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ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा: जिला पंचायत में नियमों को ताक पर रख हुए लाखों के भुगतान
Sun, 19 Dec 2021 02:21 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: लखनऊ ब्यूरो
Updated Sun, 19 Dec 2021 02:21 PM IST
सार
विधानमंडल में पेश हुई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि बिल भुगतान में जिम्मेदार अधिकारियों ने मनमानी करते हुए नियमों को ताक पर रख लाखों का भुगतान कर दिया।
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- फोटो : amar ujala
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विस्तार
राजधानी लखनऊ में जिला पंचायत में लाखों रुपये के भुगतान नियमों को ताक पर रखकर किए गए। खास बात यह है कि भुगतान में जिम्मेदार अधिकारियों ने ही मनमानी की। बिना बिल व वाउचर के रुपये दे दिए गए। इसका खुलासा विधानमंडल में मुख्य लेखा परीक्षा अधिकारी सहकारी समितियां एवं पंचायतें उत्तर प्रदेश की ओर से पेश की गई वर्ष 2013-14 की रिपोर्ट में हुआ है।
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इसमें अलग-अलग कई मामलों में तत्कालीन अपर मुख्य अधिकारी अजय कुमार सिंह, अभियंता जमाल मिर्जा व अन्य से ब्याज समेत धन वसूली की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में सामने आईं गड़बड़ियां व आपत्तियां कुछ इस प्रकार हैं...।
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बिना पत्रावली व एस्टीमेट के किया 14 लाख से अधिक का भुगतान
रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2013 में अवध एडवरटाइजिंग को लखनऊ-हरदोई व लखनऊ- उन्नाव की सीमा पर स्वागत द्वार बनाने/मरम्मत के लिए 450574.48 और 966421 रुपये का भुगतान किया गया। रिपोर्ट में लगभग 14 लाख 16 हजार 995 रुपये के भुगतान की पत्रावली व स्टीमेट न होने से भुगतान में गड़बड़ी की संभावना जताई गई है। साथ ही तत्कालीन अपर मुख्य अधिकारी व अभियंता जमाल मिर्जा से ब्याज सहित वसूली की संस्तुति की गई है।
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न बिल हैं, न रसीदें, वसूली की संस्तुति
जनवरी 2014 में निर्माण कार्यों से संबंधित निविदाएं आमंत्रित करने के लिए विभिन्न समाचार पत्रों को क्रमश: 23182 और 22752 व 9043 रुपये का भुगतान किया गया, लेकिन न तो उनके बिल का ब्योरा रखा गया और न ही सूचना की कोई कटिंग मिली। ऐसे में इसे फर्जी मानते हुए तत्कालीन अपर मुख्य अधिकारी अजय कुमार सिंह से ब्याज सहित राशि वसूली के लिए अपेक्षा की गई है। यही नहीं, जनवरी 2014 में इंटरनेट लगवाने के लिए अवर अभियंता सत्य प्रकाश दुबे को 4560 रुपये का भुगतान किया गया, लेकिन दूर संचार विभाग की रसीद नहीं है। इसलिए भुगतान में गड़बड़ी की आशंका जताते हुए वसूली की संस्तुति की गई है। अन्य में वाहन की मरम्मत व अध्यक्ष के कमरे का एसी ठीक कराने के लिए क्रमश: 18491 व 8965 रुपये किए गए भुगतान में फर्मों के बिल व कैशमैमो गायब हैं। इसकी ब्याज सहित वसूली की संस्तुति की गई है। इसी तरह स्टेशनरी खरीद व वाहन मरम्मत व्यय के रूप में 22110 रुपये का भुगतान बिना बिल और कैश मैमो के किया गया। एक अन्य 16 हजार 303 रुपये का भुगतान बिना बिल के किया गया। इनकी ब्याज सहित वसूली के लिए कहा गया है।
चेक की जगह नकद लौटा दी जमानत राशि
रिपोर्ट के अनुसार, एक अन्य मामले में जमानत राशि क्रमश: 22 हजार, 70425 व 45 हजार रुपये नगद वापस किया गया। राशि प्राप्त करने वाले के हस्ताक्षर का कोई रिकॉर्ड नहीं है और भुगतान चेक से न करके नगद किया गया। इसे फर्जी मानते हुए तत्कालीन अपर मुख्य अधिकारी से ब्याज सहित राशि वसूली के लिए अपेक्षा की गई है।
बिना निरीक्षण जारी कर दिए बड़े बिल
रिपोर्ट के अनुसार, नियम है कि पांच लाख से अधिक व दस लाख रुपये से कम लागत के सभी कार्यों का अंतिम रूप से भुगतान करने से पहले परिक्षेत्रीय अधिशासी अभियंता (नियोजन) से निरीक्षण किया जाएगा, लेकिन सीसी रोड व खड़ंजा आदि के विभिन्न दस कामों के भुगतान में इसका पालन नहीं किया गया। रिपोर्ट में कुल 71 लाख 01 हजार 342 रुपये के इस भुगतान को अनियमित मानते हुए अपर मुख्य अधिकारी अजय कुमार सिंह व अभियंता जमाल मिर्जा पर कार्रवाई की अपेक्षा की गई है।
अलग-अलग दामों पर कर ली खरीद
इसी तरह सड़क निर्माण व मरम्मत के लिए ठेकेदार फर्मों ने मैक्सफाल्ट की खरीद अलग-अलग दामों पर की। इस पर भी रिपोर्ट में आपत्ति जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 19 जुलाई 2013 के प्रमाणकों के अनुसार एमआर माइन्स एंड मिनरल्स ने 40857.95 रुपये प्रति टन की दर से 1 लाख 24 हजार 984 रुपये में मैक्सफाल्ट खरीदा। वहीं, 31 जुलाई 2013 के प्रमाणक के अनुसार एमआरपी कंस्ट्रक्शन ने 55848.38 रुपये की दर से 1 लाख 29 हजार 121.45 रुपये से मैक्सफाल्ट की खरीद की। दोनों खरीद में 34484 रुपये के अंतर को गड़बड़ मानते हुए अभियंता जमाल मिर्जा से ब्याज सहित वसूली की संस्तुति की गई है। यही नहीं, नवंबर 13 में भी 28502.80 रुपये के अंतर से खरीद हुई। साथ ही एक अन्य मामले में 22615 रुपये के अंतर से मैक्सफाल्ट खरीदा गया। इन सभी की भी ब्याज सहित वसूली के लिए कहा गया है।