फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Doctors saved a child from a critical stage.

गर्भ में पल रही बच्ची का हार्ट फेल, फिर हुआ चमत्कार...

Wed, 06 Jan 2016 01:01 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 06 Jan 2016 01:01 AM IST
विज्ञापन
Doctors saved a child from a critical stage.

गर्भ में पल रही बच्ची का हार्ट फेल हो गया। कारण, प्लेसेंटल कोरियोएंजियोमा (अपरा में बनी गांठ)। कोख में साढ़े सात महीने की जिंदगी को बचाने के लिए एसजीपीजीआई के डॉक्टरों ने दिन-रात एक कर दिया।

विज्ञापन


सबसे बड़ी चुनौती थी इस गांठ से महज 4 मिमी के फासले पर नाल को रक्त पहुंचाने वाली धमनी। चूक की कोई गुंजाइश बच्ची की धड़कन को हमेशा के लिए बंद कर देती। इस 4 मिमी के फासले में महज 15 सेकंड में निडिल चलानी थी।
विज्ञापन


मैटनरल हेल्थ विभाग की डॉ. मंदाकिनी प्रधान और उनकी टीम ने इस चुनौती से पार पाने के लिए दुनिया के तमामजर्नल खंगाले। डमी पर कई दफे अभ्यास किया।

...और फिर 2 दिसंबर को बेहद मुश्किल सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। यह बच्ची 31 दिसंबर को दुनिया में आई और स्वस्थ है। डॉक्टरों का दावा है कि देश में इस किस्म की यह पहली सर्जरी थी तो दुनिया का यह आठवां मामला था।
विज्ञापन
विज्ञापन

दो हफ्ते से फेल था हृदय

Doctors saved a child from a critical stage.

डॉ. मंदाकिनी प्रधान के मुताबिक प्लेसेंटल कोरियोएंजियोमा की वजह से नाल के जरिये मां से बच्ची को रक्त मिलने में बाधा आ गई थी।

खून का अधिकतर भाग भ्रूण के पास पहुंचने के बजाय गांठ में जाने लगा, जिससे गांठ बढ़ती गई और भ्रूण कमजोर होने लगा। पर, इसी बीच भ्रूण के हृदय ने ज्यादा रक्त पंप करने की कोशिश की।

इस असफल प्रयास के बाद हृदय ने काम ही करना बंद कर दिया। हार्ट फेल हुए करीब दो सप्ताह बीत चुके थे। हार्ट फेल होने पर उसमें पानी भरने लगता है और इससे भ्रूण का हृदय भी फैलने लगा था।

छाती के 70 प्रतिशत हिस्से में हृदय फैल गया था। इसमें सुधार के लिए पहले गर्भ में पल रही बच्ची को 1 दिसंबर को 50 एमएल खून चढ़ाया गया। उम्मीद की किरण दिखी।

बीमारी तलाशी, फिर इलाज तलाशा

Doctors saved a child from a critical stage.

डॉ. मंदाकिनी के मुताबिक आमतौर पर प्लेसेंटल कोरियोएंजियोमा 4 सेमी से छोटा ही होता है। यह 1000 में से एक मामले में हो सकता है और प्रसव में या भ्रूण के लिए गंभीर खतरा नहीं बनता। लेकिन इस केस में 10 सेमी तक पहुंच गया।

इसे जॉइंट कोरियोएंजियोमा कहते हैं। मेडिकल जर्नल खंगाले तो दुनिया में 7 ऐसे केस दर्ज होने की जानकारी मिली।

उनमें अपनाई गई इलाज प्रक्रिया और सर्जरी को हमने आजमाने की ठानी। गांठ को खून पहुंचाने वाली धमनी को बंद करने का फैसला किया गया। जिससे गांठ का बढ़ना रुके और भ्रूण को रक्त मिले।

4 मिमी थी जिंदगी और मौत में दूरी

Doctors saved a child from a critical stage.

