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थ्री-डी प्रिंटिग से ठीक कर दी आंख की टूटी हड्डी, देश की पहली सर्जरी होने का दावा
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
Updated Fri, 02 Jun 2017 03:35 PM IST
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कंप्यूटराइज्ड तकनीक से बनाया गया थ्री-डी इंंप्लांट
- फोटो : amar ujala
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केजीएमयू के मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग की सर्जन प्रो. दिव्या मेहरोत्रा और उनकी टीम ने कम्प्यूटराइज्ड थ्री-डी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए 29 वर्षीय युवक की विकृत आंख की हड्डी को ठीक कर दिया।
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उन्होंने दावा किया है कि इस तकनीक से देश में पहली बार सर्जरी की गई है। इससे आंख को सही आकार मिल गया और सफलता की दर कई गुना बढ़ गई।
आगरा निवासी सचिन (29) की डेढ़ साल पहले सड़क दुर्घटना में बायीं आंख को सुरक्षित रखने वाली हड्डी और जबड़ा क्षतिग्रस्त हो गया था।
हेलमेट न पहने होने की वजह से हड्डी तीन जगह से टूट गई थी। निजी अस्पताल में फर्स्ट एड देने के बाद उसे ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) दिल्ली भेज दिया गया। वहां उसका डॉक्टरों ने जबड़े का इलाज तो किया लेकिन आंख के चारों तरफ की हड्डी को ठीक नहीं किया गया।
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जब मरीज की पट्टी खुली तो उसे कुछ भी सही से नहीं दिखाई देता था। हर इमेज उसे दो दिखाई देती थीं। कई अस्पतालों में जांच हुई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि आंख को सुरक्षित रखने वाले चेहरे हड्डियां टूटने से ही उसे देखने में दिक्कत हो रही थी। ‘सॉकेट’ एरिया सुरक्षित न होने के कारण आंख एक तरफ दबी रहती थी। इससे आंख पूरी तरह इधर-उधर घूमती भी नहीं थी।
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डेढ़ महीने पहले पहुंचा था केजीएमयू
मरीज सचिन
- फोटो : amar ujala
कई अस्पतालों में भटकने के बाद युवक आगरा से केजीएमयू के मैक्सिलोफेशियल विभाग पहुंचा। वहां ओपीडी में प्रो. दिव्या मेहरोत्रा ने उसे देखा। थ्री-डी सीटी स्कैन जांच में पता चला कि सॉकेट की तीन तरफ की हड्डी टूट हुई है।
उन्होंने बताया कि चेहरे या जबड़े की चोट के मामले में अधिकतर किसी जगह की हड्डी को निकालकर क्षतिग्रस्त जगह पर लगाई जाती है। लेकिन इस मामले मेें आंख के आसपास का क्षेत्र होने के कारण ऐसा नहीं किया जा सकता था।
यही नहीं इसमें आर्टीफिशियल बोन या हड्डी के चूरे का इस्तेमाल भी नहीं हो सकता था, क्योंकि 10 से 15 साल में मरीज को दोबारा दिक्कत हो जाती है। इसलिए इस केस में थ्री-डी प्रिंटर से वर्चुअल इम्प्लांट डिजाइन करने की योजना बनाई गई।
इसके लिए फ्रैक्चर वाली हड्डी के ठीक ऊपर वाली हड्डी की वर्चुअल इमेज तैयार की गई। इसके बाद 3-डी तकनीक टाइटेनियम के इंप्लांट प्रिंट कराए गए। दो दिन पहले इस इम्प्लांट को सर्जरी कर लगा दिया गया। इस तकनीक से इम्प्लांट लगाने के बाद अब युवक को फिर से सही से दिखायी देने लगा है।
उन्होंने बताया कि चेहरे या जबड़े की चोट के मामले में अधिकतर किसी जगह की हड्डी को निकालकर क्षतिग्रस्त जगह पर लगाई जाती है। लेकिन इस मामले मेें आंख के आसपास का क्षेत्र होने के कारण ऐसा नहीं किया जा सकता था।
यही नहीं इसमें आर्टीफिशियल बोन या हड्डी के चूरे का इस्तेमाल भी नहीं हो सकता था, क्योंकि 10 से 15 साल में मरीज को दोबारा दिक्कत हो जाती है। इसलिए इस केस में थ्री-डी प्रिंटर से वर्चुअल इम्प्लांट डिजाइन करने की योजना बनाई गई।
इसके लिए फ्रैक्चर वाली हड्डी के ठीक ऊपर वाली हड्डी की वर्चुअल इमेज तैयार की गई। इसके बाद 3-डी तकनीक टाइटेनियम के इंप्लांट प्रिंट कराए गए। दो दिन पहले इस इम्प्लांट को सर्जरी कर लगा दिया गया। इस तकनीक से इम्प्लांट लगाने के बाद अब युवक को फिर से सही से दिखायी देने लगा है।
जानें, क्या हुआ फायदा
प्रो. दिव्या मेहरोत्रा
- फोटो : amar ujala
सर्जरी में शामिल टीम
प्रो. दिव्या मेहरोत्रा, डॉ. संजय कुमार, डॉ. पवन गोयल, डॉ. यू विग्नेश, डॉ. जगदीश, डॉ. प्रवीण, डॉ. स्नेहा, एनेस्थेटिस्ट डॉ. सतीश धसमान
क्या फायदा हुआ
चेहरा पहले की तरह सही हो गया।
कम समय में सर्जरी से अच्छी सफलता
इलाज में आया कम खर्च
‘ देश के किसी भी चिकित्सा संस्थान में इस तकनीक से सर्जरी नहीं की गई। केजीएमयू के मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग ने इस तकनीक का पहली बार इस्तेमाल किया है।’ - प्रो. दिव्या मेहरोत्रा
प्रो. दिव्या मेहरोत्रा, डॉ. संजय कुमार, डॉ. पवन गोयल, डॉ. यू विग्नेश, डॉ. जगदीश, डॉ. प्रवीण, डॉ. स्नेहा, एनेस्थेटिस्ट डॉ. सतीश धसमान
क्या फायदा हुआ
चेहरा पहले की तरह सही हो गया।
कम समय में सर्जरी से अच्छी सफलता
इलाज में आया कम खर्च
‘ देश के किसी भी चिकित्सा संस्थान में इस तकनीक से सर्जरी नहीं की गई। केजीएमयू के मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग ने इस तकनीक का पहली बार इस्तेमाल किया है।’ - प्रो. दिव्या मेहरोत्रा