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यूपी में प्रतिवर्ष कम हो रही 35 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि, कृषि निदेशक ने जतायी चिंता

Fri, 28 Dec 2018 01:20 AM IST
MANISH sachan न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: MANISH sachan Updated Fri, 28 Dec 2018 01:20 AM IST
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farming filed ration is reducing day by day
खेती - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो

प्रदेश में औद्योगिक विकास के चलते कृषि भूमि का दायरा तेजी से घट रहा है। औसतन हर साल सिर्फ यूपी में 35 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि खत्म होती जा रही हैं। ये कहना है कृषि निदेशक सोराज सिंह का। वे बृहस्पतिवार को कृषि निदेशालय में एएफसी इंडिया लिमिटेड की ओर से हुई राज्य स्तरीय कार्यशाला में बोल रहे थे। 

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उन्होंने कहा कि अनाज की अच्छी उपज लेने के लिए सबसे जरूरी है कि मिट्टी व जल को संरक्षित कर बेहतर प्रबंधन किया जाए। मिट्टी व जल के अंधाधुंध दोहन से उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। प्रकृति ने हमें गंगा नदी के बड़े भूभाग के रूप में उपजाऊ भूमि व जल संपदा दी है, लेकिन लगातार दोहन से उर्वरा शक्ति घट रही है। 
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अवस्थापना सुविधाओं व औद्योगिक विकास से भी कृषि भूमि तेजी से घट रही है। उन्होंने लोगों को सचेत करते हुए कहा कि अगर इन संसाधनों के संरक्षण एवं प्रबंधन में हम असफल रहे तो उर्वर खेत एवं मैदान, बंजर हो जाएंगे। इससे भावी पीढ़ियों को भुखमरी का सामना करना पड़ सकता है।
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कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि यूपी में 241.70 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्रफल में से सिर्फ 165.98 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में ही बोआई होती है। वर्ष 2004-05 से लेकर वर्ष 2013-14 तक करीब 3.7 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि का उपयोग अन्य कार्यों में हो चुका है। इससे स्पष्ट है कि प्रतिवर्ष जितनी बेकार भूमि का सुधार कर कृषि योग्य बनाया जा रहा है, उससे ज्यादा कृषि भूमि औद्योगिक विकास समेत अन्य कार्यों में चली जाती है। रासायनिक खादों के प्रयोग से मृदा स्वास्थ्य में भी गिरावट आ रही है। 

तेजी से गिर रहा भूजल

विशेषज्ञों ने बताया कि प्रदेश में 143.89 लाख हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र है। इसमें से 71 प्रतिशत कृषि भूमि की सिंचाई नलकूपों से हो रही है। इससे कई जिलों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। प्रदेश के 851 ब्लॉकों में से 113 अति-दोहित, 59 क्रिटिकल एवं 45 सेमी क्रिटिकल की श्रेणी में आ चुके हैं। इन हालातों में वर्षा जल के संरक्षण पर विशेष फोकस की जरूरत है। एएफसी इंडिया के वरिष्ठ क्षेत्रीय प्रबंधक एवं प्रभारी अवनेश कलिक, नीदरलैंड की प्रमुख समाज सेवी संस्था सॉलीडारीडाड के आलोक पांडेय एवं दिआना, आदित्य बिरला ग्रुप के जीएम डॉ. केके सिंह, आईटीएम विवि के डीन डॉ. गिरिश पांडेय और सीएसएसआरआई के वैज्ञानिक डॉ. सीएल वर्मा ने भी घटती उर्वरता पर चिंता जताई।
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