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चुनाव में उभरते दलित चेहरे : नया नेतृत्व तैयार कर रही भाजपा, जाटव समाज को साधने की तैयारी

Fri, 28 Jan 2022 07:05 AM IST
योगेश साहू सचिन मुद्गल, अमर उजाला, लखनऊ।
सचिन मुद्गल, अमर उजाला, लखनऊ। Published by: योगेश साहू Updated Fri, 28 Jan 2022 07:05 AM IST
सार

भाजपा ने जाटव, खटीक, वाल्मीकि, पासी, कोरी, धनगर समाज का नया नेतृत्व तैयार किया है। समाज से जुड़े सांसदों और कार्यकर्ताओं को सरकार और संगठन में अहम जिम्मेदारी देकर उनके समाज को भी संदेश दिया जा रहा है कि भाजपा में ही उन्हें पूरा सम्मान मिल सकता है।

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Emerging Dalit faces in UP elections 2022 : BJP preparing new leadership, preparing to serve Jatav society
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विस्तार

वोटबैंक की राजनीति और विभिन्न जातियों में पैठ बढ़ाने के लिए राजनीतिक दलों ने उसी जाति-वर्ग के लोगों में से नेतृत्व उभारने की कवायद शुरू कर दी है। हाशिए पर पड़े लोगों की हसरतों को राजनीतिक दलों ने हाल के दिनों में बखूबी समझा है। अगड़ों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा इसमें सबसे आगे है। 90 के दशक में दलितों का एक झुकाव एक तरफ ही था, लेकिन अब सियासी दलों ने इस समाज से ही नेतृत्व खड़े करने शुरू कर दिए हैं। सियासी दल यह समझाने में सफल रहे कि उनके बीच का नेता उनके हितों के लिए बेहतर तरीके से संघर्ष कर सकता है।

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 साल 2014 में लखनऊ के जरिये पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल कर दिल्ली की कुर्सी संभालने वाली भाजपा को यह समझ में आ गया है कि, यह सफर प्रदेश के दलितों और अति दलितों को साथ लिए बिना पूरा नहीं हो सकता। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि दलित वर्ग को अपना परंपरागत वोट बैंक बना लिया जाए, तो लखनऊ से दिल्ली तक की सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रहा जा सकता है। यही वजह है कि भाजपा ने दलित वर्ग के बीच नया नेतृत्व तैयार करने में पूरी ताकत लगा दी है। 
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इन्हें सरकार, संगठन और सदन में प्रतिनिधित्व देकर भाजपा के साथ लामबंद करने की कोशिशें हो रही हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीतिक विज्ञान के प्रो. संजय गुप्ता भी कहते हैं, प्रदेश की राजनीति में कमजोर होती बसपा के दलित वोट बैंक पर कब्जा जमाने के लिए भाजपा ने सधी हुई रणनीति तैयार की है। यूपी के दलित वर्ग का जितना प्रतिनिधित्व मोदी-योगी सरकार में दिखता है उतना पहले नहीं था। यह उसकी रणनीति का ही हिस्सा है।
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अब जाटव मतदाताओं को लुभाने की तैयारी
भाजपा बसपा के परंपरागत मतदाता जाटवों को लुभाने में जुटी है। पार्टी का मानना है कि यदि जाटव वोट बैंक में 50 प्रतिशत भी सेंध लगाने में सफल हो गई, तो उसे सत्ता में बने रहने में कोई परेशानी नहीं होगी।

भाजपा : नेताओं को दी अहम जिम्मेदारी
भाजपा ने जाटव, खटीक, वाल्मीकि, पासी, कोरी, धनगर समाज का नया नेतृत्व तैयार किया है। समाज से जुड़े सांसदों और कार्यकर्ताओं को सरकार और संगठन में अहम जिम्मेदारी देकर उनके समाज को भी संदेश दिया जा रहा है कि भाजपा में ही उन्हें पूरा सम्मान मिल सकता है। कोरी समाज के वोट बैंक को पक्का करने के लिए भाजपा ने भानु प्रताप वर्मा को मोदी मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री बनाया है। वहीं पूर्व पुलिस महानिदेशक ब्रजलाल को भाजपा ने राज्यसभा का सदस्य बनाया है। धनगर समाज के एसपी सिंह बघेल को केंद्र में राज्यमंत्री बनाया गया है। 

