बैलगाड़ी से संसद तक, बेनी का सफर
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सत्तर पार कर चुके बेनी प्रसाद वर्मा यानी बेनी बाबू बिल्कुल नहीं बदले। बातचीत का ठेठ गंवई अंदाज वैसा ही जैसा 25-30 साल पहले था। पूरी बात साफ-साफ और बिना लाग-लपेट के। प्रदेश सरकार में कई बार मंत्री रह चुके बेनी बाबू और बाराबंकी एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं। जब भी मौका मिला, उनके एजेंडे में बाराबंकी सबसे ऊपर रहा। पिछले विधानसभा चुनाव में पुत्र की पराजय से उपजे क्षोभ और कसक के बावजूद वह जब भी अपने संसदीय सीट गोंडा के विकास की किसी योजना की कल्पना करते हैं तो उसका दायरा बाराबंकी की सीमाओं को छुए बिना नहीं रहता। उनकी जिंदगी की किताब से जुड़े पन्नों के बारे में अलग से बात करने का आग्रह करता हूं तो कहते हैं, ‘अरे! अलग से बात क्या करना, जो पूछना हो यहीं पूछते जाओ।’ हॉल में बैठे लोगों के लिए कॉफी लाने का आदेश दे देते हैं और शुरू हो जाते हैं। सियासत में आने के सवाल पर बताते हैं, ‘समय ने कभी सोचने का वक्त ही नहीं दिया। पिताजी की जल्दी मृत्यु हो गई और क्षेत्र में किसानों की समस्याओं से ऐसा जुड़ा कि सियासत में आ गया।’
पढ़ाई कैसी चली?
शुरुआती पढ़ाई उर्दू में हुई क्योंकि पिताजी खुद उर्दू से पढ़े थे। उनकी उर्दू में रुचि थी। गांव से पांच किमी. दूर बदोसराय पैदल जाना पड़ता था। चहर्रुम में पहुंचा तो चर्चा शुरू हो गई कि उर्दू खत्म की जा रही है। पांचवीं में हिंदी माध्यम में आ गया। छठी क्लास से हाईस्कूल तक पढ़ाई गांव से लगभग 10 किमी. दूर कोटवा धाम मेें हुई। उसके बाद लखनऊ के अमीनाबाद इंटर कॉलेज से इंटर किया। इसके बाद बीए, एलएलबी सब लखनऊ विश्वविद्यालय से हुआ। पढ़ाई में हमेशा अच्छा रहा। इसलिए हल्की-फुल्की डांट-डपट के अलावा कभी मार खाने की नौबत नहीं आई।
राजनीति में रुझान कैसे हुआ?
बस यूं समझो कि समय के फेर ने सियासत में ला पटका। पिताजी इलाके के प्रमुख कांग्रेसी नेता थे। बचपन से ही नेताओं का फौज-फाटा घर पर देखता रहता था। गांव में मेरे पड़ोस के घर में प्रख्यात समाजवादी नेता रामसेवक यादव अक्सर आया करते थे। वे थे तो राष्ट्रीय स्तर के नेता लेकिन उनका मन बाराबंकी में ही रमता था। वे जब गांव आते तो सुबह की चाय पिताजी के साथ मेरे घर पर ही पीते थे। दोनों में सियासी और सामाजिक मुद्दों पर जमकर चर्चा होती। तभी से किसानों और गांवों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ने की भावना मन में घर कर गई। लखनऊ विश्वविद्यालय में जब समाजवादी युवजन सभा के नेताओं को छात्रों की समस्याओं पर बोलते देखता तो उनके भाषणों से मुग्ध हो जाता। धीरे-धीरे मैं भी इनमें हिस्सा लेने लगा। बीए करके एमए और एलएलबी में प्रवेश लिया कि पिताजी की मृत्यु का समाचार मिला। गांव पर ज्यादा रुकने लगा। पिताजी की मौत के बाद रामसेवक यादव जब भी गांव आते तो रात में हमारे घर पर ही रुकतेे। उनके साथ मैं भी दौरे करने लगा। उन्होंने 1970 में मुझे बुढ़वल शुगर मिल गन्ना सोसायटी के डायरेक्टर का चुनाव लड़वा दिया। बस यहीं से सियासत में अपना भी दाखिला हो गया।
आपने चीनी मिल नहीं चलने दी थी?
