30 घंटे में डॉक्टरों ने मरीज को दे दिया नया जीवन
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संजय गांधी पीजीआई में तीस घंटे तक लगभग इतने ही चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ की टीम ने एक और मरीज का लिवर ट्रांसप्लांट कर उसे नया जीवन दिया।
बीते 25 दिन में यह दूसरा लिवर ट्रांसप्लांट एसजीपीजीआई के चिकित्सकों की टीम ने किया है। कई साल के इंतजार के बाद एसजीपीजीआई में लाइव लिवर ट्रांसप्लांट का सिलसिला शुरू हुआ है।
लगभग साल भर पहले केजीएमयू से मिले कैडवर से लिवर ट्रांसप्लांट शुरू किया गया था लेकिन एक मरीज की मौत के बाद इस पर विराम लग गया था।
संजय गांधी पीजीआई में एक बार फिर लिवर प्रत्यारोपण शुरू हो गया। मात्र 25 दिन के अंदर दूसरा लिवर प्रत्यारोपण डॉ. अभिषेक यादव के नेतृत्व में किया गया। लगभग 30 घंटे चला ट्रांसप्लांट बुधवार दोपहर बाद लगभग तीन बजे खत्म हुआ। निदेशक प्रो. राकेश कपूर ने बताया कि संजीत पटेल नाम के मरीज का ट्रांसप्लांट किया गया है।
लिवर ट्रांसप्लांट टीम में प्रो. अभिषेक यादव, डॉ.सुप्रिया, एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. देवेंद्र गुप्ता, डॉ. संदीप कोबा और 25 से अधिक रेजीडेंट शामिल थे। प्रो. राकेश कपूर ने बताया कि इससे पहले 25 जुलाई को पहला लिवर ट्रांसप्लांट किया गया था।
रोहित नाम के मरीज को उसकी पत्नी रंजना ने लिवर दिया था। रोहित को लगभग 22 दिन बाद वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया।
नए विशेषज्ञ ने स्वीकारी चुनौती
संजय गांधी पीजीआई में लगभग ठप हो चुके लिवर ट्रांसप्लांट को दोबारा शुरू करने की चुनौती डॉ. अभिषेक यादव ने स्वीकार की। निदेशक प्रो. राकेश कपूर ने विशेष प्रयास कर डॉ. अभिषेक को पीजीआई बुलाया।
वह दक्षिण भारत के एक अस्पताल में लिवर ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। डॉ. अभिषेक को 1500 ट्रांसप्लांट का अनुभव है।
इससे पहले कई सौ करोड़ रुपये से बनी ट्रांसप्लांट यूनिट लगभग ठप पड़ी थी। किसी तरह कैडवर से ट्रांसप्लांट शुरू हुआ लेकिन एक महिला मरीज की मौत के बाद वो भी रोक दिया गया था।
क्या है लाइव ट्रांसप्लांट
अंग प्रत्यरोपण दो प्रकार के होते हैं। एक मरीज के किसी परिवारीजन से मिले अंग से और दूसरा मस्तिष्क मृत व्यक्ति के अंगदान से। जब मरीज का परिवारीजन अपना अंग देता है तो उसे लाइव आर्गन ट्रांसप्लांट कहते हैं।
जब मस्तिष्क मृत (ब्रेन डेथ) का अंग लिया जाता है तो कैडवर ट्रांसप्लांट कहा जाता है। कैडवर के मुकाबले लाइव ट्रांसप्लांट को कठिन माना जाता है कि क्योंकि इसमें एक स्वस्थ व्यक्ति के अंग को निकालकर मरीज को लगाया जाता है। इससे मरीज और अंगदान करने वाले व्यक्ति दोनों का बचाना चिकित्सकों की टीम की जिम्मेदारी हो जाती है।