रिपोर्ट में संक्रमित मिला छापेमारी में जब्त खून, चढ़ाने पर चली जाती मरीज की जान
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एसटीएफ और खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) की ओर से पकड़ा गया खून मिलावटी होने के साथ संक्रमित भी था। यह किसी मरीज को चढ़ाया जाता तो उसकी जान चली जाती। वहीं, किसी बैग में कम तो किसी में ज्यादा खून निकला। इतना ही नहीं ब्लड बैग पर एक्सपायरी डेट भी नहीं लिखी गई थी। यह खुलासा एसजीपीजीआई की जांच रिपोर्ट में हुआ है। एफएसडीए विभाग ने सोमवार को रिपोर्ट एसटीएफ को भेज दी है।
25 अक्तूबर को छापेमारी कर गिरफ्तार किए गए पांच लोगों के पास से छह यूनिट ब्लड, भारी मात्रा में ब्लड बैग, सोडियम क्लोराइड इंजेक्शन, प्लेटलेट्स बैग बरामद हुए थे। पकड़े गए लोगों ने खून में मिलावट करने की बात स्वीकार की थी। इसमें तीन लोगों के यहां से दो-दो यूनिट ब्लड मिले थे, जो घर के फ्रिज में रखे थे। इसमें एक मेडिसन ब्लड बैंक का तो दूसरा बीएनके ब्लड बैंक का कर्मचारी था। सभी छह यूनिट खून जांच के लिए एसजीपीजीआई के ट्रांसफ्यूजन विभाग की लैब भेजा गया था।
सूत्रों की मानें तो नसीम के घर में मिले खून में कोई तरल पदार्थ मिलाने की बात सामने आई है। हालांकि उसने सलाइन वाटर मिलाने की बात स्वीकार की थी। रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई कि एक ब्लड बैग में 350 के बजाय 400 एमएल खून था, जबकि दूसरे में 300 एमएल था। इससे स्पष्ट है कि खून के कारोबारी पेशेवर रक्तदाताओं का ब्लड निकालते समय मानक का ध्यान नहीं रखते थे।
निर्धारित मात्रा से ज्यादा खून निकाला जाता था और उसमें कुछ चीजें मिलाकर दो बैग खून तैयार कर लेते थे। इस खून में संक्रमण भी पाया गया है। इसी तरह बीएनके ब्लड बैंक के कर्मचारी रहे राघवेंद्र सिंह के घर मिले खून में संक्रमण पाया गया। इसकी कल्चर जांच रिपोर्ट पॉजिटिव लिखी गई है। स्पष्ट है कि इसमें बैक्टीरिया थे। पैकेट पर एक्सपायरी डेट, बैच नंबर आदि भी नहीं लिखा गया था। ऐसे में आशंका है कि खून काफी पुराना था और मिलावट की वजह से संक्रमित हो गया था। इतना ही नहीं एक ब्लड बैग में मिला खून जम गया था।
इसमें भी केमिकल जैसा कुछ मिलाने की बात कही गई है। यह खून भी किसी को चढ़ाने लायक नहीं पाया गया। जांच में यह बात भी सामने आई कि सभी खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा आठ के आस-पास थी। इससे स्पष्ट है कि खून के कारोबारी एनिमिक लोगों का खून निकालते थे। इससे इस बात को भी बल मिलता है कि वे जिन लोगों से खून लेते थे, वे पेशेवर थे और निर्धारित तीन माह की अवधि के अंदर ही दोबारा ब्लड देते रहे। इस वजह से हीमोग्लोबिन की मात्रा कम पाई गई है। दूसरी बात यह भी है कि जिनसे यह खून लिया गया, वे बीमार रहे होंगे।
एक्सपायरी डेट और न ही बैच नंबर
नियमानुसार हर ब्लड बैग पर बैच नंबर, एक्सपायर होने की तिथि, ब्लड निकालने की तिथि आदि का पूरा ब्यौरा होता है। लेकिन छह में से चार बैग पर ये जानकारियां नहीं थीं।
जल्द होगी आगे की कार्रवाई
एसजीपीजीआई की जांच रिपोर्ट एसटीएफ को सौंप दी गई है। मामले की विवेचना एसटीएफ की टीम कर रही है। अब वह जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगी। विभाग की ओर से जल्द ही इसमें ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट के तहत भी कार्रवाई की जाएगी।
- रमाशंकर, निरीक्षक औषधि प्रशासन
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
मिलावटी ब्लड से मरीज की जान जा सकती है। यदि किसी तरह जान बच भी गई तो किडनी, लीवर, हार्ट सहित कई बीमारियां हो सकती हैं। सबसे ज्यादा खतरा सेप्टीसीमिया का होता है। यही वजह है कि किसी भी मरीज को खून देने से पहले उसकी विधिवत जांच की जा जाती है। मिलावटी अथवा संक्रमित खून से मरीज का हिमोग्लोबिन बढने के बजाय तेजी से गिरने लगता है। यदि पकड़े गए खून की कल्चर रिपोर्ट पाजीटिव आई है तो वह खून परी तरह से संक्रमित है। उसे किसी मरीज को चढ़ाया नहीं जा सकता है।
- डा. तुलिका चंद्रा, विभागाध्यक्ष ट्रांसफ्यूजन विभाग केजीएमयू