7 अहम वजहें, यूपी में भाजपा के 'सारथी' होंगे वरुण
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विधानसभा उपचुनाव के नतीजे आने के बाद प्रदेश भाजपा एक बार फिर नेतृत्व के संकट से जूझती दिख रही है। फिर से यह बात साफ हो गई है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को किसी ऐसे चेहरे को आगे लाना होगा, जो सर्वस्वीकार्य हो तथा जनता के बीच पहुंच व पकड़ रखता हो।
हालांकि पार्टी के पास प्रदेश स्तर पर मौजूदा सक्रिय टीम को देखते हुए यह तलाश काफी मुश्किल दिख रही है। जो चर्चित चेहरे हैं, उनमें सबके सब लगभग आजमाए जा चुके हैं। कल्याण सिंह के कालखंड के बाद लगभग डेढ़ दशक से पार्टी के लिए यह तलाश लगातार चुनौती बनी हुई है।
इससे पार पाने के लिए पार्टी नेतृत्व ने कई फैसले व प्रयोग किए लेकिन वे सभी अंतत: फेल साबित हुए। ऐसे में पार्टी आलाकमान वरुण गांधी को फ्रंटफुट पर लाने पर विचार कर सकता है। वहीं, केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने वरुण गांधी को भाजपा की राजनीति की मुख्य धारा में उतारने की बात उठाकर बदलाव की बात को हवा दे दी है।
वरुण एक तरफ पार्टी का जाना पहचाना चेहरा तो हैं ही साथ ही उन्होंने लोकसभा चुनाव में भी जीत दर्ज की है। इसके अलावा भी अन्य कई वजहें हैं, जिससे यूपी में पार्टी का नेतृत्व उन्हें सौंपा जा सकता है।
2. पार्टी को भरोसेमंद चेहरे की जरूरत
भाजपा के लिए चेहरे की तलाश इसलिए और जरूरी हो गई है, क्योंकि उपचुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा को 80 में 71 सीटें मिलने के पीछे पार्टी की लोकप्रियता से ज्यादा अहम नरेंद्र मोदी पर लोगों का भरोसा रहा।
विधानसभा उपचुनाव में उन्हें भाजपा का कोई चेहरा ऐसा नहीं लगा। लिहाजा उन्होंने फिर दूरी बना ली। इस स्थिति ने भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।
संदेश साफ है कि 2017 के चुनाव में जनता तभी भरोसा करेगी जब पार्टी किसी भरोसेमंद चेहरे को आगे करे।
3. किसी अन्य को आगे नहीं आने देना चाहते भाजपाई
पार्टी ने अब तक जिन लोगों को आगे रखा है, उनमें कोई पिछड़ा व दलित चेहरा ऐसा नहीं है जो अपने-अपने वर्गों के बीच पकड़ व पहुंच रखने का भरोसा पैदा करता हो।
योगी आदित्यनाथ के रूप में उपचुनाव में हिंदुत्ववादी भगवा चेहरे के जरिये लोगों का भरोसा जीतने की कोशिश को झटका देकर जनता ने जता दिया है कि उसे ऐसा चेहरा चाहिए जो मोदी की तरह हिंदुत्व व विकास का संदेश एक साथ देता दिखे।
पार्टी के झुग्गी-झोपड़ी प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संयोजक सुनील भराला कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि पार्टी के पास चेहरे नहीं हैं। चेहरे हैं लेकिन पिछले डेढ़ दशक में पार्टी का नेतृत्व संभालने वालों को ऐसा रोग लगा है कि वे किसी जनाधार वाले और जमीनी राजनीति करने वाले कार्यकर्ता को आगे आने ही नहीं देना चाहते।
जब तक इसमें सुधार नहीं होगा, तब तक पार्टी को चुनौतियों से निजात दिलाना दिवास्वप्न ही बना रहेगा।
4. वरुण के साथ हो सकता है प्रयोग
वर्ष 2002 में कलराज मिश्र ने यह कहते हुए, ‘भाजपा को दूसरे नहीं, अपने ही हराते हैं। पराजय के लिए कार्यकर्ता नहीं बल्कि नेताओं की महत्वाकांक्षा जिम्मेदार है।
