2014 चुनाव में 'जाति' की होगी जीत
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इस होड़ में कोई एक दल या नेता नहीं बल्कि सभी शामिल हैं। जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में नाम के साथ जाति के इस्तेमाल पर एक तरह से अघोषित प्रतिबंध है, वहीं से निकले नरेंद्र मोदी रैलियों में यह बताना नहीं भूल रहे हैं कि वे पिछड़ी जाति से आते हैं। जाति तोड़ो और समाज जोड़ो की संस्कृति से सियासत में पदार्पण करने वाले मुलायम सिंह यादव जातिवाद का विरोध अब भी करते हैं, पर सियासत में जाति के रंग को गाढ़ा करने का जितना काम उनके नाम है उतना शायद ही किसी के नाम दर्ज हो।
अपना नारा भूल गई कांग्रेस
नारा तो कांग्रेस का भी जातिवाद विरोधी ही रहा, पर वोट के लिए जातीय गणित बिठाने में यह दल भी पीछे नहीं रहा। हाल के दिनों में केंद्र सरकार के फैसलों सेे यह बात पूरी तरह साबित हो जाती है। दलितों की आवाज बनकर उभरी बसपा भी मायावती के नेतृत्व में जातीय गणित से चुनावी सफर को आसान बनाने में जुटी है। यही वजह है कि प्रदेश की सपा सरकार ने पिछड़ी जातियों की क्रीमी लेयर सीमा पांच लाख से बढ़ाकर आठ लाख रुपये कर दी है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 58 अन्य जातियों को पिछड़ी जाति का दर्जा देने का निश्चय किया है। अभी पिछले दिनों ही केंद्र सरकार ने जैन समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा देने का फैसला किया। उससे कुछ समय पहले उसने जाटों को पिछड़ी जाति की सूची में शामिल करने पर सैद्धांतिक सहमति की घोषणा की थी।
अखिलेश भी चल रहे पीछे-पीछे
सिर्फ केंद्र सरकार ही नहीं, प्रदेश सरकार भी इसमें पीछे नहीं है। प्रदेश में पिछले वर्ष ही 17 अति पिछड़ी जातियों को दलितों का दर्जा देने के पुराने मुद्दे को हवा देकर उसने जातियों की सियासी जुगलबंदी और उन्हें अपने पाले में खींचने की कोशिश की। जातियों की गोलबंदी के लिए सामाजिक न्याय अधिकार यात्रा निकाली गई। भाजपा ने भी केंद्र में सरकार बनने पर अति पिछड़ी जातियों को उनकी आबादी के आधार पर आरक्षण देने को सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट को लागू करने के मुद्दे को हवा दे दी है। बसपा ने भी अति पिछड़ी और सवर्णों को आरक्षण का नारा बुलंद किया है।
छुट्टियों पर भी गजब सियासत
वोटों की जुगत बिठाने के लिए छुट्टियों की सियासत भी यूपी में खूब परवान चढ़ी है। सपा सरकार ने पिछले साल सरकारी अवकाशों की सूची में दो नई छुट्टियां जोड़ीं। इनमें 5 अप्रैल को निषादराज जयंती और 23 दिसंबर को चौधरी चरण सिंह की जयंती पर छुट्टी की घोषणा शामिल है। मुलायम ने वर्ष 2003 से 2007 की सरकार में परशुराम जयंती पर सार्वजनिक अवकाश घोषित कर अपने चेहरे को ब्राह्मण हितैषी लुक देने की कोशिश की थी। इससे पहले बसपा सरकार ने भी कई छुट्टियों का ऐलान किया था।
महापुरुषों के नाम को भुनाने से भी गुरेज नहीं
अतीत पर नजर दौड़ाएं तो जातियों को अपने पाले में खींचने के लिए महापुरुषों की श्रेणी में शामिल हो चुके नेताओं का भी इस्तेमाल जमकर किया गया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, डॉ. राम मनोहर लोहिया, सरदार वल्लभ भाई पटेल और डॉ. भीमराव अंबेडकर की जातियों की तलाश और उन्हें एक विशिष्ट जाति का प्रतीक बनाकर कभी जातियों को लामबंद करने की कोशिश की गई तो कभी इनके जरिये वोटों के जुगाड़ की कोशिश हुई। हालांकि वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि उत्तर प्रदेश जातिवादी राजनीति के लिए भले ही सबसे ज्यादा बदनाम रहा हो लेकिन इस सियासत में जाति के रंग को सबसे ज्यादा गाढ़ा बनाने का काम इस बार केंद्र कर रहा है।
केंद्र चल रहा सबसे 'शातिर' चाल
गूजरों से लेकर जाटों तक को आरक्षण के मुद्दे पर केंद्र सरकार यही करती दिखी है। जैन समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा देना हो या बिहार के मोस्ट बैकवर्ड क्लास को सुविधाओं की बात हो, सबके पीछे कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की मंशा वोट बैंक को ठीक करने की दिखी है। जहां तक इनके राजनीतिक इस्तेमाल की बात है तो यह सियासत की आवश्यक विसंगति बन गई है। जब राजनीति के पास अपने सकारात्मक मुद्दे नहीं होंगे तो जातियों की गणित से वोट बढ़ाने का रास्ता खोजा ही जाएगा।