जब मैं डायरेक्टर चुना गया, उस समय गन्ना किसानों का दस-दस साल तक का पैसा मिल पर बकाया था। सोसायटी के सभी डायरेक्टरों में मैं इकलौता ही ग्रेजुएट और एलएलबी था। इसलिए रामसेवक यादव ने सोसायटी के अध्यक्ष शंकरलाल अवस्थी से बात करके मुझे यूनियन का उपाध्यक्ष बनवा दिया था। मैंने मिल के प्रबंध तंत्र से किसानों का बकाया भुगतान करने को कहा। वे नहीं माने तो मैंने घोषणा कर दी कि भुगतान होने तक किसान अपना गन्ना मिल को नहीं देंगे। कांग्रेस के दबदबा वाला समय था। बाराबंकी के किदवई घराने का नाम दिल्ली में दबदबे का पर्याय माना जाता था। मोहसिना किदवई काफी प्रभावी थीं। उनके घर वालों ने कोशिश की कि वे मिल को अपने इलाके का गन्ना देकर उसे चलवा दें, पर बाराबंकी के किसान हमारे साथ खडे़ हो गए। जेल भिजवा देने की धमकी दी गई, पर मिल को गन्ना तभी मिलना शुरू हो पाया जब भुगतान होने लगा।
पहला चुनाव कैसे लड़े?
वर्ष 1974 में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। रामसेवक यादवजी वैसे तो लोकसभा सदस्य रह चुके थे, पर हम लोगों ने उनसे विधानसभा चुनाव लड़ने का आग्रह किया। पहले तो वे नहीं माने लेकिन बाद में हमलोगों की जिद पर चुनाव लड़ना स्वीकार कर लिया। हमलोग उनका नामांकन कराने की तैयारी में लगे थे कि एक दिन वे बोले, ‘मैंने परचे मंगवा लिए हैं। मैं रुदौली से लडूंगा और तुम दरियाबाद से।’ मेरी हिम्मत तो नहीं हो रही थी लेकिन यादवजी से बात करने का साहस भी नहीं कर पा रहा था। बहरहाल, हम दोनों लोग विधायक हो गए।
कोई ऐसा प्रसंग जो भुलाए न भूलता हो?
बाराबंकी के सोशलिस्ट नेताओं में मैं सबसे जूनियर माना जाता था, पर चौधरी चरण सिंह ने पता नहीं किन कारणों से मुझे भारतीय लोकदल का प्रदेश महासचिव बना दिया। मेरे बड़े भाई और काफी सीनियर नेता अनंतराम जायसवालजी को कष्ट होना स्वाभाविक था। आपातकाल के बाद चुनाव होने वाले थे। मेरे सामने तो नहीं कहा लेकिन मेरे कानों में आवाज पड़ी कि जायसवालजी कह रहे हैं कि प्रदेश के नेता हो गए हैैं तो मसौली से मोहसिना के खिलाफ चुनाव लड़ें। मेरे कानों में भी यह बात पड़ी। प्रदेश महासचिव होने के नाते टिकट की लिस्ट मेरे ही सामने फाइनल होनी थी। मैंने अपनी दरियाबाद सीट से अशर्फीलाल यादव को चुनाव लड़ाने की घोषणा की और अपना नाम मसौली सीट पर डाल दिया। चौधरी साहब चिंतित हुए कि कहीं मैं चुनाव हार न जाऊं क्योंकि मसौली मोहसिना किदवई का घर ही नहीं, उनका गढ़ भी था। बहरहाल मैं चुनाव जीत गया। यह घटना इसलिए भी आज तक नहीं भूली क्योंकि इसी चुनाव के बाद मोहसिनाजी ने बाराबंकी की राजनीति से खुद को अलग कर लिया। दूसरी वजह चौधरी साहब का स्नेह रहा। उन्होंने मुझे चुनाव लड़ने को 25 हजार रुपये भिजवाए थे कि मैं मोहसिना जैसी नेता से मुकाबला कर सकूं। यह बात अलग है कि मुझे उन रुपयों की जरूरत ही नहीं पड़ी।
कौन-कौन से वाहन चला लेते हैं?
