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प्रमोशन के लिए दौड़ते-दौड़ते मर गया कांस्टेबल

Thu, 05 Feb 2015 04:26 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,लखनऊ।
ब्यूरो/अमर उजाला,लखनऊ। Updated Thu, 05 Feb 2015 04:26 PM IST
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Constable died in promotion run.

दरोगा बनने की रेस में 57 वर्षीय हेड कांस्टेबल जितेंद्र कुमार जिंदगी हार गया। राजधानी में पीएसी की 35वीं वाहिनी बटालियन के मैदान में बुधवार को 35 मिनट में 3.20 किलोमीटर की रेस तो जितेंद्र ने समय से पहले पूरी कर ली लेकिन रिजल्ट आने से पहले ही उसकी तबीयत बिगड़ गई।

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उसे भाऊराव देवरस अस्पताल ले जाया गया लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। डॉक्टर मौत की वजह हार्ट अटैक मान रहे हैं। मूल रूप से मुरादाबाद के मझोल थाना क्षेत्र के बंगला गांव का रहने वाला जितेंद्र सहारनपुर के सरसावां थाने में तैनात था।
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यूपी पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड की तरफ से एक फरवरी से सीनियारिटी के आधार पर हेड कांस्टेबलों के प्रमोशन के लिए शारीरिक दक्षता परीक्षा कराई जा रही है। भर्ती बोर्ड के डिप्टी एसपी डीके राय ने बताया कि सूबे के विभिन्न जनपदों से 600 अभ्यर्थियों ने दौड़ में हिस्सा लिया।
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दौड़ पूरी होने के बाद जितेंद्र ने पैरों में लगी कम्प्यूटर चिप जमा की। मैदान से बाहर निकलते ही उसकी तबीयत बिगड़ गई। महानगर इंस्पेक्टर संजय नाथ तिवारी ने बताया कि जितेंद्र के परिवार को सूचना दे दी गई है।

पद के लालच में दांव पर लगा रहे जान

Constable died in promotion run.

हेड कांस्टेबल से दरोगा बनने के लिए सिर्फ शारीरिक दक्षता परीक्षा ही ली जाती है। पर इस परीक्षा के दौरान मैदान पर चिकित्सा की कोई सुविधा नहीं थी। उधर, भर्ती बोर्ड के अफसर प्रवेश पत्र में लिखी उन हिदायतों का हवाला देकर पल्ला झाड़ रहे हैं जिसमें कहा गया है कि डॉक्टर की सलाह और अपने स्वास्थ्य को देखते हुए अपनी जिम्मेदारी पर परीक्षा में भाग लें।

रिटायरमेंट के बाद अपने नाम के आगे दरोगा पद लगाने के लालच में हेड कांस्टेबल जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं।  हेड कांस्टेबलों ने बताया कि प्रमोशन होने पर सैलरी नहीं बढ़ेगी। न ही कोई अतिरिक्त सुविधा दी जाएगी। भर्ती बोर्ड के अफसर बताते हैं कि दौड़ में आए सभी हेड कांस्टेबल 55 साल से ऊपर के हैं। किसी के रिटायरमेंट में तो मात्र छह से आठ महीने ही बचे हैं।

प्रमोशन की चाहत में पहले भी मर चुके हैं कई पुलिसकर्मी

Constable died in promotion run.

प्रमोशन के नाम पर उम्रदराज पुलिसकर्मियों को नए रंगरूट की तरह दौड़ाने में पहले भी कई पुलिस वालों की जान जा चुकी है। कुछ ने बीच मैदान दम तोड़ा तो कुछ की अस्पताल पहुंचने पर मौत हो गई। सौ से अधिक मैदान में बेहोश हो चुके हैं। कई को हफ्तों अस्पताल में रहना पड़ा।

दौड़ में मौत का सिलसिला बसपा सरकार में शुरू हुआ। 2011 में जुलाई से अगस्त के दौरान पुलिसकर्मियों के प्रमोशन की प्रक्रिया शुरू हुई थी। तब सरकार ने इसके लिए दस किलोमीटर की दौड़ पूरी करने की बाध्यता रखी थी। पुलिसकर्मियों ने विरोध किया लेकिन उनकी नहीं सुनी गई।

पुलिसकर्मियों ने बार-बार दलील दी कि वे नौकरी में आने के लिए पहले भी दौड़ पूरी कर चुके हैं। अब उनकी उम्र बढ़ चुकी है और नौजवानों की तरह उनकी शारीरिक क्षमता नहीं रह गई है। इसलिए उनसे दस किमी के बजाय दो या तीन किमी की दौड़ करा ली जाए। मगर अधिकारियों ने उनका कोई तर्क नहीं सुना। उल्टे यह कहा गया कि फोर्स में रहने के लिए लगातार फिट रहना जरूरी है, इस नाते दस किमी दौड़ना कोई गलत नहीं है।

प्रमोशन की चाहत रखने वालों से साफ कह दिया गया था कि अगर दरोगा बनना है तो दस किमी दौड़ो वर्ना दरोगा बनने का सपना छोड़ दो। नतीजा यह हुआ कि विभिन्न परीक्षण केंद्रों पर पांच अभ्यर्थियों ने दम तोड़ दिया। इसके अलावा डेढ़ सौ से अधिक अभ्यर्थी बीमार होकर अस्पताल पहुंचे थे। बाद में सरकार ने परीक्षा की प्रक्रिया में संशोधन कर दौड़ की दूरी कम कर दी।

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