ये किसकी बागवानी से किसान बन रहे रोगी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अवध के आम देश भर में प्रदेश का नाम रोशन कर कर रहे हैं, लेकिन नाम कमाने की इस होड़ में लखनऊ के किसानों को बहुत बड़ी कीमत अदा करनी पड़ रही है।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (आईआईटीआर) लखनऊ और यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर मेडिक सेंटर यूएस के अध्ययन में ये खुलासा हुआ है।
राजधानी में आम की खेती से जुडे़ किसानों और एग्रो बिजनेस कारोबारियों पर किए गए इस अध्ययन में पाया कि इनमें से करीब 37 प्रतिशत में सांस से संबंधित बीमारियां व कमजोरियां पनप चुकी हैं।
इसकी वजह आम के बागों में कीटनाशक छिड़कने के तौर-तरीकों और सुरक्षा साधन नहीं अपनाए जाने को माना जा रहा है। अध्ययन में एग्रो बिजनेस से जुड़े लखनऊ के 166 किसानों को शामिल किया गया।
उनका क्लीनिकल टेस्ट, ब्लड टेस्ट, स्पायरोमीटर से लंग फंक्शन टेस्ट कराया गया और श्वसन तंत्र संबंधित सवालों पर आधारित सर्वे किया गया। इसमें सामने आया कि 36.75 प्रतिशत लोगों में सांस की बीमारियां हैं।
सूखी खांसी, सांस के साथ सीटी बजना, गले में जलन, लार में रक्त जैसी समस्याएं इनमें आम हो चली हैं। ये सभी आम के बागों में कीटनाशक छिड़कने और कीट प्रबंधन में शामिल रहे थे। इन बीमारियों के पीछे आर्गेनोफॉस्फेट पैराथियन (ओपी) नामक कीटनाशक को पाया गया, जो न्यूरोटॉक्सिक और कार्सिनोजेनिक माना जाता है।
धड़ल्ले से हो रहा इसका इस्तेमाल
शोध में शामिल भारतीय वैज्ञानिकों चंद्रशेखरन नायर केशवचंद्रन, मोहम्मद फरीद, मनोज कुमार पाठक और अमेरिकी वैज्ञानिक थॉमस एच थैचर के अनुसार भारत में आज भी आर्गेनोफॉस्फेट पैराथियन का बेरोक-टोक इस्तेमाल होता है, जबकि दुनिया के अधिकतर देश इस पर बैन लगा चुके हैं।
इसका छिड़काव करने के दौरान लोग सुरक्षा उपाय भी नहीं अपना रहे हैं। इससे ये कीटनाशक सांस के जरिए खून में मिल रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह अध्ययन बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस कीटनाशक के एक्सपोजर में आने के बाद मनुष्य के शरीर पर होने वाले प्रभावों को गहराई से समझा जा सका।
इससे यह भी सामने आया कि लोगों को इस बात का अंदाजा नहीं है कि कीटनाशक कितने खतरनाक हो सकते हैं।आर्गेनोफॉस्फेट पैराथियन को अमेरिका सहित 23 देशों ने अपने यहां बैन कर रहा है। 50 देशों में इसके उपयोग पर सरकारी नियंत्रण है, लेकिन भारत में बिना रोक-टोक के इसका इस्तेमाल हो रहा है।
बढ़ रही ये बीमारियां
दुनिया भर में इसके इस्तेमाल से सांस की बीमारियों के अलावा दिमागी कमजोरी, सिरदर्द, मतिभ्रम, रात को चलने, बेहोशी और मौतों की घटनाएं सामने आई हैं। वहीं, हल्के स्तर पर भी ओपी के संपर्क में आने पर दिमागी सक्रियता बुरी तरह प्रभावित पाई गई है।
इस कीटनाशक के फसल में रेजीड्यू (बचे रहे अंश) की वजह से साढे़ 3 से 5 साल तक की उम्र के बच्चों खासतौर से लड़कों में अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) और दूसरे गंभीर दिमागी रोगों के खतरे 35 प्रतिशत तक बढ़े हैं। यही वजह है कि अमेरिका ने 2000 में इस पर बैन लगा दिया था।
खून में घुल रहा खतरनाक कीटनाशक
आम के बागों में दिसंबर से मार्च के दौरान हर वर्ष कीटनाशक छिड़काव किया जाता है। इसमें हर हफ्ते 2 से 8 घंटे तक जुटना होता है। अध्ययन के दौरान पाया गया कि किसान नंगे हाथों से डाईक्लोर्वोस, मेलाथियन, मिथाइल पैराथियन जैसे ओपी कीटनाशक मिलाते हैं।
उनके छिड़काव टैंकों में लीकेज होती है तो मास्क भी नहीं पहना जाता। पेड़ पर ऊपर की ओर स्प्रे करने के दौरान काफी मात्रा में कीटनाशक उनके शरीर पर भी गिरता है।