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लड़की की उम्र को लेकर लखनऊ हाईकोर्ट ने दिया ये अहम फैसला, यहां पढ़ें

Thu, 19 Apr 2018 12:31 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 19 Apr 2018 12:31 PM IST
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decision of high court regarding age of a person
नाबालिग की उम्र निर्धारित करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कहा है कि अगर स्कूली दस्तावेज में दर्ज उम्र की प्रामाणिकता के लिए मां-पिता या उम्र दर्ज कराने वाला व्यक्ति उपलब्ध नहीं है तो मेडिकल रिपोर्ट को ही पुख्ता आधार माना जाएगा। इसके आधार पर उम्र निर्धारित की जाएगी।
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हाईकोर्ट ने यह आदेश एक ऐसी लड़की की याचिका पर दिए हैं जिसके माता-पिता व दादा की मृत्यु हो चुकी है और उसे आशंका है कि उसके ताऊ उसे कहीं बेच देंगे। लड़की ने अपनी मर्जी से शादी कर ली थी, लेकिन उसके परिवार ने शादी को स्वीकार नहीं किया और उसके पति के खिलाफ नाबालिग लड़की के अपहरण व दुराचार आदि के आरोप लगाए थे।
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फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान लड़की के प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर द्वारा जारी सर्टिफिकेट प्रस्तुत किया गया था। इसके अनुसार स्कॉलर रजिस्टर में लड़की की जन्मतिथि फरवरी 2002 थी, जिसके हिसाब से वह नाबालिग थी। वहीं सीएमओ द्वारा 21 सितंबर 2017 को किए गए मेडिकल टेस्ट में वह साढ़े 18 वर्ष की बताई गई थी। 22 सितंबर को फास्ट ट्रैक कोर्ट ने स्कूली दस्तावेजों के आधार पर लड़की को नाबालिग मानते हुए फैजाबाद के नारी निकेतन भेजने के आदेश दिए थे।
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खंडपीठ ने ये कहा

decision of high court regarding age of a person
जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस रजनीश कुमार की खंडपीठ ने कहा कि 1988 के बिरदमल सिंघवी बनाम आनंद पुरोहित के चुनाव से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट भी स्कॉलर रजिस्टर या में दर्ज जन्मतिथि की एंट्री को प्रमाण के तौर पर महत्व को नकार चुका है। ऐसे दस्तावेजों की पुष्टि उन मामलों में हो सकती है जहां अभिभावक या वह व्यक्ति मौजूद हो जिसने जन्मतिथि दर्ज करवाई हो।

मौजूदा मामले में मेडिकल परीक्षण में लड़की की उम्र करीब साढ़े 18 वर्ष आई है, ऐसे में केवल स्कूली दस्तावेजों के आधार पर उसे नारी निकेतन भेज देना उचित नहीं है। स्कूल और मेडिकल सर्टिफिकेट में उम्र का फर्क आ रहा है। ऐसे में निष्कर्षात्मक साक्ष्य नहीं होने पर मेडिकल सर्टिफिकेट को विश्वसनीय आधार बनाया जाना चाहिए, न कि स्कूली दस्तावेज को।

इस मामले में न केवल लड़की का हित, बल्कि न्याय का हित भी इसी में है कि उसकी स्वतंत्रता का मूल अधिकार सुरक्षित रहे। ऐसे में उसे नारी निकेतन में रखना उचित नहीं होगा। हाईकोर्ट ने फास्ट ट्रैक कोर्ट का आदेश खारिज करते हुए लड़की को नारी निकेतन से रिहा करने के आदेश दिए और कहा कि वह अपनी मर्जी से कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र है।

यह था मामला

अपने पति के जरिए दाखिल याचिका में लड़की ने नारी निकेतन से रिहा किए जाने की प्रार्थना की थी। उसने बताया था कि वह बालिग है और अपनी मर्जी से शादी कर चुकी है तथा ससुराल जाना चाहती है। अपने पारिवारिक हालात बताए कि उसने बचपन में ही माता-पिता को खो दिया था। उसे व उसके भाई-बहनों को दादा ने पाला, जिनकी मृत्यु आठ वर्ष पहले हो चुकी है।

उसके बाद से वे सभी अपने ताऊ के पास रहे हैं। लड़की ने आरोप लगाया कि उसकी बड़ी बहन को ताऊ ने पैसे लेकर किसी के यहां ब्याह दिया, जहां उससे खराब व्यवहार हुआ और वह लौट आई। लड़की के अनुसार, उसे आशंका है कि उसे भी बेचा जा सकता है। इन्हीं हालात में वह एक लड़के के संपर्क में आई, उसने लड़के से प्रेम विवाह किया और पंजाब चली गई। परिवार ने इस शादी को स्वीकार नहीं किया और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी थी। 
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