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..तो हमारे 'आम' हो जाएंगे विदेशों में 'खास'
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Mon, 05 May 2014 04:31 AM IST
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यूरोपीय बाजारों में महाराष्ट्र के हापुस (अल्फांसो) प्रजाति के आम पर प्रतिबंध लगने के बाद उत्तर प्रदेश के आम की दर्जनों प्रजातियों की विदेशों में लोकप्रियता बढ़ाने का मौका मिलता दिख रहा है।
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प्रदेश में आम की 700 से अधिक किस्में हैं। इनमें से सबसे खास हैं दशहरी, चौसा, लंगड़ा, सफेदा, अनारकली, जिन्हें हापुस की तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रांड के तौर पर उतारा जा सकता है।
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इनमें से अधिकतर किस्में मलिहाबाद और इसके आसपास के क्षेत्र में मिलती हैं। जानकारों की मानें तो प्रदेश के आम को विदेश तो क्या, अपने घर में ही कम जाना-पहचाना जाता है, लेकिन इनका संरक्षण किया जाए तो ये हापुस को टक्कर दे सकते हैं।
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देश में आमों के सबसे बड़े विशेषज्ञ माने जाने वाले पद्मश्री हाजी कलीमुल्ला खां कहते हैं, लखनऊ में कई लोग हमें बताते हैं कि उन्होंने फलां-फलां महीने में फलां-फलां आम खाया था।
वे उसका साइज, रंग-रूप तो बताते हैं, लेकिन नाम नहीं बता पाते। वे फिर से उस आम का स्वाद लेना चाहते हैं, लेकिन जब नाम ही नहीं जानेंगे तो कैसे उसे ढूंढ पाएंगे?
जब अपने ही बाजार में पहचान मुश्किल हो रही है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान कैसे बनाएंगे? खां इस बात को दुखद मानते हैं कि ‘हापुस’ पर यूरोप ने बैन लगा दिया है।
वे कहते हैं कि इससे देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा लेकिन वे यह भी कहते हैं कि यूपी के आमों के निर्यात से हापुस पर प्रतिबंध से मुल्क को होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सकती है।
वे कहते हैं कि प्रदेश में उगाई जा रही प्रजातियों की अपनी खासियत है। हापुस एक ब्रांड बना क्योंकि उसे सही मार्केटिंग मिली, जबकि प्रदेश के आमों को ऐसा कुछ नहीं मिल सका है।
खां दावा करते हैं कि एक दफा चौसा, दशहरी, सफेदा को चखने के बाद विदेशी बाजारों में हापुस की तरह इनकी मांग भी हो सकती है।
वहीं, हालिया जारी रिपोर्ट में एसोचैम के सचिव डीएस रावत कहते हैं कि इस वर्ष यूएई, इंग्लैंड, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, बांग्लादेश आदि देशों में हमारे आम की मांग बढ़ी थी, लेकिन अब यह प्रतिबंध नुकसान कर सकता है।