जब तक हमारी आपस की गुटबाजी व टांग खिंचाई बंद नहीं होगी, तब तक उत्तर प्रदेश में हम लगातार मात खाते रहेंगे’ अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था।
तब से अब तक भाजपा ने सूबे में वापसी के लिए कई प्रयोग किए, पर सारे प्रयोग फेल रहे। गुटबाजी व टांग खिंचाई दूर होने के बजाय और बढ़ गई। ऐसे में पार्टी वरुण के साथ नया प्रयोग कर सकती है।
5. ये सारे दांव नहीं रहे हैं कामयाब
कलराज के बाद विनय कटियार पर दांव लगाकर हिंदुत्व को धार व कट्टरवादी चेहरे की मदद से वोट हासिल करने का प्रयोग हुआ। कटियार ने तेवर दिखाने शुरू किए तो मायावती के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का हवाला देकर उनके तेवरों पर अंकुश लगाने की कोशिश हुई।
मंत्रिमंडल में शामिल होने की महत्वाकांक्षा जगाकर पार्टी में विद्रोह करा दिया गया। इस विद्रोह के पीछे पार्टी के ही एक बडे़ नेता का हाथ होने की बात चर्चा में आई। वर्ष 2004 आते-आते कटियार भी अपना प्रभाव गंवा बैठे।
लोकसभा चुनाव में फेल हुए और उनकी जगह केशरीनाथ त्रिपाठी को अध्यक्ष बनाया गया। उनके समय में भी इतनी खींचतान हुई कि वे भी फेल हो गए और 2007 के विधानसभा चुनाव के बाद उनकी जगह डॉ. रमापति राम त्रिपाठी के रूप में संगठन की जानकारी रखने वाले ब्राह्मण चेहरे को लाया गया, पर वे भी खींचतान पर काबू नहीं कर पाए। लोकसभा चुनाव 2009 में उनकी भी नीति, रणनीति व फैसले फेल हो गए।
6. वरुण के नाम गुटबाजी में नहीं
त्रिपाठी के बाद सूर्यप्रताप शाही को बागडोर सौंपी गई। उनके हर प्रयोग पर सवाल उठे। बाबूसिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल कराने को लेकर भी उनकी फजीहत हुई।
2012 के विधानसभा चुनाव में शाही का नेतृत्व भी फेल हो गया। उनके बाद डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी के रूप में फिर ब्राह्मण चेहरा लाकर कल्याण सिंह के बाद पहली बार पश्चिम को संगठन की कमान सौंपी गई।
रणनीतिकारों का मानना था कि पूरब से ही अध्यक्ष बनाए जाने से पश्चिम में नाराजगी बढ़ रही है, लेकिन वाजपेयी भी विवादों से बच नहीं पाए। उन पर भी गणेश परिक्रमा करने वालों को तवज्जो और मनमाने तरीके से अपने लोगों को पद व प्रतिष्ठा देने के आरोप लग रहे हैं। जबकि वरुण का नाम किसी भी तरह की गुटबाजी में नही आया।
7. वरुण के समर्थन में हो रहे प्रदर्शन
राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि मेनका गांधी वरुण गांधी के भविष्य को लेकर काफी चिंतित हैं। चूंकि इस समय भाजपा पराजित हुई है और मेनका जानती हैं कि यही वह मौका है जब भाजपा नेताओं पर दबाव बनाया जा सकता है। इसलिए उन्होंने वरुण की वापसी की बात उठा दी।
मेनका का मकसद है कि पार्टी नेता वरुण को दोबारा एंट्री न भी दें तो भी लोगों के बीच यह बात पहुंचा दी जाए कि पार्टी के भीतर किस तरह एकतरफा फैसले लिए जा रहे हैं।
कानपुर सहित कुछ जगह वरुण के समर्थन में होने वाले प्रदर्शन मेनका की मंशा पूरी करते हुए भी दिख रहे हैं।
इनमें से कई मानकों पर वरुण गांधी भले ही खरा न उतरते हों लेकिन वह पार्टी की जरूरत को काफी हद तक पूरा करते नजर आते हैं।