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सुना है क्या: 'मुख्य बनने का सपना', साथ ही 'लिखने वाले जिम्मेदार और ताड़ से गिरे खजूर पर अटके' के किस्से

Mon, 14 Sep 2026 12:40 PM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: Bhupendra Singh Updated Mon, 14 Sep 2026 12:40 PM IST
सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...

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dream of becoming chief along with predicament of falling from palm tree only to get stuck on date palm
सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'मुख्य बनने का सपना' की कहानी। इसके अलावा 'लिखने वाले जिम्मेदार, पढ़ने वाले नहीं' और 'ताड़ से गिरे खजूर पर अटके' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

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मुख्य बनने का सपना

एक नौकरशाह इन दिनों उठते-बैठते, सोते-जागते भविष्य में मुख्य बनने का सपना देख रहे हैं। इसके लिए अभी से गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं, ताकि जब दौड़ शुरू हो तो कोई दिक्कत न आए। पिछले छह माह से उनके यहां बाल सुविधा के लिए कई सौ करोड़ रुपये का बजट है, पर बताते हैं कि वे भविष्य को ध्यान में रखते हुए इसे खर्च करने में ज्यादा रुचि नहीं दिखा रहे हैं। किसी तरह यह बजट अगले वित्त वर्ष के लिए स्थानांतरित हो जाए तो उन्हें लगता है कि उनके सपनों को पंख लग सकते हैं।

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लिखने वाले जिम्मेदार, पढ़ने वाले नहीं

सूबे के एक कमिश्नरेट ने कुछ ऐसा कारनामा कर दिया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। शीर्ष अदालत की अवहेलना का मामला बना तो सबकी सांस ऊपर-नीचे होने लगी। आनन-फानन में बलि का बकरा तलाशा जाने लगा और नोटिस लिखने वाले को निपटा दिया गया। सवाल ये है कि सारी गलती उसकी थी तो उसे पढ़ने वाले क्या कर रहे थे। खैर अब तो यह रोज का मामला हो चुका है। शायद ही कोई दिन जाता हो जब नीचे वालों की कारस्तानी की वजह से बड़े अफसरों को शर्मिंदा होना पड़ रहा है। सुना है कि इस वाकये ने नीचे वालों को सोचने को मजबूर कर दिया है कि लिखा-पढ़ी करने से पहले अपनी सुरक्षा का इंतजाम कर लें।

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ताड़ से गिरे खजूर पर अटके

चुनावी बयार में वैसे तो कई नेताओं को अपने भविष्य चिंता सता रही है, लेकिन पूर्व माननीय की स्थिति 'ताड़ से गिरे खजूर पर अटके' जैसी हो गई है। दरअसल बीते चुनाव में माननीय को पराजय का सामना करना पड़ा था, तभी से माननीय साइडलाइन थे। बड़ी मेहनत से माननीय ने ऊपर के समीकरण को ठीक किया तो पश्चिम बंगाल में ड्यूटी मिली। इससे माननीय को लगा कि अब आगे का रास्ता ठीक होगा। इसी बीच माननीय को संगठन में स्थान तो दिया गया, लेकिन वह असरकारी नहीं है। उधर जिस सीट से वे जीतते रहे हैं, उस पर भी संकट है। क्योंकि उस सीट पर नए सहयोगी दल का कब्जा है। ऐसे में माननीय को यह चिंता सता रही है कि फिर कैसे सदन में पहुंचे।

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