यूपी में ब्राह्मण वोट के लिए बेचैन सियासी दल, जानें- किसे मिलेगा 'आशीर्वाद'
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पिछले कुछ महीनों के दौरान भाजपा, बसपा, सपा और कांग्रेस की रणनीतियों से अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि चुनाव में ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने को लेकर सियासी दल किस कदर बेचैन हैं।
चुनाव नजदीक आते-आते जमीन पर और भी मुखर होने की संभावना है। विश्लेषकों की मानें तो बसपा और सपा को बारी-बारी से आजमा चुका यह वर्ग इस बार अन्य विकल्प पर पूरी गंभीरता से विचार कर रहा है।
जानकार बताते हैं कि प्रदेश में ब्राह्मण संख्या के लिहाज से दलित, मुस्लिम और यादव से कम हैं। सूबे की आबादी में करीब 10 फीसदी हिस्सेदारी वाले ब्राह्मणों की प्रदेश के मध्य व पूर्वांचल के करीब 29 जिलों में अहम भूमिका मानी जाती है, लेकिन इनका प्रभाव वहां भी महसूस होता है जहां ये कम तादाद में होते हैं।
राजनीतिशास्त्री प्रो. एसके द्विवेदी कहते हैं कि ब्राह्मण एक प्रबुद्ध वर्ग माना जाता है। विभिन्न कारकों की वजह से समाज में अभी भी उसका सम्मान होता है।
सोच विचार कर वोट करता है ये वर्ग
द्विवेदी एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताते हैं कि ब्राह्मण अभी भी सोसाइटी के विभिन्न वर्गों को प्रभावित करने में सफल होते हैं। इसके अलावा जातीय दृष्टि इनके दिमाग में बहुत काम नहीं करता है। ये सोच-विचार कर वोट देने वाले होते हैं।
लोगों ने ब्राह्मणों को बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को स्वीकार करते हुए देखा है। इस सोशल इंजीनियरिंग के पहले बसपा का ब्राह्मणों के प्रति व्यवहार जगजाहिर रहा है। लेकिन ब्राह्मणों ने जब देखा कि बसपा की सोशल इंजीनियरिंग से उन्हें सम्मान तक हासिल नहीं हुआ तो उन्होंने रास्ता बदलने में देर नहीं की।
अब मौजूदा सपा सरकार के अनुभव भी उनके सामने है। अगले चुनाव के लिए अब ये फिर अपनी भूमिका पर गौर कर रहे हैं। चूंकि ये समय और परिस्थिति पर सोच-विचार कर निर्णय करते हैं लिहाजा सभी राजनीतिक दल अपनी रणनीति बनाने में इन्हें ध्यान में रखते हैं।
पश्चिमी यूपी में नहीं, पूर्वांचल में है महत्व
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के राजनीतिशास्त्र विभाग के प्रोफेसर डा. संजीव शर्मा कहते हैं कि पश्चिमी यूपी में इस वर्ग की भूमिका बहुत मायने नहीं रखती है। इनका अधिक प्रभाव पूर्वांचल में नजर आता है।
मध्य यूपी व पूर्वांचल में पश्चिम की अपेक्षा ब्राह्मणों का घनत्व अधिक है। इसके अलावा वहां ब्राह्मणों के पास जमीदारीं भी रही है। इसके अलावा यह समझना भी अहम है कि इनके वोट का व्यवहार भी अन्य लोगों की अपेक्षा सबसे अलग है।
ये पहले कांग्रेस के साथ रहते थे। बाद में अलग-अलग पार्टियों के साथ गए। बीएसपी से उसका मोहभंग हो चुका है। कांग्रेस विकल्प नहीं है और सपा से किसी कारण से जुड़ नहीं पा रहा है। ऐसी परिस्थितियों में ब्राह्मण मन बना रहा है कि उसे कहां जाना है?
