कैंसर के मरीजों के लिए राहत भरी खबर, लखनऊ में मिलेंगी आधुनिक सुविधाएं
- केजीएमयू को मिली 153 करोड़ की सुविधाओं की सौगात
- प्रदेश की पहली गेट लैब भी शुरू, चलने फिरने की दिक्कत का होगा डिजिटल वैल्युएशन
- कैंसर मरीजों को समय पर मिलेगी रेडियोथेरेपी
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विस्तार
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी अब और भी आधुनिक सुविधाओं से लैस हो गई है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोमवार को यहां 153 करोड़ रुपये की सुविधाओं का लोकार्पण किया।
इनमें मुख्य रूप से लीनियर एक्सीलिरेटर, डिजिटल मैमोग्राफी, गेट लैब, डिजिटल सबट्रैक्शन एंबुलाइजेशन (डीएसए), इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप, स्लाइड स्कैनर मशीन, पीडियाट्रिक आईसीयू और ट्रॉमा सेंटर का तो तत्काल मरीजों को फायदा मिलने लगा।
कार्डियोलॉजी विभाग के विस्तार, बेड की क्षमता दोगुनी करने से लेकर कैथ लैब की संख्या भी जल्द ही बढे़गी। जानिए इन सुविधाओं से इलाज के तौर-तरीकों में क्या बदलाव आएंगे, मरीजों को क्या फायदा होगा।
गेट एंड मोशन लैब :मांसपेशियों का हो सकेगा सटीक इलाज
1.99 करोड़ रुपये की लागत से केजीएमयू के डिपार्टमेंट ऑफ फिजिकल मेडिसन एंड रिहैबिलिटेशन (डीपीएमआर) में अत्याधुनिक गेट एंड मोशन लैब स्थापित की गई है।
फायदा क्या : लैब की अत्याधुनिक मशीनों से निशक्तों के पैरों की मांशपेशियों की कार्यप्रणाली को डिजिटली रिकॉर्ड किया जा सकता है। लैब में एक मैट पर मरीज को चलने के लिए कहा जाता है। इस दौरान उसकी दो अलग-अलग एंगल से वीडियो फिल्म बनायी जाती है।
मैट में लगे सेंसर उसके पैर के पड़ने वाले दबाव को रिकॉर्ड करते हैं जो कम्प्यूटर में दर्ज होता रहता है। इससे मांसपेशिया, हड्डी के जोड़ों और चलने के तरीके का विश्लेषण कर समस्या की तह तक पहुंचा जा सकता है। यानी आसानी से पता लगाया जा सकता है कि मांशपेशियों पर कहां-कितना दबाव पड़ता है, क्या रुकावटें आ रही हैं और उसका सटीक उपचार किया जा सकता है।
डिजिटल सबट्रैक्शन एंजियोग्राफी : सिकुड़ी नसों को खोलने व रूकावटों को दूर करने में मिलेगी मदद
रेडियोडायग्नोसिस विभाग में स्थापित डिजिटल सब्सट्रैक्शन एंजियोग्राफी (डीएसए) की सुविधा शुरू हो गई। विभाग में पांच करोड़ की लागत से ये मशीन लगाई गई है।
फायदा क्या : इससे शरीर के किसी भी अंग की धमनी (आर्टरी), शिरा (वेन) में पैदा हुई रुकावट को देखा जा सकता है। साथ ही उसे खोला भी जा सकता है। यही नहीं किसी ट्यूमर से हो रहे रक्तस्राव, मस्तिष्क में विकसित हो रहे किसी ट्यूमर में खून की आपूर्ति को रोकने, सिकुड़ चुकी नसों को खोला जा सकता है।
गुर्दे में होने वाली दिक्कत हो या फिर मस्तिष्क में हो रहा रक्तस्राव, इस तकनीक में सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती सिर्फ नसों और धमनियों के रास्ते ही जाकर इलाज किया जा सकता है। यूरोलॉजी विभाग के मरीज की सर्जरी करते समय उसके रक्तस्राव को रोकने के लिए डीएसए तकनीक की मदद ली गई थी। अभी तक ये सुविधा सिर्फ एसजीपीजीआई में ही थी।
रेडियोथेरेपी के लिए वेटिंग से मिलेगी निजात
लीनियर एक्सीलिरेटर: रेडियोथेरेपी के लिए नहीं करना होगा इंतजार
9 करोड़ की लागत की इस मशीन से केजीएमयू में इलाज कराने वाले कैंसर मरीजों को रेडियोथेरेपी के लिए वेटिंग से निजात मिल सकेगी।
8 साल से डिब्बे में बंद पड़ी लीनियर एक्सीलिरेटर मशीन की शताब्दी फेज टू के बेसमेंट में इसकी स्थापना की गई है। दो मरीजों की रेडियोथेरेपी भी इस मशीन से की जा चुकी है।
