बसपा की असली परीक्षा अब, आसान नहीं लौटने की राह
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सत्ता में रहते 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा की ताकत घटने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, सत्ता खोने के बाद इस चुनाव में लोकसभा की सारी सीटें गंवाने तक पहुंच गया।
मतदाताओं की बढ़ती संख्या के बीच वोट बैंक में छह फीसदी से बड़ी गिरावट बसपा के लिए बड़ी चुनौती का सबब बन गई है।
लखनऊ से लेकर दिल्ली तक बदले सियासी माहौल में बसपा को खोई सियासी ताकत वापस पाना आसान नहीं रह गया है।
ताकत में इजाफा होना था, पर हुआ उलटा
वर्ष 2007 में अपने बलबूते सत्ता में आने के बाद बसपा की ताकत में इजाफा की उम्मीदें थीं लेकिन हुआ इसका उलटा।
पार्टी सुप्रीमो मायावती के सत्ता में रहते 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की किसी तरह एक सीट तो बढ़ गई लेकिन वोट शेयर घटना शुरू हो गया।
इसमें सुधार की कोई कारगर रणनीति वे नहीं बना सकीं और पांच साल की हुकूमत में साढ़े चार फीसदी से ज्यादा मत खोकर 2012 में सरकार गवां बैठीं।
विरोधियों को भांपने में नाकाम रहे बसपाई
विधानसभा चुनाव में मिली पराजय के बाद मायावती ने कहा था, सरकार में व्यस्तता की वजह से वह संगठन को ज्यादा वक्त नहीं दे पाईं।
पार्टी के बाकी लोग विरोधियों की साजिश का अंदाजा नहीं लगा सके जिससे पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।
पर अब तो उनके पास इस बहाने का भी रास्ता नहीं बचा। पिछले पूरे दो साल से वह खोई जमीन पाने की कोशिशों में लगी रहीं, पर कामयाबी नहीं मिली।
मायावती के दलित वोटों पर भाजपा ने लगाई सेंध
विश्लेषक मानते हैं कि मायावती के सामने अब आगे अपना जनाधार बढ़ाने के साथ बचे आधार को बचाने की मुश्किल चुनौती है।
वजह, भाजपा अपने सफलतम दौर में है। मायावती लाख इन्कार करें, भाजपा ने प्रदेश में जबर्दस्त प्रदर्शन कर न सिर्फ अगड़ों और पिछड़ों का जोरदार समर्थन हासिल किया है बल्कि दलित वोटों में जबर्दस्त सेंध लगाई है।
केंद्र में मजबूत सरकार के चलते वह इस वर्ग को अपनी ओर और तेजी से जोड़ने की हैसियत में होगी।
पर्दे के पीछे आरएसएस जैसा जमीनी संगठन दलितों को जोड़ने में पूरी ताकत से जुटा हुआ है।
चुनौतियां कम नहीं
बसपा के सामने दूसरी चुनौती सूबे की सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी होगी।
सरकार में होने के नाते सपा को अपनी खिसकी जमीन पाने के लिए नई नीतियां लाने और उसे ज्यादा आसान तरीके से जनता तक पहुंचाने का मौका होगा।
लेकिन 2009, 2012 और अब 2014 के चुनावों में सियासी रूप से कमजोर होती मायावती को अगले विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी की बिगड़ी बिसात को दुरुस्त करना किसी चुनौती से कम नहीं होगा।
इस बीच कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखना भी बहुत अहम होगा।