क्या इन चुनावों में भी मोदी की साख है दांव पर?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विधान सभा की दो सीटों के उपचुनाव के रूप में भाजपा के सामने परीक्षा की एक और घड़ी आ गई है। वैसे तो उपचुनाव की अधिसूचना तीन सीटों रसड़ा (बलिया), फरेंदा (गोरखपुर) और चरखारी (महोबा) की जारी हुई थी। पर, रसड़ा के उपचुनाव पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है।
अब सिर्फ चरखारी और फरेंदा सीटों पर उपचुनाव होना है। इन दोनों सीटों के नतीजे न सिर्फ पार्टी की पकड़ व पहुंच का पैमाना बनेंगे बल्कि क्षेत्रों के सांसदों की लोकप्रियता की भी कसौटी बनेंगे।
भाजपा के लिए इन सीटों पर उपचुनाव का महत्व इसलिए भी है क्योंकि दोनों सीटें पार्टी के लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न है। चरखारी में तीसरी बार चुनाव होने जा रहा है।
भले ही इस बार उपचुनाव सपा के विधायक कप्तान सिंह की सदस्यता रद्द होने से हो रहा हो लेकिन कप्तान से पहले 2012 में यहां से उमाभारती विधायक चुनी गई थीं।
उनके लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद इस सीट पर वर्ष 2014 में हुए उपचुनाव में सपा के कप्तान सिंह ने भाजपा से यह सीट छीन ली थी। पर, कप्तान सिंह हत्या के एक मामले में सजा होने से विधानसभा की सदस्यता के अयोग्य हो गए।
लोकप्रियता को बचाने की कसौटी
जाहिर है कि भाजपा के लिए यह सीट वापस लेकर अपनी लोकप्रियता को साबित करने की कसौटी है। साथ ही यहां के नतीजे न सिर्फ इस क्षेत्र के भाजपा सांसद के कामकाज की बानगी होंगे बल्कि उमाभारती के लिए फिर परीक्षा बनेंगे।
फरेंदा सीट पर भाजपा के विधायक बजरंग बहादुर की ही सदस्यता रद्द होने से ही चुनाव हो रहा है। बजरंग इस सीट से 2012 में दूसरी बार विधायक चुने गए थे।
गोरक्षपीठ के महंत आदित्यनाथ के साथ महराजगंज के सांसद पंकज चौधरी और भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ रमापति राम त्रिपाठी के नजदीकी माने जाने वाले बजरंग की इस सीट को बचाना भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है।
खासतौर से सांसद पंकज चौधरी के लिए यहां का नतीजा काफी महत्वपूर्ण है। यहां की जीत हार उनके कामकाज पर भी लोगों की राय बताएंगे।