मुस्लिम वोटों के लिए मायावती को भाया माफिया, जानें- क्या कहते है जानकार
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कानून-व्यवस्था पर बसपा सुप्रीमो मायावती अखिलेश सरकार को घेरती रही हैं। उनके समर्थक नारा देते रहे हैं, ‘चढ़ गुंडों की छाती पर-मुहर लगेगी हाथी पर।’ पर, सपा-कांग्रेस गठजोड़ के बाद अपने दलित-मुस्लिम समीकरण को बिगड़ते देख मायावती ने माफिया मुख्तार अंसारी के परिवार को अपना लिया। उस मुख्तार को जिसे मायावती पहले बसपा से बाहर का रास्ता दिखा चुकी हैं।
मुख्तार व उनके परिवार को बसपा में शामिल करने के बाद से सोशल मीडिया पर तेजी से नया नारा वायरल हो रहा है- चढ़ गए गुंडे हाथी पर...मुहर कैसे लगेगी हाथी पर।
विश्लेषक भी मानते हैं कि मुस्लिमों को 100 टिकट देने के बाद वोटों के ध्रुवीकरण की लालसा में उठाए गए उनके इस कदम से फायदा कम, नुकसान की आशंका ज्यादा है।
कानून-व्यवस्था पर उनके दावे की हवा निकल गई है। विश्लेषक कहते हैं कि इस फैसले से हो सकता है कि मायावती को पूर्वांचल की कुछ चुनिंदा सीटों पर फायदा भी मिल जाए, पर इससे उनकी ‘ब्रांड वैल्यू’ तार-तार हो गई है।
सपा व कांग्रेस गठबंधन से घबराईं मायावती
वरिष्ठ पत्रकार मदन मोहन बहुगुणा कहते हैं कि मायावती ने मुख्तार की खराब छवि का हवाला देकर ही बसपा से बाहर किया था। अब नई दलील गढ़कर उनके पूरे परिवार को फिर शामिल कर लिया। इससे साफ है कि मायावती सपा और कांग्रेस गठबंधन से ज्यादा घबरा गई हैं।
उन्हें लगा होगा कि इस गठबंधन से मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण गठबंधन की ओर हो सकता है और उनका समीकरण बिगड़ सकता है। बहुगुणा कहते हैं, मुख्तार का पूर्वांचल की कुछ चुनिंदा सीटों पर प्रभाव है। हो सकता है कुछेक सीटों पर बसपा को फायदा मिल भी जाए।
पर, कुछ चुनिंदा क्षेत्रों को छोड़कर पूरे प्रदेश में इसका गलत असर जाएगा। मुख्तार कोई ऐसे ब्रांड नहीं हैं, जिससे आम मुस्लिम उनके नाम पर जुड़े। मुख्तार की पहचान क्रिमिनल के रूप में रही है। आम मुस्लिम उनके नाम पर वोट नहीं देता।
दलित चिंतक कालीचरण सनेही कहते हैं, राजनीतिक मूल्यों को सभी दलों ने तिलांजलि दे दी है। मायावती ने माफिया छवि वाले मुख्तार अंसारी व उनके परिवार को शामिल करके एक जोखिम लिया है। यह उसी तरह का जोखिम है जैसे राष्ट्रीय प्रभाव वाले दल कांग्रेस ने क्षेत्रीय दल सपा से गठबंधन करके उठाया है। अब यह देखने की बात होगी कि जनता इस फैसले को किस तरह लेती है। इसका इंतजार करना होगा।
मुस्लिमों को एक चौथाई टिकट की हिस्सेदारी दी
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर व समाजशास्त्री प्रो. आनंद कुमार कहते हैं कि सपा और बसपा मुस्लिम कम्युनिटी के बीच आधार बनाने की खातिर अपने-अपने तरह से प्रयास करती रही हैं। पूर्वांचल के दो-तीन जिलों में कौमी एकता दल की उपस्थिति रही है।
मेरा मानना है कि सपा-कांग्रेस गठजोड़ के बाद मायावती ने उस क्षेत्र में मुस्लिमों का समर्थन पाने के लिए कौमी एकता दल का विलय कर मुख्तार अंसारी व उनके परिवार को शामिल किया है।
अन्ना आंदोलन के बाद मध्यम वर्ग का हिंदू हो या मुसलमान, नौजवान हो या पढ़ा-लिखा तबका, उसमें आपराधिक राजनीति व राजनीतिक अपराध को लेकर एक चेतना पैदा हुई है। वह इसे नापसंद करता आया है। ऐसे पुराने प्रतीकों व पुरानी पहचान वाले लोगों को अपनी जीत के लिए जोड़ना नासमझी दिखाना ही है।
पर, एक बात यह भी गौर करने वाली है कि बसपा ने किसी अन्य दल की अपेक्षा सामाजिक राजनीतिक समीकरण में मुस्लिमों को एक चौथाई टिकट की हिस्सेदारी दी है। देखना होगा कि क्या असर पड़ता है?
कानून-व्यवस्था पर अब क्या कहेंगी मायावती
राजनीतिक विश्लेषक व गोरखपुर विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के प्रो. गोपाल प्रसाद कहते हैं मुख्तार की छवि आपराधिक व माफिया की ही रही है। आमतौर पर पढ़े-लिखे, सुलझे मुस्लिम उन्हें पसंद नहीं करते। स्थानीय स्तर पर उन्हें लोग क्यों समर्थन करते हैं, इसके तमाम कारण हो सकते हैं।
मुख्तार के कौमी एकता दल ने पहले सपा में और वहां से ठुकराए जाने के बाद जिस तरह बसपा में बिना शर्त विलय किया, उससे साफ है कि इनका जनता के बीच आधार सिकुड़ गया है। इन्हें यह भरोसा भी नहीं बचा है कि अपने बलबूते अपने परिवार से जुड़े लोगों की सीटें भी जीत पाएंगे?
ऐसे में इस परिवार के बसपा में आने से कोई बड़ा फायदा होगा, इसकी संभावना नहीं है। यह जरूर हो सकता है कि कुछ सीटों पर इनके जुड़ने का कुछ फायदा मिले। पर, कानून-व्यवस्था के नाम पर एक तबका जो बसपा के साथ खड़ा होने की सोच रहा था, वह कट जाएगा।
मायावती अब तक सपा को कानून-व्यवस्था के मामले पर ही घेरती रही हैं। वह आरोप लगाती रही हैं कि सपा सरकार अपराधियों को संरक्षण देती है। अब वह क्या कहेंगी?