही सभी की नजरें स्टेज की ओर थम सी गईं। हर कोई मंच पर प्रस्तुति दे रहे कलाकार को देखकर आश्चर्यचकित था। होता भी क्यों न आखिर ये प्रस्तुति प्रो. फेलिक्स पेडल जो दे रहे थे।

प्रो. फेलिक्स ने अपनी प्रस्तुतियों से नवरात्र के पहले दिन की संध्या को भक्तिमय कर दिया। इसे बाद उन्होंने ध्रुपद ताल की मनमोहक प्रस्तुति दी। प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग के सहयोग से मालवीय हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में गायिका नीरजा श्रीवास्तव ने भजनों और गजल की प्रस्तुति दी।

सरस्वती वंदना के बाद उन्होंने ‘मेरे कंठ बसो महारानी...’ भजन सुनाया। इसके बाद गजलों में ‘खुदा का जिक्र करें या तुम्हारी बात करें...’, ‘यही वफा का सिला है तो कोई बात नहीं...’ की शानदारी प्रस्तुति से समां बांधा।

विकास के नाम पर बंद हो आदिवासियों का शोषण

felix padel speaks in lucknow university seminar

क्या विकास के नाम पर प्राकृतिक संपदाओं का अंधाधुंध दोहन ठीक है? क्या नदियों के बहाव को प्रभावित करने से ईको-सिस्टम को खतरा पैदा नहीं होगा? यह ऐसे मुद्दे हैं जिन पर हमेशा द्विपक्षीय बहस होती है। मंगलवार को समाज शास्त्री प्रो. फेलिक्स पैडल से इस पर बात हुई।

प्रो. पैडल ने ईको सिस्टम को बने खतरों पर खुलकर बात की। प्रो. पैडल पिछले 35 साल से आदिवासियों के बीच अलग-अलग राज्यों में जाकर काम कर रहे हैं। वह जेएनयू के विजिटिंग फै कल्टी भी हैं। उनका कहना था कि विकास के नाम पर आदिवासियों का शोषण बंद होना चाहिए।

•आपका यह कहना कि विकास के नाम पर विनाश हो रहा है कितना सही है?
भारत में विकास के नाम पर डी-डवलपमेंट किया है। आज प्राइवेट कंपनियों को लाभ देने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है। आदिवासी बताते हैं कि कैसे करोड़ों साल पुराने पहाड़ों को खत्म कर दिया गया। विकास नहीं बर्बादी हो रही है। आने वाली पीढ़ी को आखिर क्या देकर जाएंगे?

•जैव विविधता पर स्थिति कितनी गंभीर है?
बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में खुलेआम कोयला और दूसरे खनिज निकाले जा रहे हैं। कभी यह मुद्दा नहीं उठता कि कितनी जैव विविधिता को हमने यहां खत्म कर दिया। कई प्रजाति पूरी तरह नष्ट हो गईं हैं। पहाड़ टूटने पर पूरा ईको-सिस्टम बदल जाता है। नदियां तक खत्म हो रही हैं।

ये भी है नर बलि...

felix padel speaks in lucknow university seminar

•क्या यह सब आर्थिक विकास की वजह से है?
आईएमएफ, विश्व बैंक तक एक साहूकार की तरह काम कर रहे हैं। अप्रत्यक्ष रूप से इनका भी दबाव रहता है कि प्राकृतिक संपदाओं का दोहन हो। केवल पांच प्रतिशत लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए यह होता है। स्टील उत्पादन में भारत भले ही चौथे नंबर पर हो। पर्यावरण, पानी की शुद्धता, नदियों के संरक्षण में हम कहां हैं? दो करोड़ आदिवासी भारत में विस्थापित हो चुके हैं। नर बलि को हम बुरा मानते हैं। क्या यह नर बलि नहीं है। अब नार्थ-ईस्ट के राज्यों पर इन साहूकारों की निगाह है।

आदिवासियों को भी तो बेहतर जिंदगी की जरूरत है?
देश को भी विकास चाहिए। आदिवासियों के किस विकास की बात सरकार करती है। असल में यह बड़ा झूठ है कि आदिवासी पिछड़े हैं। हमें उनसे लोकतंत्र सीखने की जरूरत है। विकास का फॉर्मूला उनसे सीखने की जरूरत है। कम संसाधन में कैसे बिना ईको-सिस्टम को नुकसान पहुंचाए जिंदा रहा जाता है, वह हमसे बेहतर जानते हैं। मेरा कहना है कि उन्हें अपने जैसा नहीं बल्कि हमें आदिवासी बनने की जरूरत है। आरएसएस, ईसाई मिशनरी उनका धर्म बदलने में जुटे हैं। सब बर्बाद हो रहा है।

पर्यावरण के नाम पर एक्टिविज्म अतिवाद तो नहीं हो रहा?
यह सरकार की दी हुई विचारधारा ही है। मीडिया तक को यही बताया जाता है कि इंडस्ट्री का विकास जरूरी है। एक्टिविस्टों को विकास का रोड़ा कहा जाता है। उन्हें यह समझ नहीं आता कि हिन्दू धर्म में सबसे ज्यादा व्याख्या विकास और पर्यावरण संरक्षण की है। विकास के नाम आदिवासियों का शोषण बंद करिए। उनकी लड़कियों, महिलाओं से बलात्कार मत कीजिए। ईको-सिस्टम को बर्बाद मत करिए। यह नक्सलवाद भी थम जाएगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed