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कोरोना से जंग में मरीजों की ताकत बनीं डॉक्टर बहनें, कहा-वायरस को हराकर मानेंगे
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लखनऊ। दोनों बहने हैं और दोनों डॉक्टर हैं। छोटी ने अभी बतौर चिकित्सक पहला कदम ही बढ़ाया था कि कोरोना जैसी विशाल चुनौती से सामना हो गया। वहीं बड़ी बहन हाई रिस्क जोन में मरीजों की सेवा करते हुए खुद संक्रमित हो गई, लेकिन इसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी। डॉक्टर बहनों की जोड़ी कोरोना से जंग लड़ रहे मरीजों की ताकत बनकर खड़ी है। दोनों का मानना है कि भले ही मुश्किल घड़ी है और चुनौतियां बड़ी हैं, लेकिन हमारा हौसला भी कम नहीं है। वायरस हारेगा, इसे हम हराकर मानेंगे। आइए जानते हैं कि किस तरह चुनौतियों का सामना कर रही हैं डॉक्टर बहनें मल्लिका और देविशा अग्रवाल।
इंटर्नशिप के पहले दिन कोविड वार्ड में ड्यूटी
डॉक्टर मल्लिका अग्रवाल के एमबीबीएस का आखिरी दिन 26 अप्रैल को पूरा हुआ। एक मई से उनकी इंटर्नशिप शुरू होनी थी। इरा मेडिकल कॉलेज से वे इंटर्नशिप कर रही हैं। उन्हें पहले दिन से ही कोविड वार्ड में संक्रमित मरीजों की देखभाल में लगाया गया। मल्लिका बताती हैं कि एक डॉक्टर को युद्ध लड़ना होता है, लेकिन अभी तो मेरी पढ़ाई पूरी हुई थी, मुझे काफी कुछ सीखना था। अचानक मुझे कोविड वार्ड में ड्यूटी का आदेश मिला तो मैं डर गई थी। शायद गलत था ये सोचना पर मैंने सोचा कि मुझे कुछ हो गया तो। मां-पापा (डॉक्टर तूलिका चंद्रा व डॉक्टर राजीव अग्रवाल) को बताया तो उन्होंने सारा डर दूर कर दिया। सीनियर्स ने भी काउंसिलिंग की। पहले दिन तो जब भी समय मिलता मम्मी-पापा-बहन से फोन पर बात करती। उन्हें सब कुछ बताकर अपना साहस बढ़ाती। अगले दिन से सब कुछ नार्मल था। देश के लिए सेवा करने का मौका मिला, मां-पापा की ये बात हमेशा याद रहती है।
जब मरीजों के परिवार से बात करते हैं तो हिम्मत मिलती है
मरीज की हर सांसों पर नजर रखना, उनकी पल-पल की रिपोर्ट उनके परिवार वालों को देना और पीपीई किट में खुद को संभालना बहुत मुश्किल काम है, लेकिन मरीज के परिवारवालों का साहस हौसला देता है और हमें मरीज को हर हाल में ठीक रखने का भरोसा देता है।
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हाई रिस्क जोन का तनाव फर्ज से हारा
डॉक्टर मल्लिका की बड़ी बहन डॉक्टर देविशा अग्रवाल एमएस ईएनटी हैं और केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर के होल्डिंग एरिया में आठ-आठ घंटे तक पीपीई किट में खड़ी रही हैं। चार मई को खुद संक्रमित हुईं और तीन दिन पहले सेचुरेशन लेवल भी गिर गया था, पर दृढ़ इच्छा शक्ति के आगे बीमारी को टिकने नहीं दिया। देविशा कहती हैं कि हम सबसे ज्यादा हाई रिस्क जोन में रहे। ट्रॉमा सेंटर का होल्डिंग एरिया जहां हर तरह के मरीज आते हैं। फिर वेंटिलेटर पर पड़े मरीज की सांस की नली में छेद करके उसे गले से सांस दिलवाने जैसे जोखिम भरे काम को एक दो नहीं बल्कि चार-चार मरीजों पर एक-एक दिन में (ट्रैक्होस्टोमी) किया है। इस दौरान मुझे एक्सपोजर हुआ और मैं बीमार पड़ी थी।
घर में साझा करते हैं रोज की कहानियां
देविशा और मल्लिका बताती हैं कि अपनी-अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद और इस दौरान के अनुभवों को आपस में घर पर साझा करते हैं। मरीजों को मरते देखना और भूला देना आसान नहीं है।
बहन को बताती रहती हैं कि कैसे रखना है ध्यान
देविशा कहती हैं कि मलिका ने हाल ही में इंटर्नशिप जाइन की है। पीपीई किट पहनने से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसे सावधानी से उतारना। क्योंकि उस वक्त तो वायरस के अणु उस पर चिपक चुके होते हैं। मैं मलिका को बताती रहती हूं कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
