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UP: सातवां वेतन आयोग तो सपना है... ये तो चौथे व पांचवे की सिफारिशों को ही तरस रहे

Fri, 01 Jul 2016 02:22 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 01 Jul 2016 02:22 AM IST
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 Employees waiting for fourth and fifth pay commission.

केंद्र सरकार ने सातवें वेतन आयोग को मंजूरी देकर राज्य कर्मचारियों की उम्मीदों को भी पंख लगा दिए हैं, पर हकीकत यह है कि सूबे के कई निगमों और संस्थाओं को तो चौथे और पांचवें वेतन आयोग के ही लाले पड़े हैं।

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सातवें वेतन आयोग की मंजूरी ने राज्य कर्मचारियों व शिक्षकों के लिए भी नए और बढ़े वेतन का रास्ता खोल दिया है, पर निगमों व संस्थाओं के कर्मचारियों की वेतन विसंगतियां बढ़ेंगी। साथ ही लाखों कर्मचारियों के वेतन ढांचे में बदलाव से बाजार पर पड़ने वाले प्रभाव के कारण भी इन्हें महंगाई की मार झेलनी पड़ेगी।
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वजह सरकारी मशीनरी की सुस्त चाल हो या निर्णय लागू करने वाला की उपेक्षापूर्ण नीति, प्रदेश में सहकारी समितियों से लेकर कई निगमों के 21 हजार से ज्यादा कर्मचारी 1986 में आए चौथे वेतन आयोग की सिफारिशों की तनख्वाह पर ही काम कर रहे हैं।
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समितियों में तो कई जगह ठीक से चौथे वेतन आयोग के अनुसार भी तनख्वाह नहीं मिल रही है। अब जब सातवां वेतन आयोग आ गया है, तो राज्य कर्मचारियों और निगमों तथा इन समितियों में काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन का अंतर काफी बढ़ जाएगा।

दस निगमों के कर्मचारियों को खासी मुश्किलें

 Employees waiting for fourth and fifth pay commission.

प्रदेश में कुल निगमों और उपक्रमों की संख्या 36 है। इनमें से सिर्फ 26 को भी अब जाकर छठा वेतनमान मिल पाया है। बाकी दस में दो निगमों के कर्मचारी पांचवें वेतन आयोग में काम कर रहे हैं जबकि आठ के कर्मचारियों को अभी चौथा वेतनमान ही मिल रहा है।

इन्हें सिर्फ चौथा वेतनमान--कर्मचारी     
उप्र अल्पसंख्यक वित्त विकास निगम--85
उप्र वक्फ विकास निगम--18
उप्र लघु उद्योग निगम--146

उप्र मध्य गन्ना बीज विकास निगम--18
उप्र हथकरघा निगम--180
उप्र स्पिनिंग एवं यार्न कंपनी--33

उप्र निर्यात निगम--40
उप्र वित्तीय निगम--380
साधन सहकारी समितियां--20,000 (लगभग)

पांचवां वेतनमान
उप्र मत्स्य विकास निगम--165
उप्र ड्रग एंड फार्मास्युटिकल लिमिटेड--175

छठा वेतन आयोग न मिलने से नुकसान

 Employees waiting for fourth and fifth pay commission.

---------तृतीय श्रेणी (सभी श्रेणी)--चतुर्थ श्रेणी(सभी श्रेणी)

चौथा वेतनमान--10,000 से 13,000--8,000 से 10,000

छठा वेतनमान होता तो--30,000 से 35,000--22,000 से 26000

मासिक हानि--20,000 से 22,000 रुपये--14,000 से 16,000 रुपये

जाहिर है कि पांचवे वेतन आयोग में भी छठे की तुलना में सभी श्रेणी कर्मचारियों को कम ही तन्ख्वाह मिल रही है।

इसलिए बढ़ेगी विसंगति
सातवें वेतनमान में 18,000 रुपये किया गया है। इस तरह जहां अभी चौथा वेतन मिल रहा है। सातवें वेतन आयोग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के वेतन और चौथे आयोग में काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन में 10,000 रुपये का प्रारंभिक अंतर हो जाएगा।

दुश्वारियां यह भी हैं

 Employees waiting for fourth and fifth pay commission.

