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जांच के नाम पर मातहत के उत्पीड़न में फंसी जिला कार्यक्रम अधिकारी
Mon, 07 Sep 2020 09:03 PM IST
पंकज श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Mon, 07 Sep 2020 09:03 PM IST
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- फोटो : pixabay
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बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग में तैनात जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) आरुति यादव जांच घोटाले में फंस गई हैं। उन पर जांच के नाम पर मातहतों को फंसाने और उत्पीड़न का आरोप लगा है। शासन ने आरुति से जांच का अधिकार छीन लिया है और वर्तमान की सभी जांच किसी अन्य अधिकारी को ट्रांसफर करने को कहा गया है। साथ ही भविष्य में किसी तरह का जांच न दिए जाने का निर्देश दिया है।
गौरतलब है कि गोंडा में तैनाती के दौरान बाल परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) अरुण कुमार पांडेय पर उच्चाधिकारियों के आदेशों की अवहेलना, बिना अनुमति मुख्यालय से बाहर रहने समेत कई आरोप लगे थे। इसकी जांच डीपीओ आरुति यादव को सौंपी गई थी। लेकिन आरुति की गलत जांच रिपोर्ट के चलते अरुण पांडेय को प्रतिकूल प्रविष्टि दी गई थी। नतीजतन, अक्तूबर 2018 में सीडीपीओ से डीपीओ के पद पर प्रमोशन के लिए कराई गई डीपीसी से पांडेय वंचित हो गए थे। जबकि वरिष्ठता सूची में पांडेय सबसे ऊपर थे।
इस पर उन्होंने आरुति की जांच रिपोर्ट पर पारित दंडादेश के विरुद्ध शासन में अपील की। साथ ही कहा, इस मामले में पहले भी तीन बार अपर निदेशक वित्त जैसे वरिष्ठ अधिकारियों की जांच में उन्हें क्लीन चिट मिल चुकी है। ऐसे में उसी मामले में जांच गठित कर उन्हें परेशान किया गया। इस पर शासन ने निदेशक से आख्या मांगी। इसमें पांडेय द्वारा दिए गए तथ्यों की पुष्टि हो गई।
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इतना ही नहीं, निदेशक ने भी आख्या में आरुति यादव पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने लिखा, आरुति ने निदेशक के अनुमोदन के बिना ही मूल आरोप पत्र जारी किए, स्वयं जांच अधिकारी व प्रस्तुतकर्ता और मूल्यांकन अधिकारी बन बैठी थीं। इसी आख्या के आधार पर शासन के संयुक्त सचिव महाबीर प्रसाद गौतम ने डीपीओ आरुति यादव को उप्र लोक सेवक (अनुशासन व अपील) नियमावली 1999 के उल्लंघन का दोषी मानते हुए उनसे जांच का अधिकार छिन लिया है। वहीं, पांडेय के विरुद्ध पारित दंडादेश को निरस्त कर दिया है। पांडेय वर्तमान में रायबरेली में सीडीपीओ पद पर तैनात हैं।
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गौरतलब है कि गोंडा में तैनाती के दौरान बाल परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) अरुण कुमार पांडेय पर उच्चाधिकारियों के आदेशों की अवहेलना, बिना अनुमति मुख्यालय से बाहर रहने समेत कई आरोप लगे थे। इसकी जांच डीपीओ आरुति यादव को सौंपी गई थी। लेकिन आरुति की गलत जांच रिपोर्ट के चलते अरुण पांडेय को प्रतिकूल प्रविष्टि दी गई थी। नतीजतन, अक्तूबर 2018 में सीडीपीओ से डीपीओ के पद पर प्रमोशन के लिए कराई गई डीपीसी से पांडेय वंचित हो गए थे। जबकि वरिष्ठता सूची में पांडेय सबसे ऊपर थे।
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इस पर उन्होंने आरुति की जांच रिपोर्ट पर पारित दंडादेश के विरुद्ध शासन में अपील की। साथ ही कहा, इस मामले में पहले भी तीन बार अपर निदेशक वित्त जैसे वरिष्ठ अधिकारियों की जांच में उन्हें क्लीन चिट मिल चुकी है। ऐसे में उसी मामले में जांच गठित कर उन्हें परेशान किया गया। इस पर शासन ने निदेशक से आख्या मांगी। इसमें पांडेय द्वारा दिए गए तथ्यों की पुष्टि हो गई।
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इतना ही नहीं, निदेशक ने भी आख्या में आरुति यादव पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने लिखा, आरुति ने निदेशक के अनुमोदन के बिना ही मूल आरोप पत्र जारी किए, स्वयं जांच अधिकारी व प्रस्तुतकर्ता और मूल्यांकन अधिकारी बन बैठी थीं। इसी आख्या के आधार पर शासन के संयुक्त सचिव महाबीर प्रसाद गौतम ने डीपीओ आरुति यादव को उप्र लोक सेवक (अनुशासन व अपील) नियमावली 1999 के उल्लंघन का दोषी मानते हुए उनसे जांच का अधिकार छिन लिया है। वहीं, पांडेय के विरुद्ध पारित दंडादेश को निरस्त कर दिया है। पांडेय वर्तमान में रायबरेली में सीडीपीओ पद पर तैनात हैं।