भाजपा के लिए ही विध्वंसक साबित हो रहे मोदी
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देश में मोदी लहर का माला जपने वाली भाजपा का साथ कुछ पुराने नेता ऐसे समय छोड़ रहे हैं जब पार्टी को सत्ता का सपना सच होता हुआ दिख रहा है, क्या ये सब मोदी की वजह से ही है, जो कि आज पार्टी से बड़े दिख रहे हैं, क्या मोदी अपनी ही पार्टी के लिए विंध्वंसक बन रहे हैं।
पूर्व केंद्रीय मंत्री अशोक प्रधान व पूर्व विधायक प्रेमप्रकाश तिवारी उर्फ जिप्पी तिवारी हवा के विपरीत फैसला करते हुए मंगलवार को समाजवादी हो गए।
ज्यादा पीछे न जाएं तो सिर्फ एक सप्ताह के भीतर कम से कम तीन ऐसे चेहरे भाजपा को अलविदा कह चुके हैं, जो कहीं से आए नहीं थे।
अभी तक कहीं गए भी नहीं थे। भगवा टोली से ही उनका राजनीतिक सफर शुरू हुआ था। जाहिर है कि कोई न कोई खास वजह है।
शीर्ष नेतृत्व को नहीं चिंता
ऐसा नहीं है कि यह लोग अचानक चले गए। इन सबके पार्टी छोड़ने की चर्चा पहले से ही थी। फिर भी भाजपा के रणनीतिकार हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। पार्टी के एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि संकट संवादहीनता का है।
मोदी के नाम की हवा में पार्टी के नेता भी हवा में उड़ रहे हैं। कुछ इस भाव में कि जिसे रहना हो रहे और जिसे जाना हो जाए। यह उदाहरण देते हैं कि आगरा के महापौर इंद्रजीत वाल्मीकि ‘आर्य’ का।
बताते हैं कि इंद्रजीत कहीं से आए नहीं थे। संगठन के पुराने कार्यकर्ता थे। धर्मान्तरण करने वाले दलितों की घर वापसी का अभियान चलाने के लिए जाने-जाते थे। पर, पार्टी के एक सांसद व संगठन से जुड़े दो नेताओं के व्यवहार से पिछले एक साल से तंग थे।
कई बार वह सभी जगह अपनी पीड़ा व्यक्त कर चुके थे। पर, कुछ नहीं हुआ। नतीजतन अपना ही घर छोड़ने को मजबूर हो गए। औरों के भी जाने की यही वजह है।
बड़े नेता बने आफत
पूर्व केंद्रीय मंत्री अशोक प्रधान भी मूलत: भाजपा के थे। प्रधान के लिए भाजपा में लोकसभा के पिछले चुनाव में तूफान खड़ा हो गया था।
प्रधान को बुलंदशहर से टिकट के लिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कल्याण सिंह का पार्टी छोड़ना स्वीकार कर लिया था। पर, प्रधान का टिकट बदलना नहीं स्वीकार किया था।
ऐसे अशोक प्रधान भी भाजपा के नहीं रहे। कल्याण सिंह ऐसा अड़े कि प्रधान को टिकट नहीं मिल पाया और वह पार्टी छोड़ सपा में चले गए।
कुछ उसी अंदाज में जैसे पिछले चुनाव में कल्याण, अशोक प्रधान का टिकट न कटने से नाराज होकर सपा के पाले में खड़े हो गए थे।
पहले पार्टी को मजबूत किया, फिर छोड़ दिया
सपा में गए डॉ. अशोक पटेल भी पार्टी के सामान्य कार्यकर्ता थे। पार्टी की इच्छा पर फतेहपुर से लोकसभा चुनाव लड़े थे। दो बार सांसद रहे। इस बार भी टिकट के दावेदार थे। टिकट नहीं मिला।
जानकारी के मुताबिक, फतेहपुर के संगठन ने नेतृत्व से कई बार डॉ. पटेल से बात करने का आग्रह किया। पर, बात नहीं हो पाई। नतीजतन पिछले दिनों वह सपा में चले गए।
पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह के बारे में बताने की जरूरत ही नहीं है। उनके पुत्र अनुराग मिर्जापुर से टिकट के दावेदार थे। पार्टी ने यह सीट समझौते में अपना दल को दे दी। नाराज अनुराग ने भी पार्टी छोड़ दी है।
गोंडा से कई बार विधायक रहे रामप्रताप सिंह के पिता दशरथ सिंह भी गोंडा, बहराइच व बलरामपुर सहित इस पूरे इलाके में भगवा टोली की जड़ें मजबूत करने के लिए जाने जाते थे।
पार्टी की पीठ में छुरा घोंपा
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी का कहना है कि अशोक प्रधान को छोड़ शेष के पार्टी से जाने का कष्ट है। पार्टी ने इन सभी को सम्मान दिया।
टिकट भी दिया और चुनाव भी लड़ाया। अगर इस बार कहीं किसी वजह से टिकट नहीं मिला तो तुरंत मॉं की पीठ में छूरा नहीं मारना चाहिए।
पार्टी हमारी मॉं है। रही बात प्रधान की तो पार्टी ने उन्हें चार बार सांसद बनाया। मंत्री बनाया। उनके चक्कर में पार्टी ने कितनी नुकसान उठाया।
उनकी संपत्ति पहली बार कितनी थी। अब कितनी है। बस इसे देख लिया जाए। पूरा मामला समझ में आ जाएगा। एक बार उन्हें टिकट नहीं मिला तो पार्टी छोड़ गए।