किसान बेहाल... फिर भी नोटबंदी पर मोदी सरकार के साथ, जानें, क्या बोले
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नोटबंदी के फैसले ने जैसा असर शहरी जनजीवन पर डाला है, गांवों में भी वैसी ही उथल-पुथल मचाई है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जान खेतिहर किसान, बेरोजगार नौजवान और फुटकर दुकानदार इससे सीधे प्रभावित हुए हैं।
इसके बावजूद, ‘उधार और व्यवहार’ इस अर्थव्यवस्था की अभी भी ताकत बनी हुई है। संकट में भी दर-दर की तकलीफ सह रहे, कई-कई दिनों की लाइन लगा रहे ग्रामीण आमतौर पर फैसले के साथ हैं। उनके धैर्य की दाद देनी होगी।
उनकी शिकायत और नाराजगी है तो ‘समय’ को लेकर। काश! सरकार कातिक महीने की बुवाई के बाद फैसला करती, ज्यादा ठीक होता। इस मुश्किल से निपटने की थोड़ी ठीक से तैयारी कर लेती, तो कोई बात न थी।
पैसा न होने से ठीक से शुरू नहीं हो पाई बुवाई
बात लखनऊ की हो या बाराबंकी और सीतापुर। नोटबंदी को लेकर लोगों की मुश्किलें एक जैसी हैं। सिंधौली सीतापुर के श्रीपाल कहते हैं कि इस समय किसानों की नकदी का मुख्य स्रोत धान है। पर, बिक नहीं रहा है।
खाद और जोताई के लिए, रिश्तेदारी में शादी के व्यवहार के लिए पैसा नहीं है। चक्की पर पिसाई तक हो नहीं पा रही है। खेतों में मिले किसानों का दर्द है कि फैसले के बाद हरी सब्जियों के दाम गिरे हैं।
नई फसल की बुवाई के लिए खाद-बीज-पानी और पेस्टीसाइड की जरूरत है। लेकिन पैसा न होने और बैंक से मिलने में लंबी जद्दोजहद के कारण खेत की बुवाई ठीक से शुरू नहीं हो पा रही है।
उन परिवारों की हालत बहुत ही खराब है जो सहालग के सीजन में बेटी की शादी की तैयारी में जुटे हैं। बेरोजगार युवा मजदूरी कर रहे हैं लेकिन रुपये नहीं मिल पा रहे हैं।
पर... फैसला ठीक!
पर, करीमनगर के मुकेश यादव साफ-साफ कहते हैं कि 1000 और 500 रुपये की नोट बंद करने का फैसला ठीक है। जाली नोट, आतंकवाद और कालाधन पर इससे फिलहाल तो चोट पड़ेगी ही।
आज यह सरकार यह फैसला न करती, तो कल दूसरे को करना पड़ता। सिंधौली के मुन्नीलाल कहते हैं कि 500 रुपये पूंजी लगाकर 400 मुनाफा कमाने वालों को भी अब जवाब देना होगा। मोटा पैसा दबाकर रखने वालों को भी हिसाब देना होगा। करीमनगर बाराबंकी के सुरेश कहते हैं कि बहुत बढ़िया फैसला है।
हल्की-फुल्की समस्या चल रही है। दुकानदार मदद कर रहे हैं। उधार भी दे रहे हैं। खाद-बीज मिल जाए, बाकी सब चलता रहेगा। कुर्सी रोड पर टकराए सियाराम कहते हैं कि ‘फ्यूचर’ के लिहाज से फैसला अच्छा है। आज गरीबों के साथ सभी को दिक्कत हो रही है। पहले तो सिर्फ गरीब ही परेशान होते थे।
फैसला ठीक, जौ के साथ घुन तो पिसता ही है
लखनऊ-सीतापुर रोड पर अमरून चौराहे के पास चाचा के ट्रैक्टर से खेत की जुताई कर रहे राजकुमार मिल गए। पास में पड़ोस के प्रमोद भी थे। राजकुमार ने बताया कि वह 10 बीघे के काश्तकार हैं। खाद नोट संकट के पहले ही ले आए थे। डीजल पुरानी नोट से भी मिल रहा है। हम किसान हैं, बीज घर पर ही रखते हैं।
