अगर अलग मोर्चा बनाते हैं शिवपाल तो ये होंगी उनकी चुनौतियां
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शिवपाल सिंह यादव के नया सेकुलर मोर्चा बनाने के एलान के पीछे वजह क्या है। कहीं ऐसा तो नहीं कि समाजवादी पार्टी में खुद को अपमानित व असहज महसूस कर रहे शिवपाल पार्टी के मौजूदा नेतृत्व को अपनी बर्खास्तगी के लिए मजबूर कर देना चाहते हैं, जिससे उनकी विधायकी बची रहे और उन्हें राजनीतिक रूप से नई राह चुनने का मौका मिल जाए। साथ ही सियासी चौसर पर भतीजे अखिलेश यादव को सबक सिखाया जा सके।
पार्टी के अन्य उन विधायकों को भी जोड़ने में आसानी रहे जो उनके समर्थक हैं। सूबे के सियासी गलियारों में ये सवाल तेजी से गूंज रहे हैं।
हालांकि कुछ लोगों का मानना यह भी है कि इस एलान के पीछे शिवपाल का प्रयास अखिलेश यादव पर मुलायम सिंह यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद सौंपने का दबाव बनाना भी है, जिससे उनकी (शिवपाल) अपनी राजनीतिक हैसियत बनी रहे।
दरअसल, इन सवालों के उठने की वजहें हैं। भले ही शिवपाल ने सेकुलर मोर्चा बनाने की बात कही हो, पर मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यूपी में किसी मजबूत सियासी मोर्चे की राह आसान नजर नहीं आ रही है।
कहीं से भी शिवपाल को समर्थन मिलने की संभावना नहीं
वैसे वामपंथी दलों ने अभी मोर्चे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, पर वे साथ आ जाएं तो भी सूबे की सियासत में किसी बड़े बदलाव के संकेत नहीं दिखाई देते क्योंकि वे यूपी में खुद अपनी जमीन तलाशने का संघर्ष कर रहे हैं। भाजपा तो मोर्चे में शामिल होने से रही।
भाजपा के बाद 47 विधायकों के साथ बड़ी पार्टी सपा ही है। उसके भी मोर्चे में आने की संभावना दूर-दूर तक नहीं है। बचा राष्ट्रीय लोकदल, तो उसके आ जाने से भी सूबे के सियासी समीकरणों में फिलहाल बड़ा फेरबदल होने का संकेत नहीं दिखता।
बसपा व कांग्रेस के भी साथ आने की उम्मीद कम
बसपा सुप्रीमो मायावती विधानसभा चुनाव के दौरान शिवपाल को लेकर सहानुभूति जताती रही हैं। पर, वह मोर्चे में आ जाएंगी, इसकी उम्मीद नहीं दिखाई देती। कारण, मायावती किसी दूसरे को नेता स्वीकार करने से रहीं।
कांग्रेस के मोर्चे में आने की संभावना इसलिए भी क्षीण है क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर पिछले दिनों किसी नए राजनीतिक प्रयोग से इन्कार कर चुके हैं। साथ ही निकाय चुनाव अकेले और अपने दम पर लड़ने का एलान करके एक तरह से सपा से चल रहे गठबंधन से अलग होने का संकेत दे चुके हैं।
शिवपाल की सियासी चतुराई तो नहीं
तो फिर मोर्चा बनाने की वजह क्या है? उत्तर जानने से पहले यह भी समझना होगा कि मोर्चा बनाने से संविधान की दसवीं अनुसूची में दिए गए प्रावधानों के अनुसार शिवपाल या उनके साथ जुड़ने वाले सपा के अन्य विधायक दलबदल कानून के दायरे में नहीं आएंगे। मोर्चा एक मंच होगा न कि कोई राजनीतिक पार्टी।
कोई विधायक या सांसद अपने दल का सदस्य रहते हुए भी मोर्चा का हिस्सा रह सकता है जबकि पार्टी बनाने पर नियमानुसार, यह उसका स्वत: दल त्याग मान लिया जाएगा और विधानसभा या लोकसभा से उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
राजनीति शास्त्री एसके द्विवेदी कहते हैं कि शिवपाल को पता है कि भतीजे अखिलेश से उनकी जिस सीमा तक तल्खी है, उसमें मोर्चा बनाने पर भी कार्रवाई होगी ही।
शिवपाल भी शायद यही चाहते हैं कि अखिलेश उन्हें बर्खास्त कर दें, जिससे उनकी सदस्यता बची रहे और वे स्वतंत्र रूप से राजनीतिक गतिविधियां संचालित करते रहें। प्रो. द्विवेदी के अनुसार, सपा में विघटन तय है। सवाल बस अब यह है कि यह कितने दिन टल सकता है।
अपना अस्तित्व बचाए रखने में जुटे शिवपाल
वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय कहते हैं कि समाजवादी परिवार का झगड़ा शिवपाल के राजनीतिक अस्तित्व बचाने तक आ पहुंचा है। ऐसे में शिवपाल का सपा में लंबे समय तक टिकना संभव नहीं।
इसीलिए शिवपाल की एक तरफ अखिलेश को वादा याद दिलाते हुए सपा की बागडोर मुलायम सिंह यादव को सौंपने की मांग और दूसरी तरफ मोर्चा बनाने का एलान, यह साबित करता है कि वह एक साथ दो निशाने साध रहे हैं।
शिवपाल को पता है कि अखिलेश अब मुलायम को पार्टी का नेतृत्व सौंपने वाले नहीं। फिर भी वह अखिलेश को पुराना वादा सार्वजनिक रूप से याद दिलाकर सपा के लोगों को संदेश देना चाहते हैं कि किस तरह मुलायम का अपमान हो रहा है। इसी अपमान से त्रस्त होकर उन्हें मोर्चा बनाने की राह चुननी पड़ रही है। शिवपाल के लिए वास्तव में वजूद बचाने की ही लड़ाई है।
खुद के साथ पुत्र आदित्य और अपने समर्थकों के भी राजनीतिक भविष्य का सवाल है। वह जानते हैं कि अखिलेश और प्रो. रामगोपाल की अगुवाई वाली सपा में उनकी पहले जैसी हनक या धमक दोबारा होने की संभावना नहीं। इसलिए वह मोर्चा के जरिए अपनी राजनीतिक हैसियत बनाए रखना चाहते हैं।
मोर्चा बनाने का मतलब दल तोड़ना नहीं
मामले पर समाजवादी चिंतन सभा के अध्यक्ष व शिवपाल यादव के करीबी दीपक मिश्र का कहना है कि इस समय जिस तरह समाजवादी आंदोलन के सामने संकट खड़ा हुआ है, उसके चलते मोर्चा बनाने का फैसला लोकतंत्र, सामाजिक न्याय व समाजवादी आंदोलन बचाने की लड़ाई है।
लोहिया व जेपी की विरासत बचाने का संघर्ष है। शिवपाल समाजवाद और समाजवादियों के सम्मान की ही लड़ाई लड़ रहे हैं।
पिछले दिनों सपा कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न के खिलाफ उनका धरने पर बैठना इसी का हिस्सा है। अगर किसी को उनके मोर्चा बनाने केएलान में कुछ और दिखता है तो यह उसका विवेक है।