बैलगाड़ी खूब चलाई है। साइकिल चलाना भी जानता हूं। मोटर साइकिल ली तो थी यह सोचकर कि राजनीतिक दौरों में इससे मदद मिलेगी, लेकिन पहली बार ही लेकल चला तो कुछ किलोमीटर बाद मोटरसाइकिल सहित ऐसा लुढ़का कि जीवन में दुबारा किसी इंजन वाले वाहन को चलाने की हिम्मत नहीं कर पाया। पहले मोटर साइकिल पर पीछे बैठकर दौरे किए और फिर मोटर कार में बैठकर दौरे करने लगा।
कभी घर वालों से छिपकर सिनेमा देखा?
कई बार। घर में पढ़ने-लिखने वाला अकेले मैं ही था। पिताजी भी पैसा देते और अम्मा अलग से छिपाकर दे देती। लखनऊ में खूब सिनेमा देखता, लेकिन घर वाले यह बात कभी जान नहीं पाए। पहली फिल्म कौन सी देखी, यह तो याद नहीं, लेकिन इतना जरूर याद है कि ‘बैंडिट क्वीन’ के बाद सिनेमाघर में कोई पिक्चर नहीं देख पाया। अभिनेताओं में दिलीप कुमार ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
किस पुस्तक ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया?
आर्य समाज से मेरा काफी जुड़ाव है। शायद यही वजह हो कि ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ने मुझे काफी प्रभावित किया। प्रकाशवीर शास्त्री का कोई कार्यक्रम हो तो बगैर जाए मन ही नहीं मानता था। एक बार तो ऐसा हुआ कि टिकट नहीं मिल पाया तो मैं बगैर टिकट ही रेलगाड़ी में सवार हो गया।
मां के हाथ की बनी कौन सी चीज सबसे ज्यादा याद आती है?
मुझे मिठाई और नमकीन दोनों बहुत पसंद थे और आज भी हैं, पर मां के हाथ का गरम किया हुआ बासी खाना खाकर स्कूल जाने जैसा आनंद कभी नहीं भूल सकता।
जानिए, बेनी प्रसाद वर्मा का इतिहास
1974-में दरियाबाद (बाराबंकी) से पहली बार विधायक
1995-तक विधायक, 1996 से लगातार लोकसभा सदस्य
1977-में पहली बार उत्तर प्रदेश में कारागार और गन्ना-चीनी मंत्री बने। बाद में सूबे के संसदीय कार्य, लोक निर्माण, आबकारी विभाग के मंत्री भी रहे। केंद्र में संचार मंत्री और संसदीय कार्य राज्य मंत्री भी रहे।
भारतीय लोकदल, भारतीय क्रांति दल, जनता दल और समाजवादी पार्टी में महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
जन्म- 11 फरवरी 1941
शैक्षिक योग्यता- बीए, एलएलबी
पिता- मोहन लाल वर्मा
मां- रामकली
पत्नी- मालती देवी
पुत्र- राकेश वर्मा (पूर्व कारागार मंत्री), दिनेश वर्मा, ऋषि वर्मा
पुत्री- शालिनी व अर्चना
गांव- सिरौली गौसपुर (बाराबंकी)