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सीएजी ने यूपीपीटीसीएल के कामकाज पर उठाए सवाल

Sat, 22 Aug 2020 11:53 AM IST
विक्रांत चतुर्वेदी अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: विक्रांत चतुर्वेदी Updated Sat, 22 Aug 2020 11:53 AM IST
सार

  • स्थापित होने के एक वर्ष के भीतर ही ओवरलोडेड हो गए उपकेंद्र

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CAG raised questions on the functioning of UPPTCL
Electricity - फोटो : पेक्सेल्स

विस्तार

भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (सीएजी) ने यूपी पावर ट्रांसमिशन लि. (यूपीपीटीसीएल) के कामकाज पर सवाल उठाया है। विधान परिषद में शुक्रवार को पेश की गई 31 मार्च 2018 को समाप्त हुए वर्ष की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार ट्रांसमिशन परियोजनाएं समय पर पूरी न होने से करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है। 
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परियोजनाओं की सही प्लानिंग न होने से जहां कुछ उपकेंद्र स्थापित होने से एक वर्ष के भीतर ही ओवरलोडेड हो गए, वहीं कई उपकेंद्रों में ऐसी क्षमता सृजित हुई जिसका कोई फायदा नहीं मिल सका। नियोजन प्रक्रिया के दिशा-निर्देशन के लिए प्रबंधन नियमावली न होने से विभिन्न परियोजनाएं ठीक से क्रियान्वित नहीं की जा सकीं। सीएजी ने यूपीपीटीसीएल को अपना कोष प्रबंधन और मॉनिटरिंग तंत्र मजबूत करने का सुझाव देते हुए कहा कि उसकी अपनी आंतरिक लेखापरीक्षा विंग भी होनी चाहिए।
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सीएजी ने लखनऊ के 132 केवी जीआई उपकेंद्र हनुमान सेतु तथा 400 केवी जीआई उपकेंद्र हरदोई रोड, वाराणसी के 220 केवी उपकेंद्र भेलूपुर तथा तमाम लाइनों के अपूर्ण निर्माण का हवाला देते हुए कहा है कि यूपीपीटीसीएल ज्यादातर परियोजनाओं को समय पर क्रियान्वित करने में असफल रही। 2013-14 से 2016-17 के बीच 402 उपकेंद्रों के निर्माण व क्षमता वृद्धि होनी थी। इनमें से 165 के निर्माण व क्षमता वृद्धि में एक से 37 महीने का विलंब हुआ।
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यूपीपीटीसीएल के पास लंबे समय तक लटकी परियोजनाओं के निर्माण के औचित्य की समीक्षा के लिए कोई तंत्र नहीं था। अनुबंधों और उनके क्रियान्वयन में भी कमियां रहीं। इससे कॉर्पोरेशन को अतिरिक्त खर्च करना पड़ा और उसे 431.71 करोड़ ब्याज की हानि हुई। साथ ही 750.69 करोड़ अटके रहे। कुछ कार्यों की अनुमानित लागत की संपूर्ण राशि प्राप्त किए बिना कार्य करने तथा विद्युत मंत्रालय भारत सरकार द्वारा परियोजनाओं की पावर सिस्टम डवलपमेंट फंड योजना में स्वीकृति से पूर्व आशय पत्र जारी करने के गलत कोष प्रबंधन से 69.21 करोड़ की हानि हुई और 94.14 करोड़ का फंड अटका रहा।

सीएजी ने कहा है कि यूपीपीटीसीएल ने न तो क्रय नीति और न क्रय नियमावली बनाई। न ही परियोजना के क्रियान्वयन में खरीद-फरोख के लिए तंत्र ही बनाया। वस्तुओं व सेवाओं के  क्रय करने की तदर्थ प्रणाली से 36.91 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च हुए और 24.75 करोड़ रुपये फंसे रहे। यही नहीं पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लि. के साथ किए गए अनुबंध में कमियों के कारण यूपीपीटीसीएल पीजीसीआईएल द्वारा कराए जाने वाले 2456 करोड़ रुपये के कार्यों में 12 से 64 सप्ताह तक विलंब होने के बावजूद 215.85 करोड़ रुपये हर्जाना की कटौती नहीं की जा सकी। सीएजी ने ठेकेदारों द्वारा सामग्रियों के गबन तथा बिना सामग्री प्राप्त हुए विद्युत ट्रांसमिशन खंड बांदा द्वारा ठेकेदार को भुगतान किए जाने पर भी सवाल उठाए हैं।

मध्यांचल विद्युत वितरण निगम को 3.26 करोड़ रुपये राजस्व की चपत
मध्यांचल विद्युत वितरण निगम के विद्युत वितरण खंड बलरामपुर में एक उपभोक्ता को गलत बिलिंग के कारण 3.26 करोड़ के राजस्व की चपत लगी है। सीएजी रिपोर्ट के अनुसार उपभोक्ता का 2500 केवीए का भार था और उसे 132 केवी उपकेंद्र बलरामपुर के स्वतंत्र फीडर से आपूर्ति होती थी। उपभोक्ता के परिसर में कोई मीटर नहीं लगा था। वितरण खंड 132 केवी उपकेंद्र पर लगे मीटर में अंकित उपभोग व अनुबंधित मांग के आधार पर बिल तैयार कर रहा था।


लेखा परीक्षा में पाया गया कि जनवरी 2015 से सितंबर 2018 की अवधि में गलत बिल बनाने से 7.37 करोड़ की हानि हुई। इसमें से 4.11 करोड़ रुपये का बिल ही सत्यापित हो सका। 3.26 करोड़ रुपये के कम सत्यापन के संबंध में प्रबंधन ने सीएजी को भेजे गए उत्तर में बताया कि बाढ़ से उतरौला लाइन के प्रभावित होने के कारण उतरौला क्षेत्र के उपभोक्ताओं को विद्युत आपूर्ति सितंबर 2016, सितंबर 2017 तथा अक्तूबर 2018 के दौरान इस उपभोक्ता के फीडर लाइन से की गई, इसलिए इस अवधि के दौरान उपभोक्ता को न्यूनतम प्रभार का बिल दिया गया। जवाब में यह नहीं बताया गया कि 3.26 करोड़ रुपये के अंतर की क्षतिपूर्ति कैसे की गई?
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