'सड़क पर फेंके गए 10 नवजात में 8 बेटियां'
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एक दिन की ‘मुस्कान’ जब शनिवार सुबह लावारिस हालात में लखनऊ की रेणु पांडेय को मिली तो वह पिछले साढ़े सात साल में राजधानी में चाइल्ड लाइन को मिली 72वीं बच्ची थी।
उसे किन हालात में और क्यों लावारिस छोड़ा गया यह तो शायद कभी जाना नहीं जा सकेगा, लेकिन मुस्कान और उस जैसे नवजातों के लिए चुनौतियों से शुरू हुआ जीवन बचा रहे इसके लिए हो रहे प्रयासों और इनमें मौजूद कमियों पर अमर उजाला ने तैयार की यह विशेष रिपोर्ट।
हर साल छोड़े जा रहे 5-6 बच्चे
राजधानी में गोमतीनगर विरामखंड में मौजूद एक अनाथ आश्रम में प्रवेश करने से पहले मुख्यद्वार पर लगा एक लोहे का बक्सा ध्यान खींचता है।
जंग लगे इस बक्से का उपयोग बक्से पर ही लिखा है- ‘बच्चे को बक्से में रखकर घंटी बजा दें’। यानी जिनके लिए उनका नवजात बोझ है उसे इस बक्से में छोड़ जाएं।
इस आश्रम मनीषा मंदिर की संचालिका डॉ. सरोजिनी अग्रवाल बताती हैं कि हर साल इस बक्से में 5-6 बच्चे छोड़े जा रहे हैं, जिन्हें अपने आश्रय में लेकर वे गोद दिलवाने की कानूनी प्रक्रिया के तहत इन्हें किसी घर में जगह दिलवाती हैं। इस काम के लिए उन्हें सरकारी तौर पर नियुक्त किया गया है।
फेंके गए 70 फीसदी बच्चों में बेटियां
दूसरी ओर, राजधानी में हर साल 10 से 20 बच्चों को आश्रय दिलवा रही चाइल्ड लाइन के समन्वयक प्रकाशचंद्र तिवारी के अनुसार कभी कचरे के ढेर में तो कभी सड़क के किनारे और कभी किसी नाले में ‘फेंके’ गए बच्चों के मामले लगातार सामने आते जा रहे हैं।
पिछले साढ़े 7 साल में राजधानी में फेंके गए 105 बच्चे चाइल्ड लाइन लाए गए हैं जिनमें से 70 प्रतिशत बेटियां हैं। ये मामले नवजात बच्चे को ‘छोड़ने’ के नहीं हैं बल्कि फेंक देने के हैं क्योंकि इन्हें ऐसा करने वालों की नीयत बच्चा फेंकने या शायद मार देने की होती है।
कई मामलों में नवजात को इस तरह फेंका गया कि उनकी जान पर बन आई। पिछले महीने इसी तरह लावारिस फेंक दिए गए नवजात को काफी समय अस्पताल में गहन इलाज देकर बचाया जा सका था।
बाल कल्याण समिति ने उसे श्रीराम औद्योगिक अनाथालय में आश्रय दिलवाया, लेकिन घटिया इंतजामों और संचालकों की लापरवाही ने उस नवजात की जान ले ली।
क्यों और कौन छोड़ रहा नवजात?
बीते 30 वर्षों से राजधानी में अनाथ बच्चों के लिए काम कर रही डॉ. अग्रवाल अपने अनुभव के आधार पर कहती हैं कि अब तक उन्होंने इसकी तीन वजहें पाई हैं। सबसे पहली वजह नवजात का लड़की होना है।
हम लाख प्रयास कर चुके हों, लेकिन आज भी कई नागरिक अपने मन से यह भ्रांति नहीं निकाल पाए हैं कि लड़की बोझ नहीं उनकी संतान है।
ऐसे अभिभावक खासतौर से उनके घर के बड़े-बुजुर्ग बच्चियों को लावारिस फिंकवा रहे हैं। जहां पहली के बाद दूसरी या तीसरी संतान भी लड़की हो, उनमें ऐसे हालात ज्यादा बनते हैं।
दूसरी वजह गरीबी है, इन हालात में किसी बीमारी से ग्रसित नवजात विशेष तौर से बालिका को लावारिस छोड़ा जा रहा है। वहीं तीसरी वजह नवजात का अवैध संतान होना है।
इस तरह सुधर सकते हैं हालात
बाल अधिकारों पर काम कर रही विनीता सिंह कहती हैं कि लावारिस नवजात के मामलों में पुलिस कभी फॉलोअप नहीं करती है। कम से कम जिन स्थानों पर वे मिले हैं, उन स्थानों के आसपास मौजूद क्लोज सर्किट कैमरों का रिकॉर्ड ही वह खंगाल ले तो बहुत मदद मिल सकती है।
विनीता कहती हैं कि नवजात को लावारिस छोड़ना कानून जुर्म है और इन मामलों में गैर इरादतन हत्या का केस भी बनाया जा सकता है।
दूसरी ओर प्रकाशचंद्र तिवाड़ी का मानना है कि अगर समाज में लड़कियों को अपराधों से सुरक्षा मिलने लगे और दहेज जैसी बुराइयां दूर हों तो नवजात बच्चियों को छोड़ने के मामलों में कमी आ सकती है।
इधर पुलिस तो दान दे चुकी थी मुस्कान
लावारिस बच्चों के मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकने वाली पुलिस का रवैया अज्ञानता से भरा नजर आता है। 2 अगस्त को मॉर्निंग वॉक के दौरान नागरिक रेणु पांडेय को नौबस्ता पुलिया के पास मिली एक दिन की मुस्कान के मामले में सामने आया है कि उसे पुलिस अपने ही स्तर पर किसी दंपति को सौंप चुकी थी।
चाइल्ड लाइन के सूत्रों ने बताया कि रेणु ने बच्ची को मड़ियांव पुलिस थाने में पहुंचा दिया था, पुलिस ने पहले चाइल्ड लाइन को मामले की सूचना दी और मुस्कान को भिजवाने की बात कही।
लेकिन काफी समय जब उसे नहीं भेजा गया तो पूछने पर पुलिस ने बताया कि उसे एक निसंतान दंपति को देकर सैटल कर दिया गया है।
जब चाइल्ड लाइन के कार्यकर्ताओं ने कहा कि गोद देने के लिए नियम कायदों का पालन करना होता है, तब जाकर पुलिस ने मुस्कान को दंपति से वापस लिया और चाइल्ड लाइन को सौंपा।
चाइल्ड लाइन में लाए गए बच्चे
वर्ष--बालक--बालिका--कुल
2007--5--6--11
2008--3--17--20
2009--9--11--20
2010--5--11--16
2011--1--6--7
2012--5--3--8
2013--3--10--13
*2014--2--8--10
कुल--33--72--105
*(3 अगस्त तक)