एससी-एसटी एक्ट पर आंदोलन से सतर्क भाजपा डैमेज कंट्रोल में जुटी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एससी-एसटी एक्ट पर आंदोलन से बन रहे माहौल से सतर्क भाजपा डैमेज कंट्रोल में जुट गई है। इस एक्ट के साथ ही प्रमोशन में आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय में केंद्र सरकार की तरफ से दायर पुनर्विचार याचिका पर हो रहे विरोध पर भी भाजपाई गांव-गांव जाकर सच्चाई बताएंगे।
भले ही गुरुवार के भारत बंद का व्यापक असर यूपी में कुछ जिलों तक सीमित रहा हो, लेकिन इससे भविष्य में भाजपा की सेहत पर असर पड़ने की आशंका को भगवा टोली ने शायद भांप लिया है।
तभी तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय ने बूथ संपर्क अभियान में लगे कार्यकर्ताओं को इस मुद्दे पर भी लोगों को अन्याय व उत्पीड़न न होने देने के लिए आश्वस्त करने का भी जिम्मा सौंपा है।
यह है वजह
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दलितों के लिए कई योजनाएं और उनके महापुरुषों को सम्मान देने जैसे काम कर चुकी भाजपा को चुनाव में इसका लाभ मिला। इसीलिए केंद्र सरकार ने एससी-एसटी एक्ट पर न्यायालय के फैसले को संशोधित कर उसे लागू किया। इसमें आरोपी की तुरंत गिरफ्तारी का प्रावधान भी जोड़ा गया।
साथ ही प्रमोशन में आरक्षण बहाल करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका भी दाखिल की। दोनों फैसलों का मकसद दलितों को और मजबूती से अपने साथ जोड़ना था। राजनीति शास्त्री प्रो. एसके द्विवेदी कहते हैं कि भाजपा के रणनीतिकार ये फैसला करते वक्त शायद 2002 और 2012 को भूल गए, जब दोनों ही मुद्दों पर भाजपा को विरोध झेलना पड़ा था।
2002 में कल्याण सिंह के मुखर विरोध के बाद भाजपा नेता कलराज मिश्र और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष विनय कटियार ने एससी-एसटी एक्ट में लोगों की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए पार्टी के सहयोग से चल रही मायावती सरकार से नाता तोड़ने का दबाव बनाया था।
वहीं, 2012 में प्रमोशन में आरक्षण मुद्दे पर राज्यसभा में लाए गए विधेयक का समर्थन करने के विरोध में प्रदेश भाजपा मुख्यालय पर एक सप्ताह प्रदर्शन हुए थे। अंतत: पार्टी को लोकसभा में संशोधन विधेयक का समर्थन करने से पीछे हटना पड़ा था।
मायावती को भी हुआ था भूल का एहसास
वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल भी कहते हैं कि 2002 में सत्ता से हटने के बाद मायावती को एहसास हुआ कि सिर्फ दलितों के आधार पर और अगड़ों व पिछड़ों के उत्पीड़न का रास्ता बनाकर वह सरकार नहीं बना सकतीं। इसलिए उन्होंने बसपा को सर्वसमाज की पार्टी बताना शुरू किया।
भाईचारा कमेटियों के सहारे अगड़ों व पिछड़ों को जोड़ा, जिसका उन्हें लाभ भी हुआ। 2007 में पूर्ण बहुमत से उनकी सरकार बनी। पता नहीं क्यों यह बात भाजपा के नेताओं के दिमाग में नहीं आई। लाल व द्विवेदी कहते हैं कि दलितों की भलाई के लिए काम से सियासी लाभ हासिल कर रही भाजपा को शायद लगा कि इन मुद्दों पर उसके फैसलों को भी लोग स्वीकार कर लेंगे, पर यहीं भूल हो गई।
ये फैसले अगड़ों व पिछड़ों को निजी तौर पर प्रभावित कर रहे हैं। इसीलिए विरोध शुरू हो गया। प्रमोशन में आरक्षण के विरोधियों ने 28 सितंबर को लखनऊ में देश भर के लोगों का सम्मेलन बुलाया है। जाहिर है, भाजपा को भविष्य में चुनौती बढ़ने का खतरा नजर आने लगा है। इसीलिए वह लोगों को मनाने की कोशिश में जुट गई है।
संपर्क अभियान में लगे कार्यकर्ता लोगों को समझाएंगे
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, डैमेज कंट्रोल प्लान के तहत प्रदेश भर में चल रहे संपर्क अभियान में पार्टी कार्यकर्ता लोगों को बताएंगे कि कुछ विदेशी ताकतें मोदी सरकार को अस्थिर करने और भाजपा को कमजोर करने के लिए सक्रिय हैं। इन ताकतों की साजिश दलित व मुस्लिम गठजोड़ बनाकर देश के ताना-बाना को नष्ट करने की है।
इसीलिए मोदी सरकार को वृहद हिंदू एकजुटता के लिए ये फैसले करने पड़े। कार्यकर्ता लोगों को आश्वस्त करेंगे कि एससी-एसटी एक्ट में झूठे मुकदमे नहीं होने दिए जाएंगे। ऐसे मुकदमे करने वालों पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि यह भविष्य बताएगा कि भाजपा इसमें कितनी सफल होती है, पर गुरुवार के आंदोलन ने निश्चित रूप से भाजपा के रणनीतिकारों को चौकन्ना किया होगा।