'स्थान, सम्मान और पहचान की चाहत के साथ मन बदलते रहते हैं ब्राह्मण'
पूर्वांचल की सियासत पर गहरी नजर रखने वाले गोरखपुर विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र विभाग के अवकाश प्राप्त आचार्य श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी कहते हैं कि किसी भी दल को यह खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए कि ब्राह्मण वर्ग उनका वोट बैंक है। यह विचारशील वर्ग माना जाता है और दूसरों को प्रभावित करने में सक्षम होता है। ये ‘डिसाइडिंग शिफ्टिंग’ वोट है। जिसके साथ जाता है, उसकी सरकार बनती है।
इस चुनाव के संदर्भ में यह ध्यान रखने वाली बात है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का ज्ञान और बयान, दोनों ही लोगों को आकर्षित नहीं कर पा रहा है। थोड़ा बेहतर होता तो उनकी बात बन सकती थी। फिलहाल कांग्रेस सूबे में कोई खास प्रभाव छोड़ती नजर नहीं आ रही है।
दूसरा, बसपा ने 2007 में ब्राह्मणों को स्थान तो दिया लेकिन सम्मान व पहचान नहीं दी। बीते पांच साल में सपा की सरकार में सवर्णों की पूरी तरह से उपेक्षा की गई। ऐसे में सवर्ण खासकर ब्राह्मण वर्ग यह देख रहा है कि स्थान के साथ सम्मान व पहचान की गारंटी कौन देता है। आजकल ये तीनों चीजें राजनीतिक सत्ता से मिलती हैं। जो ठोस आश्वासन देगा, यह वर्ग उसी ओर जाएगा। फिलहाल उसका झुकाव भाजपा की ओर नजर आ रहा है।
पर, बसपा ने ब्राह्मणों को ठीक संख्या में टिकट देकर स्थान देने का संदेश फिर दे दिया है। लेकिन सम्मान और पहचान को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। भाजपा ने इस वर्ग को साधने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है। टिकट वितरण और एजेंडे से उसका रवैया भी साफ हो जाएगा। इसके बाद ही ब्राह्मण मुखर व्यवहार महसूस किया जा सकेगा।
ये है भाजपा व सपा की रणनीति
2017 के विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि ही है कि भाजपा ने अर्से से हाशिए पर रहे पूर्वांचल के वरिष्ठ पार्टी नेता शिव प्रताप शुक्ल को राज्यसभा में भेजा। कलराज मिश्र और महेश शर्मा के अलावा महेंद्र नाथ पांडेय के रूप में एक और ब्राह्मण सांसद को केंद्रीय कैबिनेट में शामिल किया।
बसपा में ब्राह्मण जोड़ो मुहिम में सालों से अहम भूमिका अदा कर रहे पूर्व सांसद बृजेश पाठक को भाजपा में शामिल किया। कांग्रेस का ब्राह्मण चेहरा रहीं डॉ. रीता बहुगुणा जोशी को भी भाजपा में ले आया गया।
दूसरे दलों के कई ब्राह्मण विधायकों को भी भाजपा में जॉइन कराने को तवज्जो दी गई। युवा मोर्चा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी ब्राह्मण चेहरे के रूप में कन्नौज से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके सुब्रत पाठक को सौंपी।
समाजवादी पार्टी
पार्टी की अंदरूनी खींचतान और अन्य दूसरी वजहों से प्रदेश कैबिनेट से एक-एक कर कई ब्राह्मण मंत्रियों को बाहर किया था। इनमें शिवाकांत ओझा, तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय और मनोज पांडेय शामिल थे।
मगर, चुनाव नजदीक आया तो न सिर्फ शिवाकांत, पवन और मनोज की मंत्रिमंडल में फिर से वापसी हुई बल्कि शारदा प्रसाद शुक्ला के रूप में एक नए मंत्री को बढ़ाया। साथ ही शुरुआत से ही राज्यमंत्री के रूप में काम कर रहे अभिषेक मिश्र को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया।
बसपा ने फिर दिखाया सोशल इंजीनियरिंग पर भरोसा
पिछले विधानसभा चुनाव के बाद खुलेआम अपरकास्ट (ब्राह्मण-ठाकुर) का समर्थन न मिलने की बात कहने के बावजूद बसपा ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग इस बार भी जारी रखी। पार्टी ने पिछले बार से आठ सीट कम सही लेकिन ब्राह्मण वर्ग को 66 सीटों पर प्रत्याशी बनाया है।
2012 के चुनाव में बसपा ने 74 ब्राह्मण प्रत्याशी उतारे थे। बसपा में राष्ट्रीय महासचिव के पद पर ब्राह्मण चेहरे के रूप में सतीश चंद्र मिश्र बने हुए हैं और बसपा सुप्रीमो मायावती के सबसे नजदीक जो लोग नजर आते हैं, उनमें सबसे पहले मिश्र ही होते हैं।
कांग्रेस ने नए प्रयोग के साथ दी दस्तक
सूबे को कई ब्राह्मण मुख्यमंत्री देने वाली कांग्रेस पिछले 27 साल से प्रदेश में सियासी ताकत के लिए छटपटा रही है। पार्टी ने इस विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए नए प्रयोग के साथ दस्तक दी।
अर्से बाद कांग्रेस ने प्रदेश में मुख्यमंत्री कैंडीडेट घोषित किया और दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित उसकी चेहरा हुईं। बुजुर्ग शीला दीक्षित को पार्टी ने सिर्फ इसलिए आगे किया क्योंकि वह सूबे के ब्राह्मण परिवार में ब्याही गईं और प्रदेश की सियासत में वह पहले से जानी-पहचानी हैं।
विधानसभा चुनावों में ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व
पार्टी का नाम--1993--1996--2002--2007--2012
भाजपा--17--14--08--03--06
बसपा--00--02--04--41--10
सपा--02--03--10--11--21
कांग्रेस--05--04--01--02--03
अन्य--02--02--02--01--01
योग--24--25--25--58--41