'राम' लगे किनारे, मोदी लहर में बह गया मंदिर!
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एक जमाना था जब भाजपा ने राम मंदिर होते हुए सत्ता के गलियारे में पहुंची थी, अब मोदी लहर ने इस जरूरत को भी खत्म सा कर दिया है। यूपीए सरकार के खिलाफ नाराजगी से उपजी मोदी लहर में बड़े-बड़े दरख्त उखड़ गए।
वस्तुत: मोदी की लहर ने वह कर दिखाया जो राम मंदिर आंदोलन के दौरान भी संभव नही हो सकता था। उन सीटों पर भी भगवा लहराया जहां भाजपा पहले कभी नहीं जीत सकी थी।
संसदीय चुनावों के इतिहास में कई बार लहरों ने कमाल दिखाया है। 1977 की लहर आपातकाल विरोधी लहर के रूप में जानी जाती है।
इस लहर का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि इसने देश में पहली बार गैर कांग्रेसी गठबंधन को सत्ता दिलाई।
जनता पार्टी ने जीती सभी 85 सीटें
आपातकाल विरोधी लहर में इंदिरा गांधी, संजय गांधी और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे कांग्रेसी दिग्गजों को करारी शिकस्त मिली।
भारतीय लोकदल (जनता पार्टी) यूपी की सभी 85 सीटों पर चुनाव जीत गई। चंद्रशेखर, डॉ. मुरली मनोहर जोशी और जनेश्वर मिश्र जैसे दिग्गज पहली बार लोकसभा पहुंचे।
हालांकि इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जेपी लहर पर सवार कांग्रेस विरोधी दल इसे बरकरार न रख सके। नतीजतन लगभग ढाई साल बाद ही 1980 में फिर चुनाव हुए।
कांग्रेस को काफी समर्थन मिला और उसने यूपी की 85 में से 51 सीटें जीतकर सरकार में वापसी की।
सहानुभूति की लहर
वर्ष 1980 में जनता पार्टी के प्रति लोगों की नाराजगी से सत्ता में वापसी करने वाली कांग्रेस को 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर का लाभ मिला।
कांग्रेस ने प्रदेश की 85 में 83 सीटों पर जीत दर्ज की थी। राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी। शेष दो सीटों पर लोकदल को सफलता मिली थी। अन्य किसी भी दल का खाता नहीं खुला।
बोफोर्स घोटाले के खिलाफ लहर
राजीव गांधी सरकार कार्यकाल पूरा करते-करते बोफोर्स तोप घोटाला में फंस गई। कांग्रेस के ही विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस घोटाला की बात उठाकर भ्रष्टाचार विरोधी लहर का नेतृत्व संभाल लिया।
चुनाव में संयुक्त मोर्चा को यूपी में 54 सीटें मिलीं। मोर्चे की समर्थक भाजपा को आठ सीटें मिलीं। कांग्रेस के हिस्से में 15 सीटें आईं।
वीपी सिंह के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा सरकार बनी, पर इस लहर से मिली ताकत को भी संयुक्त मोर्चा सहेजकर नहीं रख पाया।
अयोध्या राम मिंदर आंदोलन को लेकर भाजपा व संयुक्त मोर्चा के अन्य घटकों में ठन गई। मंदिर लहर को रोकने के लिए वीपी सिंह ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू कर दी।
भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया। कांग्रेस ने खेल खेला और समर्थन देकर चंद्रशेखर के नेतृत्व में सरकार बनवा दी। हालांकि यह सरकार भी नहीं टिक पाई।
मंडल बनाम कमंडल
1991 में लोकसभा के चुनाव मंदिर बनाम कमंडल की लहर पर हुए। भाजपा को 51 सीटों पर जीत मिली।
जनता दल ने 22 और जनता पार्टी ने चार सीटें जीतीं। कांग्रेस को सिर्फ पांच सीटों पर जीत मिली।
भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ से पहली बार चुनाव जीते। हालांकि कांग्रेस यूपी में बड़ी संख्या में सीटें गंवाने के बावजूद केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब रही।
अटल की लहर की भी रही धमक
भाजपा ने 1996 के चुनाव में ‘सबको देखा बार-बार, हमको देखो एक बार’ का नारा दिया। भाजपा सूबे की 52 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी।
केंद्र में सरकार बनी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। यह सरकार 13 दिन ही चल पाई। एक वोट से गिर गई। इसके बाद तरह-तरह के प्रयोग हुए, लेकिन कोई भी सरकार टिक नहीं पाई।
1998 में फिर चुनाव हुए। भाजपा ने ‘अबकी बारी अटल बिहारी’ का नारा दिया। इसकी बदौलत भाजपा को यूपी में 57 सीटों पर जीत मिली। हालांकि यह सरकार भी 13 महीने ही चली।
अबकी बार मोदी सरकार
भाजपा ने इस दफा अबकी बार मोदी सरकार का नारा दिया। मोदी को आगे करके भाजपा ने महंगाई, भ्रष्टाचार, देश की आंतरिक व बाह्य सुरक्षा व तुष्टीकरण को मुद्दा बनाने की कोशिश की।
कांग्रेस सरकार के फैसलों से नाराज लोगों को मोदी से उम्मीदें दिखीं। भाजपा के रणनीतिकारों ने इसे और धार दी और लहर पैदा करने में कामयाब रहे। नतीजतन भाजपा का परचम लहराया।
इस तरह बनती है लहर
राजनीतिक हालात और नेताओं के व्यक्तित्व के कारण चुनावी लहरें बनती हैं।
उदाहरण के लिए 1971 में बांग्लादेश को अलग देश बनवाकर और सिंडिकेट के नेताओं को ठिकाने लगाने के बाद इंदिरा ऐसी छवि में दिखीं तो उनकी लहर बन गई।
1977 में जेपी के आंदोलन से लोगों को कांग्रेस का विकल्प दिखा तो आपातकाल विरोधी लहर बनी। इस चुनाव में मोदी से जनता को अपनी उम्मीदें पूरी होती दिखीं तो उनके नाम की लहर बन गई।
-डॉ. एसके द्विवेदी
पूर्व अध्यक्ष, राजनीति शास्त्र विभाग, लखनऊ विवि