अगले साल से फिर चुनावी शोर में डूब जाएगा यूपी, विधान परिषद से लेकर होंगे ये चुनाव
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‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ पर बहस भले ही लोकसभा और विधानसभा चुनाव को एक साथ कराने पर हो। मंशा देश के धन व समय की बचत की हो। पर, इनके अलावा भी कई ऐसे चुनाव हैं जिनकी अलग-अलग समय और प्रक्रिया होने के कारण विकास कार्य प्रभावित होते हैं।
उत्तर प्रदेश को ही लें तो अगले साल के शुरू से ही फिर चुनावी शोर शुरू हो जाएगा, जो विधानसभा चुनाव 2022 तक जारी रहेगा। इन दो वर्षों में विधान परिषद से लेकर पंचायतों तक के चार चुनाव होंगे। ऐसे में आचार संहिता के चलते विकास कार्यों पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
ऐसे में ये सुझाव सार्वजनिक होने लगे हैं कि राज्य स्तर पर होने वाले चुनाव पर खर्च होने वाले धन व समय की बचत पर भी विचार होना चाहिए। साथ ही आचार संहिता को लेकर भी कुछ ऐसे बदलाव करने की जरूरत है जिनसे विकास कार्यों पर कम से कम प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
क्षेत्रीय राजनीति पर कई शोधपत्र प्रस्तुत कर चुके प्रो. अश्विनी कुमार दुबे के अनुसार, अधिक चुनाव लोकतंत्र की खूबसूरती हैं। इससे राजनीतिक दलों पर जनता का दबाव रहता है। यह खूबसूरती खत्म नहीं की जानी चाहिए, लेकिन बदले वक्त में बात आचार संहिता लागू करने के तौर-तरीकों में बदलाव पर होनी चाहिए।
होंगे ये चुनाव
अगले वर्ष के शुरू में विधान परिषद के स्नातक व शिक्षक कोटे की 11 सीटों के चुनाव होंगे। इन 11 विधान परिषद क्षेत्रों का विस्तार प्रदेश के लगभग दो तिहाई हिस्से तक है। चुनाव प्रक्रिया मार्च-अप्रैल में होगी, पर इनकी तैयारी जनवरी से ही शुरू हो जाएगी। इसके बाद पंचायत चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
पंचायत चुनाव दो चरणों में होंगे। पहले चरण में जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत सदस्यों के चुनाव होंगे और दूसरे चरण में ग्राम पंचायत सदस्यों व ग्राम प्रधानों के। इसके चलते ग्रामीण इलाकों में आचार संहिता लगे होने से विकास कार्य प्रभावित होंगे।
इन चुनावों से निपटने के बाद 2021 में क्षेत्र व जिला पंचायत प्रमुखों के चुनाव का समय आ जाएगा। इनमें आचार संहिता तो नहीं लगेगी, लेकिन प्रदेश चुनावी शोर से मुक्त भी नहीं रहेगा। जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत अध्यक्षों के चुनावों के बाद विधान परिषद के स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र की 36 सीटों के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसकी प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। विधानसभा चुनाव निपटने के बाद फिर निकायों के चुनाव का शोर शुरू हो जाएगा। इसके चलते शहरी क्षेत्रों में आचार संहिता लग जाएगी।
पंचायत व निकाय चुनाव साथ कराने की हो पहल
डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विवि की पूर्व विभागाध्यक्ष अर्थशास्त्र प्रो. एपी तिवारी का कहना है कि यूपी में प्रतिवर्ष कोई न कोई चुनाव होता है। बड़ा प्रदेश होने के नाते चुनावी प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत लंबी होती है। ऐसे में इस बारे में सोचना जरूरी है।
लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ कराने पर बहस का जो भी नतीजा निकले, लेकिन प्रदेश में पंचायतों और निकायों के चुनाव एक साथ कराकर इस दिशा में पहल की जा सकती है। इससे राजकोष पर आर्थिक भार भी कम होगा और चुनी हुई सरकारों को काम करने का ज्यादा अवसर मिलेगा।
आचार संहिता में बदलाव पर सोचें
लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. एसके द्विवेदी का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया या इसकी समय सीमा में कटौती उचित नहीं है। अलबत्ता आचार संहिता को लेकर बदलाव पर बात जरूर होनी चाहिए।
अधिकारी मौजूदा आचार संहिता को लागू करने में कई बार लकीर के फकीर की तरह काम करने लगते हैं। इस बारे में उन्हें प्रशिक्षित करने की जरूरत है। साथ ही चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्थाओं को भी अधिक व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। उद्देश्य निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव होना चाहिए, न कि विकास कार्यों पर अंकुश।