-उप्र ड्रग एंड फार्मास्युटिकल लिमिटेड में पांचवा वेतन आयोग लागू तो कर दिया गया है। पर, कर्मचारियों को 38 महीने से वेतन ही नहीं मिल रहा है।

-साधन सहकारी समितियों में चौथा वेतन आयोग लागू है, पर वह भी नियमित रूप से नहीं मिल रहा है। सैकड़ों समितियों को तो छह-सात वर्षों से वेतन नहीं मिला है।

-हथकरघा निगम के कर्मचारियों को चौथा वेतन आयोग दिया जरूर गया था। पर, इनके कर्मचारियों को 2002 से डीए नहीं मिला है। इसलिए चौथा वेतन आयोग का लाभ मिलने के बावजूद कर्मचारियों को काफी नुकसान हो रहा है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी 8,000 और तृतीय श्रेणी के कर्मचारी 10,000 रुपये से भी कम मासिक वेतन पा रहे हैं।

-उप्र वित्तीय निगम के कर्मचारियों को वेतन समिति ने छठा वेतन आयोग देने की संस्तुति कर रखी है। पर, 2012 से यह कैबिनेट की मंजूरी की बाट जोह रहा है।

सिर्फ 2893 रुपये में गुजारा

 Employees waiting for fourth and fifth pay commission.

उत्तर प्रदेश सहकारी समिति कर्मचारी संघ के मोहन लाल गौड़ का कहना है कि पश्चिम की सहकारी समितियों को आर्थिक रूप से काफी मजबूत बताने का ढोल पीटा जाता है। दावा किया जाता है कि इनके कर्मचारियों को नियमित वेतन मिल रहा है। पर, सच्चाई यह है कि कई समितियों के कर्मचारियों को मजूदरों से भी कम वेतन मिल रहा है। उदाहरण के लिए, आगरा की जेंगारा साधन सहकारी समिति के कर्मचारी नरेन्द्र सिंह को सिर्फ 2893 रुपये महीने की पगार पर ही जीवन चलाना पड़ रहा है।

यह है हाल
ऑल इंडिया कॉडर सचिव एसोसिएशन के अध्यक्ष एस के विश्व‌कर्मा का कहना है कि वर्ष 1976 में प्राइमरी स्कूल के मास्टर को 80 रुपये तनख्वाह मिलती थी, जबकि सहकारी समितियों के सचिवों को 180 रुपये। आज मास्टरों को क्या तनख्वाह मिल रही है? हम लोगों को तो ठीक से चौथा वेतन आयोग भी नहीं मिल रहा है।

निगमों की एक नहीं कई मुश्किलें
राज्य निगम कर्मचारी महासंघ के महासचिव मनोज मिश्र का कहना है कि सिर्फ वेतन ही नहीं, अलग-अलग निगमों में कर्मचारियों की सेवानिवृत्त आयु भी अलग-अलग है। कुछ में तो रिटायरमेंट आयु 60 वर्ष हो गई, पर कई में अभी यह 58 वर्ष ही है। ऊपर से सरकार ने कर्मचारियों को ठीक से वेतन का लाभ न दे पाने वाले इन निगमों को अपने चहेतों को उपकृत करने का जरिया बना लिया है। निगमों के लिए अध्यक्षों या उपाध्यक्षों का वेतन भारी मुसीबत बन गया है।

कई बार यह भी मांग की जा चुकी है कि सरकार अगर निगमों के कर्मचारियों के साथ न्याय नहीं कर सकती तो सभी को मिलाकर एक निगम बना दे। फिर सभी कर्मचारियों को समान रूप से सभी निगमों के काम की जिम्मेदारी सौंप दे। इससे आर्थिक स्थिति भी ठीक हो जाएगी और कर्मचारियों की मुश्किलें भी हल हो जाएंगी। पर, सरकार कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान के बारे में शायद सोचना ही नहीं चाहती।

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