38 लाख लोगों के लिए सिरदर्द बनी कॉल ड्रॉप, कमजोर मोबाइल सिग्नल व नेटवर्क फॉल्ट बढ़ा रहा परेशानी
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मोबाइल नेटवर्क की सेवा देने वाली कंपनियों में लगी प्रतिस्पर्धा राजधानी के 38 लाख से अधिक उपभोक्ताओं का सिरदर्द बढ़ा रही है। कमजोर कनेक्टिविटी सिग्नल के साथ नेटवर्क फॉल्ट के कारण एक मोबाइल ऑपरेटर से दूसरे के नेटवर्क पर कॉल करना परेशानी बन गया है।
कॉल जंपिंग के इस खेल की दोहरी मार सबसे ज्यादा प्री-पेड सेवा के उपभोक्ताओं पर पड़ रही है। एक तो ये बात नहीं कर पाते, दूसरा इनके पैसे भी कट जाते हैं। पीक आवर में फेल नेटवर्क सिस्टम ऑनलाइन सेवा से जुड़े सरकारी काम की रफ्तार पर भी ब्रेक लगाए हैं। सेवा में सुधार न होने पर डीएम ने तीन बड़ी सेवा प्रदाता कंपनियों को नोटिस जारी कर कार्रवाई की चेतावनी दी है। इसमें एक सरकारी व दो निजी कंपनियां हैं।
जानबूझकर कमजोर कर देते सिग्नल
बीएसएनएल की तकनीकी सेवा से डीजीएम पद से सेवानिवृत्त हुए अधिकारी ने बताया कि ऑपरेटर कंपनी मोबाइल स्विचिंग सेंटर से मोबाइल नंबरों को आपस में जोड़ने वाले नेटवर्क सिग्नल को पीक ऑवर में जानबूझकर कमजोर कर देती हैं। इससे कॉल ड्रॉप, कॉल जंपिंग व कॉल रिजेक्ट जैसी परेशानियां पैदा कर इसका फायदा मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी से अपने ग्राहक बढ़ाने में होता है।
पीक ऑवर में बढ़ जाता है खेल
कंपनियां सुबह 9.30 से 11.30 और शाम 4.30 से 6.30 बजे तक के समय को पीक आवर की तरह मानती हैं। इस दौरान नेटवर्क पर कॉल लोड सबसे ज्यादा होता है। ऐसे में कॉल रिजेक्ट, जंपिंग का खामियाजा उपभोक्ता भुगतते हैं। इसकी बढ़ती शिकायतों पर ही डीएम ने नोटिस जारी किया है।
एक नेटवर्क से दूसरे पर बात करना चुनौती
बीएसएनएल सहित एयरटेल, वोडाफोन व रिलायंस मोबाइल सेवा के संचालन से जुड़े जिम्मेदार भी मानते हैं कि कॉल ड्रॉप, कॉल जंपिंग की समस्या एक मोबाइल ऑपरेटर के नेटवर्क से दूसरे पर कॉल करने पर आती है। इस दौरान फोन मिलता तो है, लेकिन कॉल रिसीव करते ही कट जाता है।
दो से तीन बार नंबर मिलाने पर ही बात हो पाती है। बीएसएनएल के पूर्वी सर्किल के पीजीएम सतीश कुमार ने समस्या दूर कराने के लिए सिग्नल टावरों की जोनवार निगरानी का निर्देश तकनीकी सेवा से जुड़े अधिकारियों को दिया गया है।
फ्रीक्वेंसी घटा-बढ़ाकर करते हैं कॉल ड्रॉप
टेलीकॉम सेवा से जुड़े अधिकारी बताते हैं कि मोबाइल ऑपरेटरों के सिग्नल रिसीव करने वाले बीटीएस टॉवर का जोन बंटा होता है। एक से दूसरे जोन में जाने पर सिग्नल कमजोर हो सकते हैं, इसी दौरान कनेक्टिविटी की दिक्कत आती है।
निजी ऑपरेटरों का अपने बीटीएस टावर पर नियंत्रण रहता है। इन्हीं टावर से सिग्नल की फ्रीक्वेंसी घटा-बढ़ाकर कॉल ड्रॉप का खेल होता है,जबकि ट्राई का नियम है कि कंपनियां फ्रीक्वेंसी को समान रखेंगी। यह खेल पीक ऑवर में कॉल ट्रैफिक लोड अधिकतम होने पर होता है। बाद में ट्रैफिक कंजेशन की आड़ में कंपनियां खुद को बचा लेती हैं।