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यूपी में नासूर बनी ये बीमारी, पर सरकार बेफिक्र!
टीम डिजिटल/गोरखपुर
Updated Sat, 30 Nov 2013 06:25 PM IST
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केंद्र व राज्य सरकार चाहे जो दावा करें, लेकिन पूर्वांचल के लिए नासूर बनी इंसेफेलाइटिस से होने वाली मौतों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है।
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साल बीतने में अभी एक माह बाकी है, लेकिन गोरखपुर मंडल में यह संख्या 577 हो गई है। पिछले साल नवंबर तक 463 मौतें ही हुई थीं।
देश में इस बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित इस इलाके में न तो दिल्ली से मुफ्त में बांटा जाने वाला वैक्सीन पहुंचा है और न ही स्वच्छ पेयजल का पुख्ता बंदोबस्त हो पाया है।
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हुई लापरवाही की इंतहा
मेडिकल कॉलेज में इस साल अब तक 2019 मरीज इलाज के लिए आ चुके हैं। इनमें 171 मरीजों का इलाज अभी भी चल रहा है। इस रोग का सबसे ज्यादा कहर गोरखपुर के ग्रामीण इलाकों, कुशीनगर व महराजगंज जिलों पर है। डॉक्टरों के मुताबिक बीमारी के गंभीर रूप लेने का प्रमुख कारण प्राथमिक इलाज में बरती जा रही लापरवाही है।
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मेडिकल कालेज पहुंचने तक मरीज की स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि उसकी मौत हो जाती है और यदि वह बच गया तो विकलांगता का शिकार हो जाता है।
मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. रमेश प्रसाद को केंद्र सरकार द्वारा चार अक्तूबर में लॉन्च किए गए जेनवैक वैक्सीन की जानकारी ही नहीं है।
टीका लगने के बाद भी जेई के मरीजों के सामने आने के चलते अब बच्चों को दो डोज में टीके दिए जा रहे हैं। मौतों की मूल वजह तलाशने के लिए उस्मानिया विश्वविद्यालय के प्रो. पी. नागाभूषण राव के अध्यक्षता में 15 दिन पहले कमेटी गठित की गई है, जो तीन माह में राज्य सरकार को रिपोर्ट देगी।
प्रो. राव के प्रयास से आंध्र प्रदेश में इंसेफेलाइटिस से मौत का प्रतिशत शून्य हो गया है।
अब भी अबूझ पहेली है एईएस
जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) व एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) में जेई की पहचान तो कर ली गई है, लेकिन एईएस अभी अबूझ पहेली है। राष्ट्रीय विषाणु संस्थान, पुणे की गोरखपुर इकाई के वैज्ञानिक अधिकारी डा. मिलिंद गोरे का कहना है कि एईएस के अंतर्गत करीब डेढ़ सौ वायरस होते हैं, जिनकी पहचान नहीं की जा सकी है।
कैसे फैलती है इंसेफेलाइटिस
इंसेफेलाइटिस जलजनित या मच्छरजनित हो सकती है। दोनों तरह की बीमारियों को एईएस की श्रेणी में रखा जाता है। यह बीमारी जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस के कारण होती है। यह क्यूलेक्स नाम के मच्छर के जरिए फैलता है। सुअर, जंगली पक्षी भी इस वायरस के स्रोत होते हैं।