ट्रैक्टर है तो जुताई में कोई मुश्किल नहीं है। लाही, मसूर की बुवाई कर चुके हैं। बाकी काम इधर-उधर से चल ही जा रहा है। प्रमोद कहते हैं कि बैंक में नोट वापसी में जब तक भीड़ हो रही है, उधार-व्यवहार से काम चल जा रहा है। फैसला ठीक है।
हम लोग जानते हैं कि जौ के साथ घुन हमेशा पिसता है। परेशान वे हों जो काम के नाम पर खुद 500 लेते हैं और मजदूरों को 250 देते हैं। जो कालाधन दबाए हैं, वे परेशान हों।
इंतजाम पहले कर लेते तो अच्छा होता
कुर्सी कस्बा के पास मुख्य रोड से सटे खेत में पलेवा करते किसान शहाबुद्दीन दिख गए। ये दो भाई हैं और इनके पास करीब 20 बीघे खेती है। 10 बीघे के ये हिस्सेदार हैं। शहाबुद्दीन बताते हैं कि वह गेंहू, आलू और गोभी की खेती करते हैं। गोभी तैयार है।
गेंहू बुवाई की तैयारी कर रहे हैं। 1000 व 500 रुपये के पुराने नोट बंद करने के फैसले के पहले 150 रुपये में 10 गोभी बिक जाती थी। इस फैसले के बाद 100 रुपये में बिकने लगी।
वह कहते हैं कि खाद पहले ही ले लिए थे। बीज को लेकर परेशानी है। निर्णय ठीक है। बड़े आदमी के लिए ज्यादा दिक्कत है।
थोड़ी-बहुत दिक्कत तो सबको है। अगर, नोट बंद करने के साथ बदलने और नई नोट देने का इंतजाम पहले ही ठीक से कर लेते तो कोई बात न होती। इस समय सुबह लोग जाते हैं, रात में आठ-आठ बज जाते हैं। हम तो अभी बैंक गए ही नहीं।
बोआई शुरू किसान नहीं खरीद पा रहे कीटनाशक
मुकेश पेस्टीसाइड के दुकानदार हैं। वह बताते हैं कि बड़ी पुरानी नोट बंद करने के फैसले से बिक्री 75 फीसदी घट गई है। यह बुवाई का सीजन है और पेस्टीसाइड की जबर्दस्त बिक्री का मौसम है। मुकेश बताते किसान को पेस्टीसाइड की अभी जरूरत है। जिन पर भरोसा है उन्हें उधार भी दे रहे हैं।
मुकेश कहते हैं कि यह फैसला बहुत जरूरी था। जाली नोट के मामले आए दिन सामने आते थे। आतंकवाद में भी इसका प्रयोग होता था। कालाधन भी लोग दबाए बैठे थे। फिलहाल इससे निजात मिलेगी। यह फैसला देशहित में है।
किसान पहले से मुर्दा, यै मुर्दौ का मुर्दा करि दिहिन
स्थान : खजुरी, इटौंजा
खजुरी इंटौजा के किसान जवाहर का दर्द बहुत गहरा है। एअरफोर्स में सिविलियन के रूप में काम कर चुके जवाहर 70 पार कर चुके हैं। उनके तीन बेटे हैं और तीनों मजदूरी करते हैं। वह बताते हैं कि इस फैसले से बच्चों को काम मिलना बंद हो गया है। धान घर पर पड़ा सड़ रहा है लेकिन बिक नहीं रहा है।
धान बिकने की कोई व्यवस्था नहीं है। 30 हजार रुपये हों तो गेंहू की बुवाई हो। हाल ये है कि तंबाकू खाने, बीड़ी पीने तक पैसे नहीं हैं। 20 लीटर डीजल उधार लाए थे, खर्च हो गया। पलेवा के लिए 20 लीटर और चाहिए। घर में एक पाई नहीं है।
खेती के लिए छह बोरी डीएपी चाहिए। एक बोरी डीएपी 1200 में मिलती है। मेहमान घर आवें तो मेहमाननवाजी के लिए खर्चा नहीं। जवाहर कहते हैं कि इस ‘दुर्घटना’ का तो कोई अंदाजा नहीं था। आज खाद-बीज-पानी सबका संकट खड़ा हो गया। किसान पहले से मुर्दा, यै मुर्दौ का मुर्दा करि दिहिन। गेंहू बुवाई में देरी हुई तो जहां दो कुंतल होना है, एक ही होगा।
