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बुंदेलखंड में जातीय समीकरण से संजीवनी तलाशने की कोशिश

Sat, 12 Oct 2013 09:28 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/लखनऊ Updated Sat, 12 Oct 2013 09:28 AM IST
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bjp strategy for bundelkhand seats

बुंदेलखंड की पथरीली जमीन इस इलाके के किसानों के लिए भले ही बहुत मुश्किलों भरी रहती हो, लेकिन भगवा खेमे के लिए उम्मीद जगाने वाली है।

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बुंदेलखंड का चुनावी इतिहास, यहां के राजनीतिक व सामाजिक समीकरण भाजपा की रणनीति से मेल खाते हैं। इस समय भले ही भाजपा के लिए यहां की जमीन का अधिकांश हिस्सा बंजर बन चुका हो, लेकिन अतीत में यहां की जमीन भगवा फसल के लिए उपजाऊ रही है।
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भाजपा ने झांसी में 25 अक्तूबर को मोदी की रैली के जरिये यहां की जमीन को खाद-पानी देने के समीकरणों को साधकर इस पथरीली जमीन पर फिर से कमल खिलाने की तैयारी की है

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इसकी वजह भी है। मोदी जिस वर्ग से आते हैं। उनकी जैसी पृष्ठभूमि है और छवि बन चुकी है। वह बुंदेलखंड के हर तरह के समीकरणों पर फिट बैठती है।

उनके जरिये भाजपा बुंदेलखंड के लोगों को विकास का भरोसा दिलाना चाहती है तो यहां के समीकरणों में भारी पड़ने वाली अति पिछड़ी जातियों को लामबंद भी करना चाहती है। बुंदेलखंड की एक और खासियत भाजपा के लिए उम्मीद जगाने वाली है।

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दरअसल, इस इलाके के अधिकांश लोग धार्मिक आस्था के लिए भी जाने जाते हैं। जो भाजपा की रणनीति व मोदी की हिंदुत्ववादी छवि पर फिट बैठती है।

भाजपा के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि बुंदेलखंड के लोग कांग्रेस, सपा व बसपा की सरकारों को देख चुके हैं। इसलिए इस बार भाजपा के लिए यहां सफलता का रास्ता खुल सकता है।


हम लोगों को बता रहे सच्चाई

भाजपा के बुंदेलखंड के अध्यक्ष बाबू राम निषाद कहते हैं कि यहां के लोगों को सपा, बसपा व कांग्र्रेस ने खूब छला। वर्ष 2004 में केंद्र में आई कांग्रेस सरकार ने पांच वर्षों में बुंदेलखंड की तस्वीर बदल देने का वादा किया था। पर बदहाली कम होने के बजाय बढ़ गई।

पिछले दस वर्षों में यहां भूख से मौत व कर्ज में डूबे लोगों की आत्महत्या की संख्या पर गौर कर लिया जाए तो भाजपा विरोधी दलों के दावों की सत्यता सामने आ जाएगी। बसपा की पांच साल सरकार रही। इलाके के दो-दो प्रमुख नेता प्रभावी भूमिका में रहे।

पर, बुंदेलखंड के लिए कुछ नहीं हुआ। लोगों ने उम्मीद में सपा को जिताया, लेकिन बदहाली दूर करने के लिए अभी तक सरकार की तरफ से कोई गंभीर पहले होती नहीं दिखी। भाजपा भी लोगों को इन दलों की असलियत दिखा रही है।


इस समय यह है स्थिति

कभी बुंदेलखंड से भाजपा के खाते में चार-चार सांसद और 13-13 विधायक आते रहे हैं। पर, इस समय बुंदेलखंड में आने वाली लोकसभा की बांदा, हमीरपुर, जालौन व झांसी में कोई सीट भाजपा के कब्जे में नहीं है। विधानसभा की 19 सीटें हैं।



इनमें सबसे ज्यादा सात विधायक सपा के खाते के हैं। कांग्रेस के पास चार और बसपा के पास पांच सीटें हैं। भाजपा के पास विधानसभा की तीन सीटें ही हैं। लोकसभा की चार सीटों में सपा के पास दो और कांग्रेस तथा बसपा के पास एक-एक सीट है।

इससे पहले लोकसभा की सभी चारों सीटें भाजपा के पास रह चुकी हैं। वह भी कई-कई बार। भाजपा की कोशिश है कि ऊसर हो चुकी इस जमीन को फिर खाद-पानी देकर कमल खिलने लायक बनाया जाए।


फिट बैठते समीकरण
यहां की आर्थिक और और सामाजिक गणित भी भाजपा के लिहाज से काफी अनुकूल है। पूरे बुंदेलखंड में दो तरह के लोग हैं। संपन्न या गरीब। मुस्लिम मतदाता बहुत प्रभावी नहीं है।

समाजवादी पार्टी की गणित को मजबूत बनाने वाली दूसरी बिरादरी यादवों का भी एक-दो पट्टी छोड़कर कहीं बहुत ज्यादा वर्चस्व नहीं है। इसलिए इस पूरे इलाके में चुनावी समीकरण भाजपा, कांग्रेस, व बसपा के बीच में ही सिमट जाते हैं।

भाजपा को उम्मीद है कि मोदी व उनके साथ कल्याण सिंह व उमा भारती बुंदेलखंड की जातीय समीकरणों से भाजपा के लिए संजीवनी तलाश सकते हैं।

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