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अब नहीं हो पाएगी किराए की संपत्ति पर धांधली

Thu, 15 May 2014 03:30 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 15 May 2014 03:30 AM IST
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development authority to lookafter property

विकास प्राधिकरण की किराए की संपत्तियों पर मौज मार रहे आवंटियों के दिन अब लदने वाले हैं।

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एक तो वे अपने नाम का आवंटन दूसरे को हस्तांतरित नहीं कर पाएंगे और दूसरा यदि वह मकान खाली करना चाहते हैं तो उसे विकास प्राधिकरणों में सरेंडर करना होगा।

आवंटी यदि इन मकानों में रहना चाहता है तो उसे अपने नाम पर इसे फ्री होल्ड कराना होगा। इसके लिए उन्हें डीएम सर्किल रेट के हिसाब से कुल निर्मित क्षेत्र का शुल्क अदा करना होगा।

शासन स्तर पर इस संबंध में विचार-विमर्श हो रहा है। शीघ्र ही आदेश जारी करने की तैयारी है।

प्रदेश में इस समय 25 विकास प्राधिकरण हैं। प्राधिकरणों ने सालों पहले नजूल की जमीनों पर कालोनियों का निर्माण कराते हुए नौकरी पेशा वालों को किराए पर आवंटित किया है।
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विकास प्राधिकरण इन संपत्तियों से किराया तो नाम मात्र का पा रहे हैं, लेकिन इसके रख-रखाव पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं।

इसलिए शासन स्तर पर विचार किया जा रहा है कि ऐसे किराए की संपत्तियों को आवंटियों के नाम पर फ्री होल्ड कर दिया जाए।

हालांकि, प्रदेश के कई विकास प्राधिकरणों ने पूर्व में ही इसे आवंटियों के नाम पर फ्री होल्ड करने की योजना शुरू की है, लेकिन यह योजना परवान नहीं चढ़ पा रही है।
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इसलिए शासन चाहता है कि एक ऐसी नीति लाई जाए जिससे किराए वाली संपत्तियों का निस्तारण भी हो जाए और विकास प्राधिकरणों को राजस्व भी मिल जाए।

जानकारों के मुताबिक किराए वाली संपत्तियों में रहने वाले मूल आवंटियों के नाम पर इसे फ्री होल्ड किया जाएगा।

इसके लिए उसे डीएम सर्किल रेट के आधार पर कुल निर्मित क्षेत्र के हिसाब से शुल्क अदा करना होगा।

मूल आवंटी न होने की दशा में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष को होगा।

वह चाहेगा तो इनमें रहने वालों के नाम पर इन संपत्तियों को फ्री होल्ड किया जाएगा, नहीं तो अभियान चलाकर उसे खाली कराया जाएगा।

क्या होता है खेल
विकास प्राधिकरण की किराए वाली संपत्तियां सालों पहले लोगों के नाम पर आवंटित की गई थीं। नियमत: किराएदार यदि इन मकानों को खाली करता है तो उसे विकास प्राधिकरण को इसकी जानकारी देनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।

किराएदार अपने स्तर पर इन संपत्तियों को दूसरों को दे रहे हैं और इसके एवज में वे मोटी रकम ले रहे हैं। विकास प्राधिकरण के कुछ अधिकारी और कर्मचारी भी इस खेल में शामिल हैं। नई व्यवस्था लागू होने के बाद काफी हद तक यह खेल रुक जाएगा।


लखनऊ में पहले से लागू है योजना
राजधानी में निरालानगर, पेपर मिल, लाप्लास, लारेंस टेरेस तथा राजेंद्र नगर में विकास प्राधिकरण की कालोनियां हैं।

लखनऊ विकास प्राधिकरण ने इन कालोनियों को फ्री होल्ड करने की योजना 2009 में शुरू की थी, लेकिन अधिकारियों की लापरवाही से यह योजना परवान नहीं चढ़ पाई।

यहां आज भी आवंटी मोटी रकम लेकर दूसरों के नाम पर आवंटन ट्रांसफर कर रहे हैं। यही नहीं, इन कालोनियों में रहने वाले लोग इन संपत्तियों को फ्री होल्ड कराने में रुचि नहीं ले रहे हैं।

इसके चलते पांच साल बाद भी नाम मात्र की संपत्तियां ही फ्री होल्ड की जा सकी हैं।

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