बेटी की शादी के लिए खेत गिरवी रखा, बैंक से उसके पैसे भी नहीं मिल रहे
स्थान : खेरवा सिंधौली सीतापुर
खेरवा के मुन्न्नीलाल के परिवार में पत्नी और छह बच्चे हैं। इस समय वह बेटी की शादी के लिए परेशान हैं। इसीलिए मुन्नीलाल ने अपना साढ़े छह बीघे खेत 1.5 लाख रुपये में गिरंवी रख दिया। रेहन लेने वाले ने सवा लाख दिए थे, जिसमें एक लाख बैंक में जमा कर आए थे। बाकी 25 हजार कर्ज अदा कर दिया।
जो बकाया 25 हजार मिलने वाले थे लिखा-पढ़ी के वक्त देने को कहा गया था। जवाहर बताते हैं कि नोटबंदी के फैसले से 25 हजार मिल नहीं पा रहा और जो बैंक में जमा है, उसमें से कुछ निकाल नहीं पा रहे।
लड़की शादी देखने जाने पर 1000-500 रुपये तो होने चाहिए लेकिन बात नहीं बन पा रही है। लड़का डेयरी पर काम करता है लेकिन उसे भी पैसा नहीं मिल पा रहा। हालांकि मुन्नीलाल कहते हैं कि फैसला बिलकुल सही है। बैंक में व्यवस्था ठीक हो जाए तो मुश्किल जल्दी दूर हो जाए।
पिछले महीने के काम पैसा नहीं मिल पा रहा
स्थान : नवागांव कुंवरपुर खानीपुर सीतापुर
कामधेनु डेयरी का कामकाज देख रहे तेज कुमार बताते हैं कि नोटबंदी के फैसले का असर उनके यहां भी पड़ा है। इस डेयरी में करीब 36 जानवर हैं जिसमें एक दर्जन से ज्यादा दूध देते हैं।
यहां से दूध सीधे लखनऊ जाता है। वह बताते हैं कि फिलहाल चारा-पानी का बंदोबस्त है लेकिन नोटबंदी का सीधा असर ये है कि यहां काम करने वाले वाले कर्मियों को पिछले महीने के काम का भी पैसा नहीं मिल पाया है।
बैंक में लंबी-लंबी भीड़ होने की वजह से पैसा निकालने में मुश्किल हो रही है। दूसरी ओर जो दूध ले रहे हैं, उनके पास भी नई करेंसी अभी उपलब्ध नहीं है। हालांकि इन्हें उम्मीद है कि जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा।
किसानों से संबंध पर टिका है कारोबार, जो गलत वे ही परेशान
स्थान : अटरिया, सीतापुर
खाद विक्रेता विजय कुमार शुक्ला बताते हैं कि वह डीएपी, यूरिया और पोटाश बेंचते हैं। 15 नवंबर से बुवाई का सीजन शुरू होता है। लोग खाद के लिए अब आना शुरू कर रहे हैं। पर, ज्यादातर लोगों के पास पास अभी भी नोट पुराने हैं।
वह कहते हैं कि उनका कारोबार किसानों से संबंधों पर टिका है। उनके यहां आने वाले किसान भी क्षेत्रीय हैं और साल में दो बार वह कम से कम खाद खरीदने आते हैं। ऐसे में उन्हें पता है कि किस किसान की कैसी क्रेडिट है।
ऐसे में वह अपने यहां आने वाले किसी किसान को पैसे के लिए वापस नहीं भेजते। जिनकी साख अच्छी है, उधार दे दे रहे हैं। जब पैसा पाएंगे, तब दे जाएंगे। शुक्ला बताते हैं कि आज से नई नोट के साथ किसान आना शुरू हुए हैं।
सुबह से करीब आधे दर्जन किसान 2000 की नई नोट के साथ आए हैं। उम्मीद है कि अब स्थिति तेजी से सामान्य हो जाएगी। वह कहते हैं कि नोटबंदी का फैसला सही और जरूरी था। जो गलत लोग हैं, वे ही इससे परेशान हैं।