फायदा क्या : इससे कैंसर की चपेट में आई कोशिकाओं को निशाना बनाकर रेडियोथेरेपी दी जाती है। यही नहीं शरीर के किसी भी भाग में स्थित कैंसरग्रस्त कोशिकाओं को चिह्नित कर रेडियोथेरेपी दी जा सकती है। यानी इससे स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान नहीं पहुंचता।
अभी तक इस अत्याधुनिक मशीन से सिर्फ एसजीपीजीआई, लोहिया इंस्टीट्यूट में ही मरीजों को इलाज मिल रहा था। जबकि केजीएमयू के रेडियोथेरेपी विभाग में कोबाल्ट से रेडियोथेरेपी की सुविधा ही रही है। वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन इस तकनीक को ही आउटडेटेड करार दे चुका है।
इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप : गंभीर बीमारियों की डायग्नोसिस हुई आसान
केजीएमयू के पैथोलॉजी विभाग में 11 करोड़ रुपये की लागत से दो इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप भी खरीदे गए हैं।
इसमें एक स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप (एसईएम) है और दूसरा ट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप (टीईएम) है।
इससे सामान्य माइक्रोस्कोप के मुकाबले 10 हजार गुना ज्यादा बड़ी इमेज दिखती है।
फायदा क्या : किडनी, स्किन डिजीज, मांशपेशियों और न्यूरोलॉजी से संबंधित बीमारियों की पहचान के लिए इसके इस्तेमाल किया है। स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से किसी भी कोशिका के ऊपरी हिस्से को देखा जा सकता है, जबकि ट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से कोशिका के भीतर की इमेज मिलती है।
इससे मिली इमेज को कहीं भी लाइव देखा जा सकता है। यानी डायग्नोसिस करना आसान होगा।
ओरल मेडिसिन एंड रेडियोलॉजी विभाग में लगी 1.08 करोड़ की मशीन
डिजिटल स्लाइड स्कैनर : डिजिटल पैथोलॉजी की ओर बढ़ा कदम
1.32 करोड़ रुपये की इस मशीन से टिश्यू की स्लाइड इमेज को देखा जाता है। एक बार में 480 स्लाइड स्कैन कर उसकी इमेज अपने अपने सर्वर में स्टोर कर लेता है। ये फिल्म इस स्कैनर में हमेशा के लिए सुरक्षित हो जाती है।
फायदा क्या : फिल्म को जरूरत पड़ने पर कभी भी चिकित्सक कम्प्यूटर पर देख सकता है। यही नहीं इस इमेज को दूसरे चिकित्सकों को ई-मेल भी किया जा सकता है।
खासतौर से कैंसर टिश्यू की बायोप्सी की इमेज ले सकते हैं। स्लाइड के अलग-अलग हिस्सों की इमेज भी अधिक साफ देखी जा सकती है। स्कैनर से मिली इमेज का कॉन्फ्रेंसिंग, टीचिंग, लाइव डिमांस्ट्रेशन में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
3-डी कोन बीम कम्प्यूटेड टोमोग्राफी : जबड़े के फ्रैक्चर की स्कैनिंग और इम्पलांट लगाना हुआ आसान
ये मशीन भी सीटी स्कैन की तरह ही काम करती है लेकिन इसमें रेडिएशन उससे दसवां हिस्सा ही इस्तेमाल होता है। 1.08 करोड़ की इस मशीन को दंत संकाय के ओरल मेडिसिन एंड रेडियोलॉजी विभाग में लगाया गया है।
फायदा क्या : पूरे चेहरे का सीटी स्कैन एक बार में ही हो जाता है। खासतौर से चेहरे के किसी भी हिस्से फ्रैक्चर, जबड़े के ट्यूमर या पैदाइशी विकृति की इमेज ली जा सकती है। इसके अलावा जबड़े में इम्प्लांट लगाने से पहले की प्लानिंग में भी इस मशीन का इस्तेमाल किया जाता है।
पीडियाट्रिक क्रिटिकल केयर यूनिट
इसे ट्रॉमा सेंटर चतुर्थ तल पर एक ही छत के नीचे विकसित किया जा रहा है। जहां नवजात से लेकर 14 साल तक के बच्चों की इमरजेंसी और गहन चिकित्सा की सुविधा मिलेगी।
इसमें एनआईसीयू -नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट, पीआईसीयू-पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट, पीडियाट्रिक इमरजेंसी की सुविधा होगी। अभी एनआईसीयू और पीआईसीयू केजीएमयू परिसर में बाल रोग विभाग में हैं। ट्रॉमा सेंटर के पीआईसीयू में 40 वेंटीलेटर की व्यवस्था होगी।