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मोदी-शाह ने बदल दिया यूपी भाजपा का 'वर्क कल्चर'

Sun, 11 Jan 2015 01:05 AM IST
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 11 Jan 2015 01:05 AM IST
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BJP membership campaign in UP.

‘हैलो...कहां हैं आप? ....कितने सदस्य बन गए’? ‘यहां हूं ...इतने सदस्य बन गए’। कुछ क्षण भी नहीं बीतते कि घनघनाने लगता है एक स्थानीय कार्यकर्ता का फोन-‘भाई साहब! आप कहां हैं। अभी क्षेत्रीय कार्यालय से फोन आया था। पूछ रहे थे कि आप हमारे बूथ पर ही पहुंच रहे हैं’। ‘आ रहा हूं भाई! रास्ते में हूं।’

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फोन काटते हैं और फिर बुदबुदाते हुए आगे बढ़ जाते हैं। भाजपाइयों की फोन पर होने वाली यह बातचीत इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में है।

वर्षों से कागजों में काम करने के आदी हो चुके सूबे के भाजपाइयों का बुरा हाल है। गोलमाल जवाब देने का मतलब दूसरी मुसीबत मोल ले लेना है। पता नहीं कब किसी दूसरे का फोन आ जाए और वह लोकेशन पूछने लगे या फिर यह आवाज सुनाई दे, ‘मैं पहुंच रहा हूं। आप रुके रहिए।’ तब तो और मुसीबत।
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नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बदली भाजपा के कामधाम का रंग-ढंग बदलने का असर हो या कार्रवाई का डर, भाजपाई कड़ाके की ठंड में भी पसीना बहाते हुए गांव की गलियों व खेतों के मेड़ों पर घूमने को मजबूर हैं। पूरे सदस्यता अभियान पर टीम मोदी की तीसरी आंख की नजर लगी हुई है।
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बड़े नेता भी छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं की नजर में

BJP membership campaign in UP.

दिल्ली से लेकर लखनऊ के दफ्तरों तक में हर क्षेत्र से रोजाना नए सदस्य बनने वालों का आंकड़ा जुटाया जा रहा है। यह आंकड़ा न सिर्फ बूथवार, बल्कि सदस्यता अभियान के तहत तैनात किए गए एक जिले व ब्लॉक से दूसरे जिले व ब्लॉक में तैनात किए गए नेताओं व कार्यकर्ताओं से मिली जानकारी के आधार पर भी तैयार कराया जा रहा है। कहीं भी आंकड़े में अंतर आया तो फिर हो गई मुसीबत।

बड़े नेताओं पर भी नजर: यूपी के भाजपा नेताओं के बारे में मिले फीडबैक के आधार पर मोदी व शाह ने इस तरह की कार्ययोजना बनाई है कि बडे़ नेता भी छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं की नजर में हैं।

इन कार्यकर्ताओं को वह लिस्ट भी दे गई है जिसमें उनके क्षेत्र में रहने वाले प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य, क्षेत्रीय पदाधिकारियों, राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य, जिले से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के पदाधिकारियों के नाम व नंबर हैं।

कार्यकर्ता इन्हें रोज फोन करके कम से कम सौ सदस्य बनाने का आग्रह भी कर रहे हैं। साथ ही एक दिन के लिए ही सही अपने बूथ या मंडल पर आकर कम से कम सौ लोगों को सदस्य बनाने की जिम्मेदारी भी सौंप रहे हैं।

कुछ भले ही नाक-भौंह सिकोड़ते हैं, पर मामला मोदी व शाह युग का है सो बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। बेचारे! काम करने को मजबूर हैं। सच बोलने को भी और कार्यकर्ताओं की बातें सुनने को भी।

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