पुलिसगिरी: पीटने के आदी और भी हैं साहेब!
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अंग्रेजों के समय में मातहत पर हाथ उठा देने की आला अफसरों की बीमारी
अपनी लाट साहबी के चलते प्रदेश के कई पुलिस अफसर अपनी हरकतों के लिए अक्सर चर्चा में रहते हैं।
इन्हें मामूली बातों पर भी गुस्सा आ जाता है। रसूख का आलम ये है कि ये मातहतों को धमकी देने के साथ पिटाई भी कर देते हैं।
कई बार तो अफसर थाने में तैनात कर्मी का गिरेबान तक पकड़ लेते हैं। एक अफसर तो चौराहे पर ही अपने मातहत से मारपीट पर उतारू हो गए थे। अब मुरादाबाद के एसएसपी राजेश डी राव मोदक भी इस जमात में शामिल हो गए हैं।
अधिकतर मामलों में अफसर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के साथ न सिर्फ मारपीट करने बल्कि उत्पीड़न करने के भी आरोपी पाए गए हैं। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की लगातार शिकायत रही है कि उनसे निजी काम लिये जाते हैं और उन्हें प्रताड़ित किया जाता है।
उन्हें न तो अवकाश दिया जाता है न ही किसी तरह की सुविधा। ऐसा नहीं है कि अफसरों को मातहतों या अन्य लोगों से किस तरह बर्ताव किया जाए, इसका प्रशिक्षण नहीं दिया जाता लेकिन सत्ता का करीबी होने और कुर्सी पर बैठने के साथ ही कई अफसर इन तमाम बातों को भूल जाते हैं और मनमाने पर उतारू हो जाते हैं।
इन अफसरों को ट्रेनिंग के दौरान मानवाधिकारों की भी पूरी जानकारी दी जाती है लेकिन नौकरी के दौरान सारे नियम कायदे ताक पर रख देते हैं।
ये हैं चार मामले-
1- पुलिस अग्निशमन विभाग के आईजी हरिओम शर्मा पर आरोप है कि उन्होंने सहारनपुर से एक कर्मचारी को बुलाकर अपने आवास के निजी कार्यों के लिए लगाया। जब उसने विरोध किया तो आईजी मारपीट पर आमादा हो गए और पगार काटने व दंड देने की धमकी दी।
तब आईजी के खिलाफ पुलिस के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की एसोसिएशन ने महानगर कोतवाली में मुकदमा दर्ज कराने की नाकाम कोशिश की। अब अदालत के जरिए मुकदमा लिखाने की तैयारी हो रही है।
2-मुरादाबाद में ही रेलवे के एसपी आरके भारद्वाज पर उनके यहां तैनात चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने उत्पीड़न का आरोप लगाया। तब उसके साथ मारपीट की गई।
इस मामले में भी पुलिस कर्मी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी एसोसिएशन ने एसपी के खिलाफ मुकदमा कराने की कोशिश की पर कामयाब नहीं हो सके। एसोसिशन ने डीजीपी से कार्रवाई की मांग की है।
3-बसपा शासनकाल में लखनऊ में तैनात एक प्रभावशाली एसएसपी के किस्से भी खासा मशहूर है। हालांकि, उनके खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई और न ही मातहतों उनके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत जुटा सके।
कहा जाता है कि अपने कार्यकाल के दौरान एसएसपी ने न सिर्फ बंगले पर मौजूद कुछ कर्मचारियों पर हाथ उठाया बल्कि थाने और कोतवाली में भी ऐसा ही किया। चूंकि, कप्तान साहब सीधे सत्ता से जुड़े थे, लिहाजा कोई भी उनके खिलाफ शिकायत करने की जुर्रत नहीं कर सका।
4-बसपा शासनकाल में ही लखनऊ के एसपी ट्रांस गोमती रहे परेश पांडे भी मातहतों से मारपीट करने के मामले में सुर्खियों में आ चुके हैं। उन पर एक ट्रैफिक सब इंस्पेक्टर से हाथापाई करने का आरोप है। पांडे को इस बात पर गुस्सा आ गया था कि चेकिंग के दौरान उनके एक परिचित को टीएसआई ने रोक लिया था।
बाद में एसपी ने अपना बचाव करते हुए यह कहा कि वह जब मौके पर पहुंचे तो टीएसआई ने उनसे अभद्रता की थी। जिसके चलते वह नाराज हुए थे।
कोड ऑफ कंडक्ट क्यों भूलते हैं अफसर
श्रीराम अरुण, पूर्व डीजीपी
‘एसएसपी या एसपी जिले में तैनात पुलिस बल का मुखिया होता है। कारण चाहे जो हों, इन्हें अपने मातहतों से ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। पुलिस विभाग ज्वाइन करते समय इन्हें कोड ऑफ कंडक्ट पढ़ाया जाता है। इसे कैसे भूल सकते हैं। ऊपर से मानवाधिकारों पर जोर है।
ऐसे में उसी को नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है। अगर मातहत ने गलती की थी तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती थी, न कि खुद ही मारपीट की जानी चाहिए। यह सही है कि अब कई अधिकारी सत्तारूढ़ दल के नेताओं के दबाव में आ जाते हैं।
जबकि कप्तान या किसी भी अधिकारी का जन प्रतिनिधियों के प्रति समान रवैया होना चाहिए। एमपी, एमएलए आदि के लिए कुछ प्राथमिकता होती है, लेकिन सबके लिए नहीं। अगर किसी नेता को कुछ देर रुकना पड़ा तो भी एसएसपी का यह रवैया सही नहीं।’