गांठ को खून पहुंचाने वाली धमनी को बंद करने के लिए हिस्टोक्रिल (बुटाइल साइनोएक्र्रिलेट) का इस्तेमाल करने का फैसला किया गया। हिस्टोक्रिल एक प्रकार का गोंद है, जो कोशिकाओं को चिपकाने के काम आता है। पर,  इस गोंद से धमनी को सील करना आसान नहीं था।

हिस्टोक्रिल की केवल 1.5 एमएल मात्रा को सूई के जरिये गांठ में रक्त पहुंचाने वाली धमनी में ले जाकर उसे सील करना था।  गांठ को रक्त पहुंचा रही धमनी के 4 मिलीमीटर के पास ही नाल को रक्त पहुंचा रही धमनी भी थी।

हिस्टोक्रिल की जरा भी मात्रा नाल की धमनी में पहुंच जाती, तो भ्रूण को बचाना संभव नहीं होता। दूसरी मुश्किल थी खुद वह गोंद जिसे तैयार करने के 15 सेकंड के भीतर उपयोग भी कर लेना होता है, वरना वह सूख कर बेकार हो जाता।

...और आखिर मुश्किल जंग से हुई जीत

Doctors saved a child from a critical stage.

डॉ. मंदाकिनी बताती हैं-मैं पहली दफा इस तरह की सर्जरी करने जा रही थी। इसके लिए 1 दिसंबर को ही एक डमी पर टीम के साथ सर्जरी की प्रैक्टिस की। इस दौरान ही हर सदस्य की जिम्मेदारी तय कर दी गई।

मुझे भी 15 सेकंड और 4 मिमी के दायरे का ध्यान रखते हुए सटीकता से सुई का उपयोग करना सीखना पड़ा। 2 दिसंबर को सर्जरी से एक घंटा पहले फिर से डमी पर प्रैक्टिस की गई, जिससे सटीकता बढ़ी और सर्जरी सफल रही।

इस टीम ने की सर्जरी
डॉ. मंदाकिनी प्रधान और डॉ. नीता, डॉ. संगीता यादव, डॉ. विवेक सिंह, डॉ. राधिका और डॉ. पायल की टीम ने अंजाम दिया।

...और बिटिया का जन्म

Doctors saved a child from a critical stage.

रक्त मिलना बंद होने से गांठ का बढ़ना रुका। 31 दिसंबर को वंदना की सिजेरियन डिलीवरी की गई। इसमें वह गांठ भी निकाली गई, जो करीब 500 ग्राम की थी।

डॉ. मंदाकिनी ने बताया कि अपरा का वजन भी 500 ग्राम था। बच्ची का वजन सवा तीन किलोग्राम था।

उसे नियो-नेटल केयर की जरूरत नहीं हुई और उसकी मां वंदना भी पूरी तरह स्वस्थ है।

यह था केस : अस्पताल ने कह दिया था- दो भ्रूण हैं, एक मृत

Doctors saved a child from a critical stage.

बाराबंकी के विवेक शुक्ला की पत्नी वंदना शुक्ला दूसरी दफा गर्भवती हुईं तो चेकअप निशातगंज स्थित फातिमा अस्पताल में चल रहा था।

वंदना ने बताया कि सितंबर में हुए एक अल्ट्रासाउंड टेस्ट के बाद उन्हें चिकित्सकों ने कहा कि उनके गर्भ में दो भ्रूण हैं। इनमें से एक मृत है। दूसरे को भी बचाना संभव नहीं है।

सर्जरी करनी होगी, लेकिन इसमें खुद वंदना की जान को भी खतरा है। इस दौरान चार दफा कलर अल्ट्रासाउंड करवाए गए, लेकिन वही निष्कर्ष दिया गया।

वे एसजीपीजीआई में डॉ. मंदाकिनी प्रधान के पास इलाज के लिए पहुंचे जहां जांच में खुलासा हुआ कि बच्चे के प्लेसेंटल में गांठ है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed