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यूपी: पंचायत चुनाव में भाजपा के रणनीतिकार हुए फेल, किसान आंदोलन से पैदा नाराजगी नहीं भांप सके

Thu, 06 May 2021 01:27 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Thu, 06 May 2021 01:27 PM IST
सार

किसान आंदोलन से ग्रामीण क्षेेत्रों के मतदाताओं में पैदा हुई नाराजगी के साथ-साथ पार्टी के सांसदों, विधायकों, पदाधिकारियों व चुनाव प्रबंधन से जुड़े लोगों परिवारीजनों के चुनाव न लड़ाने के फैसले ने भी आग में घी का काम किया। 

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BJP strategist failed in Panchayat elections, Sunil Bansal and Vijay Bahadur were in command
- फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में भाजपा के रणनीतिकार पूरी तरह फेल साबित हुए। किसान आंदोलन से ग्रामीण क्षेेत्रों के मतदाताओं में पैदा हुई नाराजगी के साथ-साथ पार्टी के सांसदों, विधायकों, पदाधिकारियों व चुनाव प्रबंधन से जुड़े लोगों परिवारीजनों के चुनाव न लड़ाने के फैसले ने भी आग में घी का काम किया। तमाम जगह परिवार वालों को टिकट न मिलने से पार्टी के असंतुष्ट नेताओं ने ही गुपचुप ढंग से विरोधियों का समर्थन कर पलीता लगाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। नतीजा सामने है। अब जिला पंचायतों में काबिज होने के लिए पार्टी के पास दूसरों का समर्थन लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।

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प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की कमान प्रदेश महामंत्री (संगठन) सुनील बंसल व प्रदेश उपाध्यक्ष तथा पंचायत चुनाव प्रभारी विजय बहादुर पाठक के हाथ में थी। चुनावी रणनीति बंसल की देखरेख में बनी थी जबकि मैनेजमेंट पाठक के जिम्मे था। दोनों ही मोर्चे पर पार्टी के मुंह की खानी पड़ी। प्रदेश में सत्ता होने के बावजूद इस चुनाव में पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
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प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह समेत कुछ अन्य नेता तो पंचायत चुनाव में सक्रिय नजर आए, लेकिन रणनीतिक कमजोरी ने इनकी मेहनत पर पानी फेर दिया। स्वतंत्रदेव समेत भाजपा के बड़े नेता भले ही चुनाव नतीजों को अपने पक्ष में और केंद्र व राज्य सरकार की नीतियों पर जनता की मुहर करार दे रहे हों लेकिन हकीकत यह है कि सत्ता से लेकर संगठन तक के लोगों की नींद उड़ गई है।

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दरअसल, किसान आंदोलन की आंच गांव-गांव पहुंचने और उसके असर को भाजपा के रणनीतिकार या तो ठीक से भांप नहीं सके या फिर इसकी गंभीरता का सही ढंग से आकलन नहीं कर सके। रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि संगठनात्मक अभियान और सरकारी कार्यक्रमों के जरिये ग्रामीण मतदाताओं को अपने पाले में खड़ा करने कामयाब होंगे लेकिन यह आकलन गलत साबित हुआ। रही-सही कसर परिवार वालों के टिकट न मिलने से नाराज सांसदों, विधायकों, पदाधिकारियों व अन्य बड़े नेताओं ने पूरी कर दी।

पंचायत चुनाव में फतह को लेकर पूरी तरह आश्वस्त रणनीतिकारों ने समय रहते न तो ग्रामीण मतदाताओं की नब्ज टटोलने की जरूरत समझी और न ही पार्टी नेताओं की नाराजगी दूर करने की पहल। तमाम जिलों में स्थानीय स्तर पर कोरोना के प्रबंधन में नाकामी ने भी भाजपा को नुकसान पहुंचाया।

इसका नतीजा यह हुआ कि परिवारीजन को टिकट नहीं मिलने से खफा पार्टी के नेताओं ने अपने करीबियों को पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ  चुनाव मैदान में उतारकर चुनाव हराया। चुनाव रणनीतिकारों ने कोरोना की वजह से कार्यकर्ताओं में फैले को असंतोष को भी नजरअंदाज कर दिया। पश्चिम में किसानों की नाराजगी को भी एक समुदाय विशेष की नाराजगी मानने की गलती कर बैठे।

चुनाव में जिस प्रकार प्रत्येक वार्ड में युवा, किसान, महिला, अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग के सम्मेलन कराने, जनसंपर्क व बूथ प्रबंधन की योजना बनाई थी, वह भी धरातल पर कामयाब नहीं रही। अलबत्ता प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह ने करीब एक महीने तक अलग-अलग जिलों का दौरा कर पंचायत चुनाव के लिए बैठकें और सम्मेलन करते रहे। विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी को पंचायत चुनाव में हुए नुकसान के लिए पार्टी के अंदर अब रणनीतिकारों को ही जिम्मेदार माना जा रहा है।

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