डॉक्टर्स बोले, मरीजों को कंगाल बना रहा है इलाज
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अच्छा इलाज सभी चाहते हैं लेकिन इसका मतलब महंगा इलाज कब से हो गया। हमारे तमाम सरकारी और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के खर्च से जो स्वास्थ्य सेवाएं बनी हैं उनमें से 17 प्रतिशत ही आम नागरिकों की ही पहुंच में हैं। बाकी बिना इलाज या निजी क्षेत्र के रहमो करम पर हैं।
100 मरीजों में से 23 इस इलाज का भार उठा ही नहीं सकते और 40 प्रतिशत इलाज करवाते-करवाते अपने खेत-जमीन और गहने तक बेच चुके होते हैं। हमारे देश ने ये कैसी स्वास्थ्य सेवाएं विकसित कर ली हैं। कौन इसका समाधान देगा। आप चिकित्सक और इस क्षेत्र के लोगों का इस ओर ध्यान नहीं है तो आप ही बताएं कि आखिर कैसे आपका ध्यान खींचा जाए।’
चिकित्सा जगत से यह सीधा संवाद प्रबंधन के विशेषज्ञ आईएमएस लखनऊ यूनिवर्सिटी के निदेशक प्रो. अरविंद मोहन सहित देश के प्रमुख चिकित्सकों ने किया। मौका था एसजीपीजीआई के 26वें स्थापना दिवस पर ‘कॉस्ट इफेक्टिव मेडिसिन’ विषय पर आयोजित सिंपोजियम का।
इन विशेषज्ञों ने फार्मा कंपनियों की डॉक्टरों के साथ मिलकर की जा रही कारगुजारियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा भारत में मरीजों को ग्राहक बना देने का रवैया सामने रखा।
1800 रुपए की एंटीबायोटिक 72 हजार में
डीन प्रो. यूके मिश्रा ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि ब्रेन हैमरेज के मरीजों में 15 दिन में 13-13 एक्सरे निकाले जा रहे हैं, इसकी जरूरत क्या है। उन्होंने डॉक्टरों से पूछा कि क्या इससे उनके इलाज करने के तरीके में कोई बदलाव आता है, कोई भी जांच अगर आपके इलाज करने के तरीके में बदलाव नहीं लाएगी तो उस जांच को करवाने का भला क्या तुक रह जाता है।
ब्लड कल्चर और यूरीन कल्चर भी जबरन बार-बार करवाए जा रहे हैं जबकि इनकी जरूर भी नहीं है। प्रो. मिश्रा ने आईसीयू में होने वाली मरीजों से लूट का खुलासा किया और कहा कि इस दौरान मरीज को करीब 10 दिन का एंटीबायोटिक कोर्स दिया जाता है।
इसके लिए 18 सौ रुपये की एंटी बायोटिक्स आसानी से उपलब्ध हैं, लेकिन 72 हजार की मीरोपीनम जैसी एंटीबायोटिक्स मरीजों को दी जा रही हैं, इसके लिए डॉक्टरों को कौन कहता है। प्रो. मिश्रा ने अध्ययनों के आधार पर बताया कि महंगी दवाओं की मरीजों को सिफारिश करने वालों में 47.4 प्रतिशत स्पेशलिस्ट और 52.6 प्रतिशत सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स हैं।
उन्होंने सभी चिकित्सकों से निवेदन किया कि जेनेरिक दवाओं के होते ब्रांडेड और महंगी दवाएं कतई न दी जाएं, यही इलाज को सस्ता करने में मदद करेगा।
यूपी में हर साल मरते हैं 5 लाख बच्चेः प्रो. अरविंद मोहन
देश में हर साल 20 लाख से अधिक बच्चों की मौत उन बीमारियों से हो रही है, जिनका इलाज आसानी से किया जा सकता है। यूपी में इनमें से 25 प्रतिशत मौतें हो रही हैं। हमने लक्ष्य बनाया था कि 2015 तक शिशु मृत्यु दर 33 पर ले आएंगे, लेकिन अब यह लक्ष्य 2027 में पूरा होता दिख रहा है।
इसके लिए सीधे तौर पर स्वास्थ्य सेवाओं का सभी तक नहीं पहुंचना और उनका महंगा होना है। 23 प्रतिशत नागरिक आज भी बीमारी में इलाज करवाने में सक्षम नहीं हैं और 40 प्रतिशत इलाज के दौरान जमीन-गहने तक बेच देते हैं। इतनी बड़ी संख्या में जब मरीजों को इलाज नहीं मिल रहा है तो समझा जा सकता है कि सिस्टम कहीं न कहीं फेल हो चुका है।
प्रो. मोहन ने कहा कि देश में विदेशी फार्मा कंपनियों इलाज लगातार महंगा हो रहा है। सबसे ज्यादा बिकने वाली 300 दवाओं में केवल 38 प्रतिशत ही जीवन रक्षक कही जा सकती हैं जबकि 62 प्रतिशत दवाएं अन्य वर्गों की बेची जा रही हैं। विटामिन टॉनिक और ब्रेन टॉनिक की संख्या सबसे ज्यादा है जिसकी किसी स्वस्थ मनुष्य को जरूरत भी नहीं। यह सब कॉरपोरेट द्वारा बनाई जा रही बीमारियों का डर बताकर बेची जा रही हैं।
बार-बार टेस्ट क्यों करवाते हो
प्रो. सुनील कुमार पांडेय ने इलाज के महंगा होने में मरीजों के बार बार टेस्ट्स करवाने की डॉक्टरों की प्रवृत्ति की आलोचना की। उन्होंने कहा कि सामान्य निमोनिया के मरीज का भी सीटी-स्कैन, एमआरआई स्कैन, आदि करवाए जाते हैं।
वजह दी जा रही है कि केस में कोई और कॉम्प्लिकेशन आने की संभावना को रूल आउट करने के लिए यह जरूरी है। ऐसे डॉक्टरों का अपनी एमडी की पढ़ाई फिर से करने की जरूरत है। वे सीधे लक्षण समझकर कर निमोनिया का इलाज करें तो मरीज को ज्यादा मदद कर पाएंगे।
प्रो. पांडेय ने इलाज के लिए मंत्रीजी के ‘कोई’ आने पर उन्हें प्रभावित करने के लिए आईसीयू में भर्ती करने के सिस्टम के खिलाफ भी कहा कि इससे वे उलटे उस कोई का स्वास्थ्य और बिगाड़ रहे हैं। वहीं किसी वाजिब मरीज को इलाज से महरूम कर रहे हैं।
करोड़ों के उपकरण खरीदे, इसलिए जबरन उसी से इलाज करेंगे
उन्होंने अपना एक अनुभव सामने रखा जिसमें बताया कि एक चिकित्सालय ने करोड़ों रुपये खर्च करके गामा नाइफ अपने अस्पताल के लिए खरीदा। लेकिन उससे कुछ लाख रुपये का ही इलाज हो पा रहा था।