प्रोटोकॉल न पालन करने वालों से अपील
डॉक्टर देविशा व मल्लिका कहती हैं कि हम लोग देख रहे हैं कि अभी भी लोग बीमारी को हल्के में ले रहे हैं। मास्क को लेकर गंभीर नहीं लोग। हमने पूरे के पूरे परिवारों को खत्म होते देखा है, हम डॉक्टर भी लगातार जंग लड़ रहे हैं। आप सहयोग करेंगे तो हमारी चुनौतियां भी कम होंगी और लोगों की जान भी बचाई जा सकेगी।
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इंटर्नशिप के पहले दिन कोविड वार्ड में ड्यूटी
डॉक्टर मल्लिका अग्रवाल के एमबीबीएस का आखिरी दिन 26 अप्रैल को पूरा हुआ। एक मई से उनकी इंटर्नशिप शुरू होनी थी। इरा मेडिकल कॉलेज से वे इंटर्नशिप कर रही हैं। उन्हें पहले दिन से ही कोविड वार्ड में संक्रमित मरीजों की देखभाल में लगाया गया। मल्लिका बताती हैं कि एक डॉक्टर को युद्ध लड़ना होता है, लेकिन अभी तो मेरी पढ़ाई पूरी हुई थी, मुझे काफी कुछ सीखना था। अचानक मुझे कोविड वार्ड में ड्यूटी का आदेश मिला तो मैं डर गई थी। शायद गलत था ये सोचना पर मैंने सोचा कि मुझे कुछ हो गया तो। मां-पापा (डॉक्टर तूलिका चंद्रा व डॉक्टर राजीव अग्रवाल) को बताया तो उन्होंने सारा डर दूर कर दिया। सीनियर्स ने भी काउंसिलिंग की। पहले दिन तो जब भी समय मिलता मम्मी-पापा-बहन से फोन पर बात करती। उन्हें सब कुछ बताकर अपना साहस बढ़ाती। अगले दिन से सब कुछ नार्मल था। देश के लिए सेवा करने का मौका मिला, मां-पापा की ये बात हमेशा याद रहती है।
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जब मरीजों के परिवार से बात करते हैं तो हिम्मत मिलती है
मरीज की हर सांसों पर नजर रखना, उनकी पल-पल की रिपोर्ट उनके परिवार वालों को देना और पीपीई किट में खुद को संभालना बहुत मुश्किल काम है, लेकिन मरीज के परिवारवालों का साहस हौसला देता है और हमें मरीज को हर हाल में ठीक रखने का भरोसा देता है।
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हाई रिस्क जोन का तनाव फर्ज से हारा
डॉक्टर मल्लिका की बड़ी बहन डॉक्टर देविशा अग्रवाल एमएस ईएनटी हैं और केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर के होल्डिंग एरिया में आठ-आठ घंटे तक पीपीई किट में खड़ी रही हैं। चार मई को खुद संक्रमित हुईं और तीन दिन पहले सेचुरेशन लेवल भी गिर गया था, पर दृढ़ इच्छा शक्ति के आगे बीमारी को टिकने नहीं दिया। देविशा कहती हैं कि हम सबसे ज्यादा हाई रिस्क जोन में रहे। ट्रॉमा सेंटर का होल्डिंग एरिया जहां हर तरह के मरीज आते हैं। फिर वेंटिलेटर पर पड़े मरीज की सांस की नली में छेद करके उसे गले से सांस दिलवाने जैसे जोखिम भरे काम को एक दो नहीं बल्कि चार-चार मरीजों पर एक-एक दिन में (ट्रैक्होस्टोमी) किया है। इस दौरान मुझे एक्सपोजर हुआ और मैं बीमार पड़ी थी।
घर में साझा करते हैं रोज की कहानियां
देविशा और मल्लिका बताती हैं कि अपनी-अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद और इस दौरान के अनुभवों को आपस में घर पर साझा करते हैं। मरीजों को मरते देखना और भूला देना आसान नहीं है।
बहन को बताती रहती हैं कि कैसे रखना है ध्यान
देविशा कहती हैं कि मलिका ने हाल ही में इंटर्नशिप जाइन की है। पीपीई किट पहनने से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसे सावधानी से उतारना। क्योंकि उस वक्त तो वायरस के अणु उस पर चिपक चुके होते हैं। मैं मलिका को बताती रहती हूं कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
प्रोटोकॉल न पालन करने वालों से अपील
डॉक्टर देविशा व मल्लिका कहती हैं कि हम लोग देख रहे हैं कि अभी भी लोग बीमारी को हल्के में ले रहे हैं। मास्क को लेकर गंभीर नहीं लोग। हमने पूरे के पूरे परिवारों को खत्म होते देखा है, हम डॉक्टर भी लगातार जंग लड़ रहे हैं। आप सहयोग करेंगे तो हमारी चुनौतियां भी कम होंगी और लोगों की जान भी बचाई जा सकेगी।