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केजीएमयू: सात घंटे सर्जरी कर हाथ के मांस से बना दिया नया निजी अंग

Sun, 19 Jun 2016 02:38 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 19 Jun 2016 02:38 AM IST
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critical surgery in KGMU in Lucknow.
- फोटो : amar ujala

केजीएमयू के डॉक्टरों ने सड़क हादसे के बाद पेट और निजी अंग में गंभीर चोट से पीड़ित बुजुर्ग को नई जिंदगी दी। डॉक्टरों ने जहां पेट के जख्म भरने के लिए जांघ से मांस निकाल कर ग्राफ्टिंग की वहीं सात घंटे तक चली सर्जरी में बाएं हाथ की कलाई से मांस निकाल कर नया निजी अंग तैयार कर दिया।

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इलाज की लंबी प्रक्रिया के बाद अब मरीज स्वस्थ है। डॉक्टरों का कहना है कि तीन से चार हफ्ते में मरीज सामान्य हो जाएगा और खड़े होकर पेशाब कर सकेगा।

सीतापुर जिले के 68 साल के एक बुजुर्ग बीते वर्ष चार दिसंबर को बोलरो से टक्कर लगने के बाद उसमें फंसकर 200 मीटर तक घिसटते चले गए। हादसे में पेट में गहरा जख्म हो गया और निजी अंग अलग हो गया। केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर में डॉक्टरों ने घाव में संक्रमण रोकने के लिए क्रिटिकल केयर दिया। इसके बाद मामले की जानकारी केजीएमयू के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के डॉ. बृजेश मिश्रा को दी गई।
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डॉ. मिश्रा ने बताया कि पेट के जख्म को भरने के लिए 25 दिन तक दवा चलाई गई इसके बाद क्षतिग्रस्त अंगों को ठीक करने के लिए 31 दिसंबर को ऑपरेशन किया गया। पेट के जख्म भरने के लिए ग्राफ्टिंग की गई जिसके लिए मांस जांघ से लिया गया था।

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पेशाब के लिए डाली नली

critical surgery in KGMU in Lucknow.

मरीज का निजी अंग अलग हो चुका था ऐसे में पेशाब का रास्ता नहीं था। यूरोलॉजी विभाग के डॉ. मनोज यादव ने ‘सुप्रा प्यूबिक सिसटॉस्टमी’ टेक्नीक की मदद से पेशाब के लिए पेट के रास्ते से नली डालकर नया रास्ता बनाया ताकि जिससे पेशाब रुकने से गुर्दे खराब न हो सके। इसके बाद मरीज को लगातार निगरानी में रखा गया।

ऐसे बनाया अंग
डॉ. बृजेश मिश्रा बताते हैं कि बुजुर्ग का नया निजी अंग बनाने के लिए माइक्रो वैस्कुलर ‘पिनाइल रिकंस्ट्रक्शन’ सर्जरी प्लान की गई। 20 मई को सुबह दस बजे ऑपरेशन शुरू हुआ। सबसे पहले मरीज के बाएं हाथ की कलाई (लेफ्ट हैंड रेडियल आर्टरी फोर आर्म फ्री फ्लैप) पर स्केच पेन से मार्क लगाकर ये तय किया गया कि नया निजी अंग बनाने के लिए कितने मांस की जरूरत है।

इसके बाद हाथ से मांस को अलग किया गया और सबसे पहले निजी अंग के भीतर की मूत्र वाहिका बनाया गया। उस वाहिका में एक आर्टिफिशियल कैथेडर ट्यूब डाला गया जिससे मांस से बनी मूत्र वाहिका बंद न हो। इसके बाद मांस की मदद से पूरा निजी अंग डिजाइन किया गया।

मूत्र वाहिका और निजी अंग को जीवंत बनाए रखने के लिए सबसे कठिन काम एक आर्टरी और दो वेंस को जोड़ने का था। इस पूरी प्रक्रिया में करीब सात घंटे से अधिक का समय लगा। डॉ. बृजेश मिश्रा बताते हैं कि माइक्रोस्कोप की मदद से पहले कोशिकाओं को देखा गया। इसके बाद उनको जोड़ने के लिए बहुत ही महीन धागों का इस्तेमाल किया गया। सात घंटे की सर्जरी में शाम पांच बजे उसमें सफलता मिली।

युवाओं में इनफ्लेटेबल प्रोस्थोसिस का इस्तेमाल

critical surgery in KGMU in Lucknow.
डॉ. बृजेश मिश्रा - फोटो : amar ujala

इस तरह की घटना किसी युवा के साथ हुई होती तो मेडिकल साइंस में इसके इलाज की दूसरी व्यवस्था है। तनाव लाने के लिए सर्जरी के दौरान इनफ्लेटेबल प्रोस्थोसिस का इस्तेमाल किया जाता है कि उसे पिता बनने में कोई दिक्कत न हो।

रंग लाई डॉक्टरों की मेहनत
बुजुर्ग को नई जिंदगी देने में प्लास्टिक सर्जरी विभाग के डॉ. बृजेश मिश्रा, यूरोलॉजी विभाग के डॉ. मनोज यादव समेत डॉ. शिवानी, डॉ. अरविंद गोयल डॉ. पवन और एनेस्थेसिया में डॉ. रजनी कपूर की टीम के साथ ओटी और अन्य पैरामेडिकल स्टाफ मौजूद रहा। सर्जरी के बाद सबसे अहम था बुजुर्ग को नियमित ट्रीटमेंट देना जिसके लिए रेजिडेंट डॉक्टरों के साथ पैरामेडिकल स्टाफ ने दिन रात एक कर दिया। अब बुजुर्ग तेजी से रिकवर कर रहे हैं और वो सामान्य जीवन जी सकेंगे।

50 हजार में 6 लाख का इलाज
केजीएमयू में बुजुर्ग के इलाज में केवल 50 हजार रुपये खर्च हुए। डॉ. बृजेश मिश्रा ने बताया कि ऑपरेशन किसी बड़े निजी सेंटर में हुआ होता तो पांच से छह लाख रुपये खर्च होते। बुजुर्ग को जिस तरह की चोट थी उसका इलाज लखनऊ में केजीएमयू के अलावा अन्य सेंटर पर मुश्किल था।

ऐसी घटना तो यहां करें फोन
डॉ. बृजेश मिश्रा बताते हैं कि किसी हादसे में शरीर का कोई हिस्सा कटकर अलग हो जाए तो मदद के लिए तुरंत केजीएमयू के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के हेल्पलाइन नंबर 9415200444 पर फोन करें। समय पर सूचना मिलने से विभाग के डॉक्टर बेहतर तैयारी कर लेते हैं और पीड़ित के पहुंचने पर उसका समय पर इलाज शुरू हो जाता है।

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