ब्राह्मण, ठाकुर, मुस्लिम और पिछड़ों को फिर साधने में जुटीं मायावती, संगठन खड़ा करने का काम शुरू
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कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपी विकास दुबे के बहाने पूरे ब्राह्मण समाज को कठघरे में खड़ा न करने की सरकार को नसीहत देने के बाद बसपा प्रमुख मायावती ब्राह्मण, ठाकुर, पिछड़ा और मुस्लिम समाज के लोगों को साधने में जुट गई हैं।
नई परिस्थितियों में पार्टी ने अपनी पुरानी रणनीति पर नए सिरे से पहल की है। मंडल, जिला व विधानसभा क्षेत्र स्तर पर जातिवार भाईचारा कमेटियों का गठन शुरू हो गया है। इससे साफ संकेत हैं कि प्रदेश में एक बार फिर जाति की राजनीति गर्म होने जा रही है।
वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने बिना गठबंधन चुनाव लड़ा था और अपने बलबूते सत्ता हासिल की थी। इसके पीछे अनुसूचित जातियों व जनजातियों के साथ सर्वसमाज को जोड़ने का प्रयोग माना जाता रहा है। खोई सियासी ताकत फिर से हासिल करने के लिए बसपा फिर इसी सोशल इंजीनियरिंग को जमीन पर उतारने जा रही है।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि पार्टी प्रमुख मायावती ने इसी महीने फील्ड के सांगठनिक ढांचे में बदलाव किया है। इसमें कोविड-19 महामारी के बावजूद संगठन पर ज्यादा फोकस होगा। लेकिन, सबसे अहम बात है कि पार्टी ने भाईचारा संगठन के गठन की पहल नए सिरे से शुरू की है। इसमें उच्च जातियों तथा मुस्लिम व अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों से जुड़े प्रभावशाली लोगों को मंडल स्तर पर सेक्टर संयोजक, जिला संयोजक व विधानसभा क्षेत्र स्तर पर संयोजक नियुक्त किया जा रहा है।
संख्या के आधार पर बनाया जाएगा संयोजक
अपर कास्ट में जहां जिसकी जितनी संख्या, उसी के अनुरूप ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को संयोजक बनाया जाएगा। इनके साथ एक-एक व्यक्ति अनुसूचित जाति का बतौर संयोजक होगा। इसी तरह पिछड़े व मुस्लिम समाज का भाईचारा संगठन बनेगा। इससे अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों को अपर कास्ट, पिछड़े व धार्मिक अल्पसंख्यक समाज के बीच समन्वय व विश्वास बढ़ाने में मदद मिलेगी।
त्रिस्तरीय पंचायत और विधानसभा चुनाव पर नजर
सपा सरकार के दौरान हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में बसपा ने ग्रामीण व नगरीय क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन किया था। हालांकि उस कामयाबी को वह बाद के विधानसभा व लोकसभा चुनाव में नहीं दोहरा पाई। लेकिन, पार्टी ने पंचायत चुनावों से ठीक पहले भाईचारा संगठन के जरिए जातीय समीकरण बनाने की पहल कर पहले पंचायत चुनाव और फिर विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर फोकस करना शुरू कर दिया है।
महत्वपूर्ण पदों पर भी सर्वसमाज को जिम्मेदारी का संदेश
बसपा ने ऊपर से नीचे तक महत्वपूर्ण पदों पर सभी वर्गों को भागीदारी देने की पहल की है। मसलन, यूपी में मुस्लिम समाज को ध्यान में रखते हुए पूर्व सांसद मुनकाद अली को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। बसपा विधानमंडल दल की जिम्मेदारी ओबीसी समाज से पूर्व मंत्री लालजी वर्मा को दी गई है।
ओबीसी समाज से ही पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर को राष्ट्रीय महासचिव बनाकर मुख्य सेक्टर इंचार्ज की जिम्मेदारी देकर फिर से सक्रिय किया गया है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष आरएस कुशवाहा को भी राष्ट्रीय महासचिव व सेक्टर इंचार्ज बनाया गया है। ब्राह्मण समाज से सतीशचंद्र मिश्र लंबे समय से राष्ट्रीय महासचिव व राज्यसभा में पार्टी के नेता हैं।
इसके बावजूद मायावती ने लोकसभा में पार्टी नेता की जिम्मेदारी युवा सांसद अंबेडकरनगर के रितेश पांडेय को सौंप दी है। रितेश बसपा में नए ब्राह्मण चेहरा के रूप में उभारे जा रहे हैं। उन्होंने विपरीत परिस्थिति में अंबेडकरनगर से लोकसभा चुनाव जीतकर लोगों को चौंका दिया था।
जो हाशिए पर, उन पर भी नजर
जानकार बताते हैं कि पार्टी की नजर ऐसे लोगों पर भी है जो दूसरी पार्टियों में किन्हीं वजहों से हाशिए पर हैं, लेकिन जमीनी तौर पर उनका आधार अच्छा है। यदि ऐसे लोग बसपा की रीति-नीति स्वीकार करने के लिए आगे आते हैं तो पार्टी उन्हें जोड़ेगी। ऐसे लोगों पर भी नजर है जो बसपा से पहले जुड़े रहे हैं, लेकिन किन्हीं कारणवश सक्रिय नहीं हैं। इन्हें भी सक्रिय करने का प्रयास होगा।
ऐसे तमाम लोग हैं जो बसपा की स्थिति कमजोर होने पर अपने घरों पर चुप बैठ गए लेकिन किसी दल में नहीं गए। हालांकि उन्हें तवज्जो नहीं मिलेगी जो पार्टी छोड़कर गए हैं और विरोध में बयानबाजी की है।