क्या यूपी में भारी कीमत चुकाने को तैयार है कांग्रेस?
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महाराष्ट्र में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में भले ही गठबंधन हो गया हो लेकिन उत्तर प्रदेश में इसकी संभावना फिलहाल दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती। इसमें कई बाधाएं और व्यावहारिक अड़चनें दिखाई दे रही हैं।
यह तभी हो सकता है कि जब कांग्रेस यूपी में अपने अस्तित्व को दांव पर लगाने को तैयार हो और सपा अपनी जमा पूंजी का कुछ हिस्सा कांग्रेस को दे। राजनीति में न तो कुछ असंभव होता है और न दोस्ती व दुश्मनी ही स्थाई रहती है। इस तर्क के पैरोकार पिछले लोकसभा चुनाव का उदाहरण दे सकते हैं।
तब सपा ने रायबरेली व अमेठी में उम्मीदवार न उतारकर सोनिया गांधी व राहुल का रास्ता आसान बनाने का संदेश दिया तो कांग्रेस ने भी मैनपुरी में मुलायम और कन्नौज में उनकी पुत्रवधू डिम्पल के खिलाफ उम्मीदवार न उतारकर दोस्ती का संकेत दिया।
इसे आधार बनाएं तो यूपी में भी गठबंधन की संभावना बहुत मुश्किल नहीं दिखती, लेकिन एक-दो सीटों पर समझौते की बात अलग है।
सिर्फ यूपी में ही सिमटना होगा कांग्रेस को
बड़े स्तर पर गठबंधन की संभावना इसलिए भी नहीं दिखती क्योंकि सपा को अपनी महत्वाकांक्षा की कुर्बानी देनी होगी और कांग्रेस को यूपी जैसे बड़े राज्य में खुद को काफी हद तक समेट लेने का फैसला करना होगा।
दोनों ही दोस्ती के नाम पर इतनी बड़ी कीमत शायद ही चुकाना चाहें। वहीं, यह भी ध्यान रखना होगा कि 2009 में कांग्रेस ने ही फीरोजाबाद सीट पर राज बब्बर के जरिये डिम्पल को हराकर मुलायम को न भूलने वाला झटका दिया था।
कांग्रेस के लिए भूलना मुश्किल
कांग्रेस को आज तक कसक है कि 1989-90 में मुलायम के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देने का फैसला उसे काफी महंगा पड़ा।
उसके नेता सार्वजनिक तौर पर कहते रहे हैं कि कांग्रेस के समर्थन का फायदा उठाते हुए मुलायम अल्पसंख्यकों के दिमाग में यह बात बैठाने में सफल रहे कि भाजपा का विरोध वही कर सकते हैं। यह संदेश देकर उन्होंने कांग्रेस को ऐसा नुकसान पहुंचाया जिसकी भरपाई अभी तक नहीं हो पाई है।
शायद ही इतना झुक पाए कांग्रेस
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल का कहना है कि महाराष्ट्र व उत्तर प्रदेश की राजनीतिक स्थितियां काफी भिन्न हैं। महाराष्ट्र कांग्रेस सपा को जो 10 सीटें देने की बात कर रही है, उन पर कांग्रेस नहीं बल्कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी मजबूत है। पर, सपा उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ मोर्चा लेने में कांग्रेस से काफी आगे खड़ी होकर खुद को राष्ट्रीय राजनीति में समीकरण बनाने व बिगाड़ने की भूमिका में दिखती है।
यूपी में समझौते की संभावना तभी बन सकती है जब कांग्रेस 90 प्रतिशत सीटें सपा को देने की सीमा तक झुकने को तैयार हो। कांग्रेस ऐसा आत्मघाती फैसला शायद ही कर पाए।
फिलहाल दूर की कौड़ी
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के पं. मदन मोहन मालवीय पत्रकारिता संस्थान के निदेशक प्रो. ओमप्रकाश सिंह भी कहते हैं सपा को पता है कि यूपी में कांग्रेस उसे कोई लाभ पहुंचाने की स्थिति में नहीं है।
उल्टे सीटें छोड़ने से सपा का परंपरागत वोट दूसरी धारा पकड़कर भविष्य की राजनीति के लिए मुसीबतें बढ़ा सकता है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो उत्तर प्रदेश छोड़ने के बाद उसके पास कुछ बचेगा ही नहीं। उसकी स्थिति राष्ट्रीय दल जैसी नहीं रहेगी। कांग्रेस भी कभी ऐसा नहीं करना चाहेगी।