'बनारसी लंगड़ा' और 'दशहरी' नहीं मिलेंगे इस साल?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बौर निकलने से लेकर अब तक लगातार मौसम की मार झेल रही आम की पैदावार को मंगलवार भोर एक बार फिर कुदरत के सितम का सामना करना पड़ा। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित फलपट्टी क्षेत्र मलिहाबाद, माल, काकोरी व बीकेटी के आम बागवान है।
पचास किमी की रफ्तार से चली तेज हवाओं व पानी की बौछारों ने गेहूं की बर्बादी के बाद आम की फसल से हालात कुछ बेहतर होने की उम्मीद संजोए किसानों पर वज्रपात किया। आम के बागवानों की माने तो अब तक आम की करीब 75 फीसदी फसल बर्बाद हो चुकी है। इससे इस बार सीजन में मलिहाबादी दशहरी का स्वाद भी आम आदमी की पहुंच से दूर होने की आशंका है।
मलिहाबाद के आम बागवान सुबह एक घंटे तक चले तूफान के बाद बागों का हाल देखकर सदमे में हैं। गेहूं की फसल की बर्बादी से हुए नुकसान को आम की बेहतर पैदावार से पूरा करने की आस संजोए बागवान कुदरत का कहर थमने के बाद जब खेतों में पहुंचे तो लाखों की कीमत का कच्चा आम जमीन पर मिला। तेज हवाओं के साथ हुई बारिश से बागों में बड़ी संख्या में पेड़ों की डाले टूट गईं।
तिलसुवा निवासी बागवान अरुण सिंह इस बर्बादी को देख आंख में आए आंसू किसी तरह रोकते हुए बताते हैं कि कुदरत ने ऐसा सितम ढाया कि सब कुछ बर्बाद हो गया। पहले ही बौर निकलने के समय हुई बारिश से पैदावार कम होने से परेशान थे।
बौर फू लने के समय बारिश ने आम के दाने को अंदर ही सड़ा कर खराब कर दिया था। रही सही कसर मंगलवार भोर में आए आपदा के तूफान ने पूरी कर दी। अब बागों में आम के नाम पर शायद ही कुछ बचा हो।
नहीं मिलेगा बनारसी लगंड़ा
उद्यान विभाग के अनुसार जिले में बनारसी लंगड़ा सहित अन्य प्रजातियों के आम की अब तक तकरीबन 40 फीसदी फसल बर्बाद हो गई है। मौसम से हुए नुकसान का अभी सर्वे चल रहा है, ऐसे में क्षति का आंकड़ा और बढ़ सकता है। इससे न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि हैदराबाद, महाराष्ट्र, कोलकाता तक जाने वाले बनारसी आम, खासतौर से लंगड़ा आम की मिठास इस बार कम ही मिल पाएगी।
साथ ही, दाम भी पिछले साल के मुकाबले अधिक होंगे।जिले में कभी 5623 हेक्टेयर में आम के बागीचे थे लेकिन समय के साथ पेड़ कटते गए और कंक्रीट का जंगल खड़ा होता गया। फिलहाल जिले में 1725 हेक्टेयर में आम की उपज होती है। इनमें अधिकतर आम के बागीचे चिरईगांव, सेवापुरी, आराजीलाइन, बड़ागांव और पिंडरा क्षेत्र में हैं।
चिरईगांव को आम का क्षेत्र भी कहा जाता है। बनारसी लंगड़ा के अलावा दशहरी, चौसा, बांबे ग्रीन, सुकुल, रामकेड़ा, लखनवी सफेदा की भी पैदावार होती है। उपनिदेशक उद्यान अनिल कुमार सिंह ने बताया कि प्रति हेक्टेयर 20 से 22 मिट्रिक टन उत्पादन होता है लेकिन पिछले साल भी 12-13 मिट्रिक टन ही पैदावार हुई थी।
इस बार भी आंधी-पानी से काफी अधिक नुकसान पहुंचा है। उद्यान अधिकारी ममता सिंह यादव का कहना है कि अब तक करीब 40 फीसदी तक आम की फसल नुकसान होने की सूचना है। सर्वे पूरा होने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।