चुनावों के पहले इन बड़े बदलावों से गुजरेगी सपा, मुलायम ने दिए संकेत
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क्या समाजवादी पार्टी को सर्जरी की जरूरत है? क्या संगठन व सरकार में बदलाव होंगे? मुलायम सिंह यादव ने स्वतंत्रता दिवस पर पार्टी और सरकार को लेकर जिस तरह का रुख अख्तियार किया, उससे ये सवाल कार्यकर्ताओं के बीच उठ रहे हैं। सपा नेता भी इनसे इन्कार नहीं कर रहे हैं।
हालांकि उनका मानना है कि सपा मुखिया के रहते पार्टी एकजुट रहेगी और मतभेद जल्द दूर हो जाएंगे। इस बीच, पार्टी सूत्रों का दावा है कि इस संकट से उबरने के लिए संगठन में बड़े बदलाव की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
सपा में हालिया विवाद जमीनों पर कब्जे को लेकर पैदा हुआ है। कब्जे न हटने पर ही शिवपाल ने पद छोड़ने की चेतावनी दी। सपा के भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक स्थानीय निकाय क्षेत्र से निर्वाचित एक विधान परिषद सदस्य पर पार्टी का गढ़ समझे जाने वाले मैनपुरी, इटावा व कुछ अन्य स्थानों पर जमीन कब्जा करने वालों को शह देने का आरोप लगा है।
ये एमएलसी मुलायम सिंह परिवार के ही वरिष्ठ नेता के करीबी माने जाते हैं। कब्जा हटाने के निर्देशों पर अमल न होने से शिवपाल नाराज हुए। यह मामला एक तरह से परिवार से जुड़े लोगों के बीच का है। इसीलिए पार्टी प्रवक्ता समेत कोई भी नेता इस मुद्दे पर बोलने को तैयार नहीं।
मुलायम ने खुद कहा, हो रहे हैं जमीनों पर कब्जे
मुलायम सिंह ने भी 15 अगस्त को कहा था कि इटावा से आगरा तक जमीनों पर कौन कब्जे कर रहा है, सब जानते हैं। खरी-खरी सुनाने के बाद सपा मुखिया ने अखिलेश व शिवपाल यादव से बातचीत करके सपा के भीतर चल रही घमासान की आग पर पानी डालने की कोशिश की है।
लेने होंगे कुछ कड़े फैसले
मुलायम सिंह को अगर पार्टी को बचाना है तो न सिर्फ लगातार सचेत और सक्रिय रहना पड़ेगा बल्कि भविष्य में कुछ कडे़ फैसले भी लेने पड़ेंगे। अखिलेश और शिवपाल के बीच सरकार और पार्टी संगठन को लेकर काफी पहले से मतभेद है, लेकिन ये कभी सार्वजनिक नहीं हुए। इनका सतह पर आना मुलायम के लिए चिंता का सबब हो सकता है।
सपा नेता मानते हैं कि नेताजी का ऑपरेशन डैमेज कंट्रोल अंतिम नहीं है, आगे भी ऐसी घटनाएं फिर सामने आ सकती हैं। मुलायम जिस तरह से मंत्रियों और पार्टी नेताओं को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, उससे संगठन और सरकार में बदलाव की संभावना है।
छवि से मुक्ति की कोशिश
उधर, मुख्यमंत्री के नजदीकी लोगों का मानना है कि सीएम अखिलेश की छवि चुनाव में बहुत अहम होगी। इससे कोई समझौता नहीं होना चाहिए। कौमी एकता दल के विलय का विरोध करके उन्होंने सही फैसला लिया। इससे उनका कद बढ़ा है। उनके लिए साढ़े चार सीएम की छवि से मुक्त होना भी जरूरी है। छवि से मुक्ति से छटपटाहट में लिए गए उनके फैसले कुछ लोगों को हजम नहीं हो पाते हैं। वे जमीन पर कब्जों के आरोपों से सहमत नहीं हैं।
सोची समझी रणनीति तो नहीं
हालांकि, सियासी गलियारों में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो इस पूरे मामले को मुलायम परिवार की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा मानते हैं। इनका तर्क है कि मुलायम की डांट-फटकार अखिलेश की इमेज बनाने की रणनीति का हिस्सा है। वह विरोधियों का अस्त्र छीन लेते हैं।
सपा मुखिया ने संदेश दिया है कि अखिलेश भले ही परिवार में छोटे हों लेकिन फैसले लेने में उन पर किसी तरह का दबाव नहीं रहता।
सवा चार साल मुख्यमंत्री रह चुके अखिलेश अब कुशल प्रशासक बन चुके हैं, उन्हें सही-गलत के बीच भेद करना आ गया है। नाराजगी जताने वाले शिवपाल की तरफदारी उन्होंने परिवार में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए की है।
मैं तो चार साल से कर रहा था शिकायत
17 अगस्त को मुरादाबाद में शिवपाल यादव ने कहा था कि अवैध कब्जे के मामलों में लेखपाल से लेकर अफसर तक पर कार्रवाई होगी। इसके लिए मैं नेताजी से चार साल से शिकायत कर रहा था। बाद में मुख्यमंत्री से भी शिकायत की है।