देवरिया कांड: मान्यता खत्म होने के बाद भी चलता रहा संरक्षण गृह
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देवरिया के मां विंध्यवासिनी बालिका संरक्षण गृह पर कार्रवाई को लेकर शासन से लेकर जिला स्तर तक के अधिकारियों की लापरवाही सामने आई है। जिला प्रशासन की लापरवाही का आलम तो यह रहा है कि सीबीआई जांच के आधार पर पिछले साल मान्यता खत्म करने के बाद भी इसका संचालन हो रहा था।
23 जून 2017 को संस्था की संचालिका के खिलाफ एफआईआर कराने के निर्देश दिए गए थे। जबकि जिला प्रशासन ने 30 जुलाई 2018 को एफआईआर दर्ज कराई। इस दौरान पूरे साल भर शासन के अधिकारी नोटिस पर नोटिस देते रहे पर, कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कार्रवाई हुई या नहीं।
बता दें, प्रदेश में सचल पालना गृहों के संचालन में बड़े पैमाने पर धांधली और अनियमितता की शिकायत मिलने के बाद ऐसी सभी संस्थाओं की जांच सीबीआई से कराई गई थी। इसमें देवरिया स्थित नारी बालिका संरक्षण गृह का संचालन करने वाली संस्था भी थी।
इस संस्था में भारी अनियमितता मिली। उस वक्त भी इस संस्था में बच्चे कम मिले थे। इसके आधार पर संस्था की मान्यता खत्म कर दी गई। मगर गिरिजा मिश्रा संस्था का संचालन करती रहीं और जिला प्रशासन आंखें बंद किए बैठा रहा।
किशोरियों को करना था दूसरी संस्था में शिफ्ट
शासन स्तर से संस्था को बंद करके वहां रहने वाली किशोरियों को किसी दूसरी संस्था में शिफ्ट करने का आदेश दिया गया था, लेकिन संचालिका गिरिजा मिश्रा ने हर बार कुछ महिला संगठनों को आगे कर किशोरियों अन्यत्र शिफ्ट नहीं करने दे रही थीं।
इस पर शासन ने संचालिका के खिलाफ 23 जून 2017 को एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश दिया था। पर, जिला प्रशासन सोता रहा। 30 जुलाई 2018 को एफआईआर दर्ज कराई गई, लेकिन पुलिस पुलिस ने तत्काल कोई कार्रवाई नहीं की।
रविवार को देह व्यापार का खुलासा होने पर जब हड़कंप मचा तो जिला व पुलिस प्रशासन की नींद खुली। इसके बाद पुलिस ने आनन-फानन में 30 जुलाई को कराई गई एफआईआर में शारीरिक छेड़छाड़ और पॉक्सो की धारा बढ़ाई।
फर्जी स्थगनादेश से प्रशासन को बरगलाते रही संचालिका
उधर, संचालिका गिरिजा मिश्रा भी कोर्ट के झूठे स्थगनादेश की आड़ लेकर प्रशासन को बरगलाए रखा। जबकि कहा जा रहा है कि जिला प्रशासन को मालूम था कि इस मामले में कोर्ट ने कोई स्थगनादेश नहीं दिया है और संचालिका फर्जी स्थगनादेश दिखाकर प्रशासन की आंख में धूल झोंक रही है।
दर्जनों नोटिस भेजकर भी शासन ने नहीं कराया अनुपालन
संस्था को बंद कराने, किशोरियों को शिफ्ट कराने और संचालिका के खिलाफ एफआईआर कराने को लेकर शासन स्तर से डीएम को एक दर्जन से अधिक नोटिस भेजे जाने की बात कही जा रही है। लेकिन नोटिस का अनुपालन न होने पर शासन ने क्या कदम उठाया, इस पर कोई मुंह नहीं खोल रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि बार-बार नोटिस भेजने पर भी कार्रवाई न होने पर शासन स्तर पर बैठे वरिष्ठ अधिकारियों ने दोषी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।