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जीत के बावजूद जमीनी हकीकत समझेगी भाजपा, हर सीट की समीक्षा की तैयारी
Mon, 28 Oct 2019 11:10 AM IST
Amulya Rastogi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Mon, 28 Oct 2019 11:10 AM IST
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जश्न मनाते भाजपा समर्थक
- फोटो : PTI
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विधानसभा की 11 सीटों के उपचुनाव में सबसे ज्यादा आठ सीटें जीतने के बावजूद भाजपा के रणनीतिकार संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने जमीनी हकीकत का आकलन करने का फैसला किया है।
पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह और महामंत्री संगठन सुनील बंसल उपचुनाव के नतीजे आने के तुरंत बाद ही अपने स्तर से उन कारणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं, जिनकी वजह से मतदान का प्रतिशत कम रहा। दिवाली बाद इन सीटों के लिए तय किए गए प्रभारी पदाधिकारियों और मंत्रियों से बातचीत करके उन वजहों को समझने की कोशिश होगी, जिनके चलते मतदान का प्रतिशत भी कम रहा और भाजपा के हाथ से एक सीट निकल गई।
सूत्रों के अनुसार, रणनीतिकारों की असली चिंता इन चुनाव में हाथ से एक सीट निकल जाना नहीं बल्कि आगे होने वाले चुनाव हैं। अगले साल न सिर्फ विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक सीटों के चुनाव होने हैं बल्कि पंचायतों के चुनाव भी प्रस्तावित हैं। जिनमें भाजपा के लिए स्थानीय स्तर पर समीकरण ज्यादा जटिल माने जाते हैं।
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ऐसे में यदि जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं से कहीं कोई लापरवाही हुई तो पार्टी की स्नातक व शिक्षक तथा पंचायत चुनाव में भी परचम फहराने का लक्ष्य कठिन हो जाएगा। इसीलिए रणनीतिकार इन चुनावों का बिगुल बजने से पहले ही जमीन पर काम करने वाली सेना को नए सिरे से तैयार कर लेना चाहते हैं। साथ ही उन खामियों को दूर कर लेना चाहते हैं, जिनके कारण कुछ सीटों पर काफी कम अंतर से जीत दूर रह गई।
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पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह और महामंत्री संगठन सुनील बंसल उपचुनाव के नतीजे आने के तुरंत बाद ही अपने स्तर से उन कारणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं, जिनकी वजह से मतदान का प्रतिशत कम रहा। दिवाली बाद इन सीटों के लिए तय किए गए प्रभारी पदाधिकारियों और मंत्रियों से बातचीत करके उन वजहों को समझने की कोशिश होगी, जिनके चलते मतदान का प्रतिशत भी कम रहा और भाजपा के हाथ से एक सीट निकल गई।
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सूत्रों के अनुसार, रणनीतिकारों की असली चिंता इन चुनाव में हाथ से एक सीट निकल जाना नहीं बल्कि आगे होने वाले चुनाव हैं। अगले साल न सिर्फ विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक सीटों के चुनाव होने हैं बल्कि पंचायतों के चुनाव भी प्रस्तावित हैं। जिनमें भाजपा के लिए स्थानीय स्तर पर समीकरण ज्यादा जटिल माने जाते हैं।
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ऐसे में यदि जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं से कहीं कोई लापरवाही हुई तो पार्टी की स्नातक व शिक्षक तथा पंचायत चुनाव में भी परचम फहराने का लक्ष्य कठिन हो जाएगा। इसीलिए रणनीतिकार इन चुनावों का बिगुल बजने से पहले ही जमीन पर काम करने वाली सेना को नए सिरे से तैयार कर लेना चाहते हैं। साथ ही उन खामियों को दूर कर लेना चाहते हैं, जिनके कारण कुछ सीटों पर काफी कम अंतर से जीत दूर रह गई।
यह भी है वजह
दरअसल, भाजपा ने उपचुनाव को लेकर चार महीने पहले से संबंधित क्षेत्रों पर फोकस करके तैयारियां शुरू कर दी थीं। रणनीतिकारों का प्रयास था कि भाजपा गठबंधन सहित सभी नौ सीटें सुरक्षित रखते हुए रामपुर और जलालपुर पर झंडा फहरा दिया जाए।
इसके लिए न सिर्फ सभी जगह नए विकास कार्य कराने पर ध्यान केंद्रित किया गया बल्कि बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया गया। सभी जगह बूथ समितियों की हकीकत का भी नए सिरे से आकलन कर कमियों को दूर किया गया। बावजूद इसके मतदान का प्रतिशत कम रहना भाजपा रणनीतिकारों की चिंता का सबब बना है। इनका मानना है कि मतदान का प्रतिशत कम न होता तो भाजपा और बेहतर प्रदर्शन करती।
इसके लिए न सिर्फ सभी जगह नए विकास कार्य कराने पर ध्यान केंद्रित किया गया बल्कि बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया गया। सभी जगह बूथ समितियों की हकीकत का भी नए सिरे से आकलन कर कमियों को दूर किया गया। बावजूद इसके मतदान का प्रतिशत कम रहना भाजपा रणनीतिकारों की चिंता का सबब बना है। इनका मानना है कि मतदान का प्रतिशत कम न होता तो भाजपा और बेहतर प्रदर्शन करती।