पासी समाज को केंद्र सरकार में प्रतिनिधित्व देने के लिए मोहनलालगंज के सांसद कौशल किशोर को भी राज्यमंत्री बनाया गया है। वहीं, पासी समाज के बीच से सांसद कमलेश पासवान भी पार्टी की पैठ बढ़ा रहे हैं। धानुक समाज के बीच इटावा के सांसद और पूर्व मंत्री रामशंकर कठेरिया, सोनकर समाज के बीच भाजपा के सांसद और राष्ट्रीय मंत्री विनोद सोनकर, खटीक समाज के बीच राज्यमंत्री दिनेश खटीक, जाटव समाज के बीच पकड़ मजबूत बनाने के लिए बेबीरानी मौर्य और असीम अरुण को जुटाया गया है।

पहले गैर जाटव दलितों को साधा
बसपा के उभार के कुछ वर्षों बाद से ही प्रदेश का दलित वोट धीरे-धीरे बसपा के साथ लामबंद होता रहा। अपवाद को छोड़कर बसपा को प्रदेश के पूरे दलित समाज का राजनीतिक प्रतिनिधि माना जाने लगा। भाजपा ने 2014 से पहले गैर जाटव दलित जातियों को साधने का कार्ड खेला जो सफल भी रहा। उसके बाद पार्टी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में भी गैर जाटव दलित वोट बैंक पर ही फोकस किया गया। 

एससी वर्ग के लिए आरक्षित 84 सीटों में से जाटव समाज को 20 दी गईं, जबकि 65 पर पासी, कोरी, वाल्मीकि, खटीक सहित दलित और अति दलित वर्ग की जातियों के उम्मीदवार उतारे गए। नतीजतन अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित 84 में से 72 सीटें भाजपा ने जीती थीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने दलित वर्ग में गैर जाटव वोट बैंक को साधने की रणनीति कायम रखी। भाजपा की सीटें भले ही 2014 की तुलना में कम हुईं, लेकिन मत प्रतिशत 50 तक पहुंच गया।

सपा : दलित चिंतकों को तरजीह, समाज पर फोकस
सपा ने दलित वोटबैंक को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सामाजिक ताना-बाना भी बुना है। पार्टी में दलित चिंतकों को तवज्जो दी गई। कांशीराम से जुड़ी पृष्ठिभूमि वाले नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारी दी गई। आंबेडकरवाद को समाजवाद से जोड़कर प्रचारित और प्रसारित करने की भी रणनीति बनाई गई। 

सहारनपुर निवासी और दलित महासभा से जुड़े राहुल भारती को समाजवादी पार्टी ने अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई। हमीरपुर निवासी और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ उपाध्यक्ष रहे चंद्रशेखर चौधरी को समाजवादी बाबा साहब वाहिनी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। इसी तरह कौशांबी निवास राम करन निर्मल को समाजवादी लोहिया वाहिनी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया।

समाज को जोड़ने के लिए वर्चुअल बैठकें
इंद्रजीत सरोज को संगठन में शामिल किया, तो कांशीराम के सहयोगी रहे पूर्व कैबिनेट मंत्री केके गौतम को सुरक्षित सीटों की जिम्मेदारी दी गई है। वे सुरक्षित सीटों पर संगोष्ठी करके दलित समाज को यह समझाने का प्रयास कर चुके हैं कि संविधान को बचाने और डॉ. आंबेडकर के सपने को साकार करने में सपा ही सक्षम है। अब वे हर दिन किसी न किसी विधानसभा क्षेत्र में वर्चुअल बैठक कर रहे हैं। 


इसी तरह चिकित्सा एवं शिक्षा संस्थानों में मौजूद दलित चिंतकों ने भी वर्चुअल अभियान शुरू किया है। पूर्व सांसद सावित्री बाई फुले की ओर से आयोजित कार्यक्रम में खुद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव हिस्सा ले चुके हैं। अखिलेश हर बैठक में यह कहने से नहीं चूकते कि अब समाजवाद और आंबेडकरवाद साथ-साथ चल रहा है। वह अपने वक्तव्य में संविधान बचाने और डॉ. आंबेडकर के सपने की दुहाई भी देते हैं।

दलितों का वोटिंग पैटर्न (प्रतिशत में)
वर्ग कांग्रेस भाजपा बसपा सपा
जाटव 9 8 6 3
अन्य दलित 2 31 43 10
(स्रोत : सीएसडीएस)

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