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सरकारी माल अपना

Wed, 09 Jul 2014 09:57 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 09 Jul 2014 09:57 AM IST
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employees misuse govt revenue

प्रशासनिक सेवा के अफसरों को वैसे तो किसी चीज की कमी नहीं रहती लेकिन कुछ अफसर ऐसे भी हैं जो हर छोटे-बड़े सरकारी माल पर नजर गड़ाए रहते हैं।

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सांस्कृतिक कार्यकलापों से जुड़े रहे एक महकमे में तैनात रहे आला अधिकारी की कारगुजारियों के  किस्से इन दिनों खूब चटखारे लेकर बयां किए जा रहे हैं। जहां बैठते हैं दांतों से नाखून चबाने लगते हैं।
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तौलियों के काफी शौकीन हैं, इसलिए जिस विभाग में जाते हैं वहां तौलियों की खरीद खूब होती है। मातहत तो यहां तक कहते हैं कि कहीं बाहर जाते हैं तो वहां से भी फोकट के तौलिए उठा लाते हैं।
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तौलियों तक तो बात ठीक थी लेकिन जब दफ्तर से रजिस्टर, ब्लेड, पेंसिल-रबर, पेन तथा अन्य स्टेशनरी भी साहब के घर जाने लगी तो स्टाफ चौकन्ना हुआ।

लोगों ने खोजबीन की तो पता चला कि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिए स्टेशनरी आदि का इंतजाम भी सरकारी खर्चे से ही कर रहे हैं। जब बड़े साहब का यह हाल था तो स्टाफ कहां पीछे रहने वाला।

साहब के नाम पर स्टाफ ने भी खूब हाथ साफ किया। सरकारी नौकरी है तो सरकारी माल भी अपना। कम कीमत का हो या ज्यादा का, इससे क्या फर्क पड़ता है?

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