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लोकसभा चुनावः सपा-बसपा गठबंधन का गणित बिगाड़ने सीट की लड़ाई को बूथ में बदलेगी भाजपा
Fri, 01 Feb 2019 04:40 PM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Fri, 01 Feb 2019 04:40 PM IST
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सपा-बसपा गठबंधन की गणित की चुनौती के मद्देनजर भाजपा सीटों की लड़ाई को बूथों की लड़ाई में बदलने की कोशिश में जुटी हुई है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का बूथ अध्यक्षों के सम्मेलन शुरू करना और चुनाव प्रभारियों के जरिये प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटों को 19 सेक्टरों में बांटकर एक-एक सीट की चुनावी गणित समझने की शुरुआत इसी कोशिश का हिस्सा है।
पार्टी के रणनीतिकार सपा और बसपा गठबंधन के बाद अलग-अलग सीटों पर बन रहे चुनावी समीकरण और वोटों की गणित समझ लेना चाहते हैं। वहीं खामियों को समझकर उन्हें दूर कर लेना भी इस कोशिश का मकसद है।
लखनऊ और कानपुर में बूथ अध्यक्षों के सम्मेलनों से साफ हो गया है कि अमित शाह इन सम्मेलनों के जरिये बूथ अध्यक्षों को वे सियासी हथियार सौंप देना चाहते हैं, जिनके जरिये भाजपा बूथों पर कांग्रेस और गठबंधन की खामियां लोगों को बताकर इन दलों के योग से बन रहे समीकरणों की काट करने की कोशिश करेगी।
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साथ ही बूथ-बूथ भाजपा के पक्ष में चुनावी गणित को अनुकूल बनाने का प्रयास करेगी। इसीलिए भाजपा ने 12 फरवरी से 2 मार्च तक प्रदेश भर में ‘मेरा परिवार-भाजपा परिवार’ अभियान की योजना बनाई।
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पार्टी के रणनीतिकार सपा और बसपा गठबंधन के बाद अलग-अलग सीटों पर बन रहे चुनावी समीकरण और वोटों की गणित समझ लेना चाहते हैं। वहीं खामियों को समझकर उन्हें दूर कर लेना भी इस कोशिश का मकसद है।
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लखनऊ और कानपुर में बूथ अध्यक्षों के सम्मेलनों से साफ हो गया है कि अमित शाह इन सम्मेलनों के जरिये बूथ अध्यक्षों को वे सियासी हथियार सौंप देना चाहते हैं, जिनके जरिये भाजपा बूथों पर कांग्रेस और गठबंधन की खामियां लोगों को बताकर इन दलों के योग से बन रहे समीकरणों की काट करने की कोशिश करेगी।
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साथ ही बूथ-बूथ भाजपा के पक्ष में चुनावी गणित को अनुकूल बनाने का प्रयास करेगी। इसीलिए भाजपा ने 12 फरवरी से 2 मार्च तक प्रदेश भर में ‘मेरा परिवार-भाजपा परिवार’ अभियान की योजना बनाई।
पढें, ये है संकेत
डेमो
अमित शाह ने 2013 में उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनने के बाद बूथ प्रबंधन पर ही फोकस किया था। उन्होंने पन्ना प्रमुख और सेक्टर प्रमुख जैसे प्रयोग कर एक-एक मतदाता तक कार्यकर्ताओं तक भाजपा को पहुंचाने का प्रयास किया। जमीन पर बूथों की रणनीति पर काम हुआ तो मंचों पर भाजपा ने प्रतीकों से हिंदुत्व के एजेंडे को धार दी।
उससे साफ हो गया कि इस बार भी वह चुनावी लड़ाई को बूथों पर ही केंद्रित करना चाहते हैं ताकि विपक्ष को बूथों पर ही उलझा लिया जाए। भाजपा के चुनावी प्रबंधन से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते भी हैं कि सपा और बसपा के नेताओं ने भले ही गठबंधन कर लिया है, लेकिन बूथों पर अब भी दोनों के समर्थक मतदाताओं का रुझान अलग-अलग है। इनके कार्यकर्ताओं के बीच भी तालमेल नहीं है। भाजपा स्थानीय स्तर पर लोगों को ये सब बताएगी।
उससे साफ हो गया कि इस बार भी वह चुनावी लड़ाई को बूथों पर ही केंद्रित करना चाहते हैं ताकि विपक्ष को बूथों पर ही उलझा लिया जाए। भाजपा के चुनावी प्रबंधन से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते भी हैं कि सपा और बसपा के नेताओं ने भले ही गठबंधन कर लिया है, लेकिन बूथों पर अब भी दोनों के समर्थक मतदाताओं का रुझान अलग-अलग है। इनके कार्यकर्ताओं के बीच भी तालमेल नहीं है। भाजपा स्थानीय स्तर पर लोगों को ये सब बताएगी।
यह है वजह
भले ही भाजपा के नेता सार्वजनिक रूप से गठबंधन बनने के बाद बन रही चुनावी गणित और राजनीति में प्रियंका गांधी के प्रवेश को बहुत महत्व न दे रहे हों, लेकिन अंदरखाने पार्टी के रणनीतिकार दोनों परिस्थितियों से संभावित सियासी नफा-नुकसान को बारीकी से समझ रहे हैं।
राजनीति में दो और दो हमेशा चार ही नहीं होता, लेकिन भाजपा के रणनीतिकार यह भी समझ रहे हैं कि प्रदेश की चुनावी हवा में जातीय फैक्टर भी हमेशा से अहम भूमिका निभाता रहा है। इसीलिए भाजपा की कोशिश है कि सपा व बसपा की जातीय गणित को हिंदुत्व के एजेंडे, कांग्रेस के समीकरण को उसकी पुरानी सरकार के घोटालों और रामसेतु जैसे मुद्दों के जरिये कमजोर किया जाए।
इसलिए भाजपा की कोशिश है कि बूथों पर ही इन मुद्दों के सहारे विपक्ष की घेराबंदी करके वहीं पर इन्हें उलझाकर अपनी गणित दुरुस्त कर ली जाए। दरअसल, भाजपा 2014 और 2017 में इस प्रयोग का लाभ चख भी चुकी है। इसीलिए पार्टी के रणनीतिकार 2019 की लड़ाई को भी बूथों पर ही केंद्रित करने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीति में दो और दो हमेशा चार ही नहीं होता, लेकिन भाजपा के रणनीतिकार यह भी समझ रहे हैं कि प्रदेश की चुनावी हवा में जातीय फैक्टर भी हमेशा से अहम भूमिका निभाता रहा है। इसीलिए भाजपा की कोशिश है कि सपा व बसपा की जातीय गणित को हिंदुत्व के एजेंडे, कांग्रेस के समीकरण को उसकी पुरानी सरकार के घोटालों और रामसेतु जैसे मुद्दों के जरिये कमजोर किया जाए।
इसलिए भाजपा की कोशिश है कि बूथों पर ही इन मुद्दों के सहारे विपक्ष की घेराबंदी करके वहीं पर इन्हें उलझाकर अपनी गणित दुरुस्त कर ली जाए। दरअसल, भाजपा 2014 और 2017 में इस प्रयोग का लाभ चख भी चुकी है। इसीलिए पार्टी के रणनीतिकार 2019 की लड़ाई को भी बूथों पर ही केंद्रित करने की कोशिश कर रहे हैं।